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एक दिन : हिन्दी कविता : हिमांशु गौड

एक दिन मेरे भी बहुत से चेले होंगे
चारों और खुशियों के मेले होंगे
ऐसा सोचकर वह ,
शास्त्रों को पढ़ता रहा
प्रतिदिन विद्वत्ता की
ऊंचाइयों पर चढता रहा
शुक्ल यजुर्वेद को उसने
कंठस्थ कर लिया था
नागेश के ग्रंथों को
हृदयस्थ कर लिया था
दान नहीं लूंगा, अतः
पंडिताई से बचता था
स्वयं के लिए पूजा करना ही,
उसे जंचता था
मोटी सी चुटिया उसके
वैदुष्य की पहचान थी
एकांत में कुटिया, उसके
वैराग्य का प्रतिमान थी
उसके मंत्र बड़े ही तेजस्वी थे
एक एक वाक्य बड़े ओजस्वी थे
लेकिन सबके लिए वह मंत्रों का प्रयोग
करता नहीं था
दान दक्षिणा के लिए
कभी मरता नहीं था
बहुत वर्ष उसनेे गंगाजल पीकर बिता डाले
विनियोग छोड़ते छोड़ते हाथ गला डाले
वह वैदिक विधियों की व्याख्या,
बड़ी विचित्र करता था ,
पुराणों की कथा
बड़ी सचित्र करता था ..
दर्शनशास्त्र उस पर ही खत्म ,
और उससे ही शुरू था
नवयुवक होते हुए भी
वह सबका गुरु था
घमंडी विद्वान उससे बहुत जलते थे
शास्त्रार्थ में हराने को मचलते थे
जबकि वह बिल्कुल आचार विहीन थे
सिर्फ वाणी मात्र से ही शास्त्रप्रवीण थे
धर्मशास्त्र को आचरण में नहीं उतारते थे
बस नागेश की पंक्तियां ही सब पर मारते थे
और किसी भी शास्त्र का उनको नहीं था ज्ञान ,
थोड़े से व्याकरण से ही भरा था अभिमान
लेकिन उनका इस बार,
दिव्यन्धर से पड़ा था उनका पाला ,
गंगा जी के घाट पर जो,
फेर रहा था माला
व्याख्यानों की परंपरा का
रूप बदल डाला था
दिव्यन्धर ने उन सबका
हृद्रूप बदल डाला था
अभिमानों के पुतले वे,
हो गए बहुत चमत्कृत
नरवर की उस पुण्य धरा को,
करके गए नमस्कृत
तपस्वी लोग अक्सर
रहते ही हैं अकेले ,
लंगड़ जमा ही देते हैं आखिर,
बाबा के चेले।।

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