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श्री-ब्रजभूषण-ओझा-अष्टकम्

।। श्रीब्रजभूषणौझाष्टकम् ।।

काश्यामधीत्य पुरुषो गुरुरामयत्नात्
नागेशभट्टसृतशास्त्रविशिष्टविज्ञो
विद्वत्सभागतजनो जयतात् समस्तान्
शब्दप्रथाप्रचरितब्रजभूषणौझा ।।१।।

संस्थान इत्यभिहिते सुरवाक्स्थले चा-
sप्यध्यापयन् पदविवेकपरं हि शास्त्रं
छात्रप्रियैकपदवीमभियातवान् य:
सच्छाब्दिको विजयते ब्रजभूषणौझा।।२।।

ओझेति नाम पदवित्प्रथितं प्रदेशे
श्रुत्त्वा मुदं भरति तत्सुहृदां गणश्च
आयातवान् सदसि चेति निशम्य दुष्टा:
शास्त्रार्थिनो भयवशाच्च ततो व्रजन्ति।।३।।

शैवप्रसारशरणो बुधसंगकांक्षी
यो वा कविप्रियसुगायकमोदितश्च
योsहो बिहारजनताप्रियगुण्यरागी
सर्वत्र हर्षतु स वै ब्रजभूषणौझा।।४।।

य: कीर्त्तिकाम उत वित्तसमुत्सुकोsपि
शास्त्रं जहाति न कदापि च लोकलग्न:
काशीमठेषु परिपाठयति द्विजान् यो
हृष्टा: भवन्ति पुरुषा अवगम्य ओझाम् ।।५।।

स्थूलोsपि सूक्ष्ममतिराह च सूक्ष्मतत्त्वं
स्थूलोदरार्चकजनो भजति स्मरारिं
गोष्ठीगरिष्ठपुरुषप्रियशिष्टरूप:
सम्मान्यशोधपरको ब्रजभूषणौझा।।६।।

भोपालदेशबुधभाष्यविशिष्टवक्ता
रम्यार्थसत्प्रकृतिजुष्टसुतुष्टसक्त:
शिष्यावृतो द्विजनतो गुरुमोददक्ष:
ह्यध्यापनेsतिकुशलो ब्रजभूषणौझा।।७।।

विद्वत्तया चकित एव स रामदेव:
ओझां प्रशंसति जनेषु सुधीप्रियो य:
सर्वत्र स्वप्रतिभया पदसिंह उक्तो
यस्तं नुमो बुधवरं ब्रजभूषणौझाम्।।८।।

स्मारं स्मारं वपुस्तस्य रात्रावोझां पदार्थगम्।
अष्टकं लिखितं चैतद्विद्वल्लोकंगमस्य वै।।

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