Skip to main content

बिल्वपत्र के रस की सुगंधि - हिमांशु गौड

अस्मच्चित्तेषु कोsयं नश्शिवो भूत्त्वा प्रवेगवान्।
बिल्वपत्ररसोद्गन्धीभूय भूयोsनुधावति।।
----------------
भावार्थ-- यह कौन प्रवेगवान् शिव तत्त्व है जो हमारे चित्तों में बिल्वपत्र के रस की सुगन्धि बनकर दौड़ रहा है।

Comments

Popular posts from this blog

संस्कृत सूक्ति,अर्थ सहित, हिमांशु गौड़

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु: हंसा महीमण्डलमण्डनाय हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैस्सह विप्रयोग:।। हंस, जहां कहीं भी धरती की शोभा बढ़ाने गए हों, नुकसान तो उन सरोवरों का ही है, जिनका ऐसे सुंदर राजहंसों से वियोग है।। अर्थात् अच्छे लोग कहीं भी चले जाएं, वहीं जाकर शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन हानि तो उनकी होती है , जिन लोगों को छोड़कर वह जाते हैं ।  *छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति* *तिष्ठन्ति स्वयमातपे।* *फलान्यपि परार्थाय* *वृक्षाः सत्पुरुषा इव।।* अर्थात- पेड को देखिये दूसरों के लिये छाँव देकर खुद गरमी में तप रहे हैं। फल भी सारे संसार को दे देते हैं। इन वृक्षों के समान ही सज्जन पुरुष के चरित्र होते हैं।  *ज्यैष्ठत्वं जन्मना नैव* *गुणै: ज्यैष्ठत्वमुच्यते।* *गुणात् गुरुत्वमायाति* *दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।।* अर्थात- व्यक्ति जन्म से बडा व महान नहीं होता है। बडप्पन व महानता व्यक्ति के गुणों से निर्धारित होती है,  यह वैसे ही बढती है जैसे दूध से दही व दही से घी श्रेष्ठत्व को धारण करता है। *अर्थार्थी यानि कष्टानि* *सहते कृपणो जनः।* *तान्येव यदि धर्मार्थी* *न  भूयः क्लेशभाजनम्।।*...

Sanskrit Kavita By Dr.Himanshu Gaur

शान्तविलास, पण्डितराज जगन्नाथ विरचित

 विशालविषयाटवीवलयलग्नदावानल- प्रसृत्वरशिखावलीविकलितं मदीयं मनः। अमन्दमिलदिन्दिरे निखिलमाधुरीमन्दिरे मुकुन्दमुखचन्दिरे चिरमिदं चकोरायताम्‌॥१॥ अये जलधिनन्दिनीनयननीरजालम्बन ज्वलज्ज्वलनजित्वरज्वरभरत्वराभङ्गुरम्‌। प्रभातजलजोन्नमद्गरिमगर्वसर्वङ्कषै- र्जगत्त्रितयरोचनैः शिशिरयाशु मां लोचनैः॥२॥ स्मृतापि तरुणातपं करुणया हरन्ती नृणा- मभङ्गुरतनुत्विषां वलयिता शतैर्विद्युताम्‌। कलिन्दगिरिनन्दिनीतटसुरद्रुमालम्बिनी मदीयमतिचुम्बिनी भवतु कापि कादम्बिनी॥३॥ कलिन्दगिरिनन्दिनीतटवनान्तरं भावयन्‌ सदा पथि गतागतक्लमभरं हान्‌ प्राणिनाम्‌। लतावलिशतावृतो मधुरया रुचा संभृतो ममाशु हरतु श्रमानतितरां तमालद्रुमः॥४॥ वाचा निर्मलया सुधामधुरया यां नात्ग शिक्षामदा- स्तां स्वप्नेऽपिन संस्मराम्यहमहंभावावृतो निस्त्रपः। इत्यागः शतशालिनं पुनरपि स्वीयेषु मां बिभ्रत- स्त्वत्तो नास्ति दयानिधिर्यदुपते मत्तो न मत्तोऽपरः॥५॥ पातालं व्रज याहि वा सुरपुरीमारोह मेरोः शिरः पारावारपरम्पराहत यदि क्षेमं निजं वाञ्छसि श्रीकृष्णेति रसायनं रसय रे शून्यैः किमन्यः श्रमैः॥६॥ मृद्वीका रसिता सिता समशिता स्फीतं निपीतं पयः स्वर्यातेन सुधाप्यधायिकतिध...