१- भावश्री: (संस्कृत) https://archive.org/details/Bhavshri २- वन्द्यश्री: (संस्कृत) https://archive.org/details/vandyashri ३- काव्यश्री: (संस्कृत) https://archive.org/details/kavyashri ४- श्रीगणेशशतकम् (संस्कृत, हिन्दी) https://archive.org/details/20231026_20231026_0951 ५- सूर्यशतकम् (संस्कृत-हिन्दी) https://acharyahimanshugaur.blogspot.com/2023/04/blog-post_36.html ६- पितृशतकम् (संस्कृत, हिन्दी) https://archive.org/details/compressed_20231026 ७- श्रीबाबागुरुशतकम् (संस्कृत, हिन्दी) https://archive.org/details/shri-babaguru-shatkam-1-1 ८- कल्पनाकारशतकम् (संस्कृत) https://archive.org/details/20231026_20231026_0949 ९- नरवरभूमि: (संस्कृत) https://acharyahimanshugaur.blogspot.com/2021/09/blog-post_25.html १०- यज्ञसम्राट्शतकम् (संस्कृत-हिन्दी) https://archive.org/details/8_20230516_202305 ११- समर्थश्रीशतकम् (हिन्दीभावार्थसहितम्) https://archive.org/details/1_20220908_20220908_0914 १२. चल चायपाने (कविता) https://archive .org/details/new-microsoft-word-document_202110
ए.आई. की दस्तक •••••••• (विशेष - किसी भी विषय के हजारों पक्ष-विपक्ष होते हैं, अतः इस लेख के भी अनेक पक्ष हो सकतें हैं। यह लेख विचारक का द्रुतस्फूर्त विचार है, इस विषय पर अन्य प्रकारों से भी विचार संभव है। ) ****** पिछले दशकों में किसी विद्वान् के लिखे साहित्य पर पीएचडी करते थे तब प्रथम अध्याय में उस रचयिता के बारे में जानने के लिए, और विषय को जानने के लिए उसके पास जाया करते थे, यह शोध-यात्रा कभी-कभी शहर-दर-शहर हुआ करती थी! लेकिन आजकल सब कुछ गूगल पर उपलब्ध है, आप बेशक कह सकते हैं कि इससे समय और पैसे की बचत हुई। लेकिन इस बारे में मेरा नजरिया दूसरा भी है, उस विद्वान् से मिलने जाना, उसका पूरा साक्षात्कार लेना, वह पूरी यात्रा- एक अलग ही अनुभव है। और अब ए.आई. का जमाना आ गया! अब तो 70% पीएचडी में किसी की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। बेशक नयी तकनीक हमें सुविधा देती है, लेकिन कुछ बेशकीमती छीनती भी है। आप समझ रहे हैं ना कि कोई व्यक्ति आपके ही लिखे साहित्य पर पीएचडी कर रहा है और आपकी उसको लेश मात्र भी जरूरत नहीं! क्योंकि सब कुछ आपने अपना रचित गूगल पर डाल रखा है। या फिर व्याकरण शास्त्र पढ़ने के लिए...