जीवत को है आम की बगिया मरते को गंगा जी, इसीलिए यूपी में बासा सबसे है चंगा जी, दिली मोहब्बत, अपनापन, महसूस भाव को करना, उसी जगह पर जिओ जहां हो प्यार वहीं पर मरना, क्या रहना उस देस में पंछी जहां न कोई अपना, करो बसेरा वहां हो जीवन जहां सलोना सपना, तन्हाई की सजा काटते जैसे जीवन सारा, पैसा चाहे मिले वहां ना रहना करो गंवारा, दोय बखत की रोटी खाकर, मगन रहो गांवां में, दौलत मिले भले कितनी परदेस नहीं जांवां मैं! ठंडी ठंडी पवन सुहानी गांव की वो बरसातें, वो खिलना फूलों का दिल ताज़ा करतीं सी बातें, नहीं कहीं अपनापन मिलता लोग बहुत मिलते हैं, बड़े नसीबों से दुनिया में दिलवाले मिलते हैं, चार दिना का जीवन जिसमें दोय दिना हैं बीते, हम अब भी है ऐसे जीते नहीं कि जैसे जीते, सुकूं है खोया, नहीं भरोसा होता सहसा सब पर, है फैली यह कैसी चुप्पी, मेहर मेरे रब कर, कंबल ओढ़े कड़क ठंड की रात अकेला चलता, गांव की सूनी गलियों में पूरा है चांद निकलता, कहीं भौंकते कुत्ते है, झींगुर की गूंज कहीं पर, सपने से में चलता मैं जुगनू की मौज कहीं पर, कौन मुझे पहचानेगा दरवाजे किसके जाऊं, आधी रात किवाड़ पे लटकी सांकल या खड़काऊं...
ए.आई. की दस्तक •••••••• (विशेष - किसी भी विषय के हजारों पक्ष-विपक्ष होते हैं, अतः इस लेख के भी अनेक पक्ष हो सकतें हैं। यह लेख विचारक का द्रुतस्फूर्त विचार है, इस विषय पर अन्य प्रकारों से भी विचार संभव है। ) ****** पिछले दशकों में किसी विद्वान् के लिखे साहित्य पर पीएचडी करते थे तब प्रथम अध्याय में उस रचयिता के बारे में जानने के लिए, और विषय को जानने के लिए उसके पास जाया करते थे, यह शोध-यात्रा कभी-कभी शहर-दर-शहर हुआ करती थी! लेकिन आजकल सब कुछ गूगल पर उपलब्ध है, आप बेशक कह सकते हैं कि इससे समय और पैसे की बचत हुई। लेकिन इस बारे में मेरा नजरिया दूसरा भी है, उस विद्वान् से मिलने जाना, उसका पूरा साक्षात्कार लेना, वह पूरी यात्रा- एक अलग ही अनुभव है। और अब ए.आई. का जमाना आ गया! अब तो 70% पीएचडी में किसी की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। बेशक नयी तकनीक हमें सुविधा देती है, लेकिन कुछ बेशकीमती छीनती भी है। आप समझ रहे हैं ना कि कोई व्यक्ति आपके ही लिखे साहित्य पर पीएचडी कर रहा है और आपकी उसको लेश मात्र भी जरूरत नहीं! क्योंकि सब कुछ आपने अपना रचित गूगल पर डाल रखा है। या फिर व्याकरण शास्त्र पढ़ने के लिए...