Skip to main content

सपनों का शहर - हिमांशु गौड

........

हिमेश अपनी कहानी सुना रहा था और ऋतुकान्त उसके मुंह से झरने वाली लफ्फ़ाजी को मुग्ध हो कर सुन रहा था !
"इस जगह पर मैं न जाने कितनी बार आ चुका था, जो आज मैंने सपने में देखी!
वह अस्पताल वाली गली , जिसके मैं बचपन में एक दिन में , दौड़ दौड़ कर कई कई चक्कर काट डालता था!
वे बाजार जहां दुकानदार अपनी दुकानों से बाहर आते जाते राहगीरों को ही देखते रहते हैं , मतलब आपस में लोगों में बड़ी ही नजदीकी है और बड़े ही उत्सुक लोग भी हैं औरों के विषय में! उन बाजारों में ज्यादा भीड़ नहीं रहती थी!
"बाजार में भीड़ नहीं फिर वो कैसे बाजार?"  - ऋतुकान्त ने कहा!
हिमेश मुस्कुराते हुए बोला-
"वो वक्त और था! कोई आज की तरह भागम-भाग का दौर तब नहीं था!"
"दोपहर के समय तो कोई इक्का-दुक्का ही निकलता था लेकिन नोवेल्स और कॉमिक्स की दुकान पर बच्चों और नौजवानों की भीड़ हमेशा ही इकट्ठा रहती थी!
जहां लोग निकलने-बड़ने वाले हर आदमी को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं , ऐसे बाजार में , मैं कितना ही दौड़ा था ।
ऐसी कौन सी दुकान है, जहां पर मैं नहीं बैठा !"
उस समय जनसंख्या इतनी ज्यादा नहीं थी वहां कि !
और लोगों के अंदर मोहब्बत भी बहुत थी, ऐसा मुझे आज भी लगता है !
........

वक्त रिस रिस कर निकलता जा रहा है!
......
अब फूलों की सुगंध सिर्फ फूल वाले की दुकान में ही है ! वो भी शहर में एकाध है!
और सब लोग वहां जा नहीं सकते!
अब और क्या कहूं!
अब सुबह की शुरुआत बगीचे में टहलने से नहीं होती !
अब दोपहर छायादार मैदानों में बैठकर नहीं गुजरती!
अब अपनी मनमोहक काया लेकर  सांझ नहीं उतरती!
अब रात की शुरुआत में वह जुगनुओं की झिलमिलाहट नहीं रही!
अब कहां वे कहानी कहने और सुनने वाले!
अब गहरे सपने नहीं आते!
अब कहां वे महकती वादियों वाले दिन!
नयी उमंगों वाले आशान्वित मन, और प्रफुल्लित चेहरे!"

हिमेश ने कहना जारी रखा -

"एक साल में शायद ही दो-तीन बार ऐसे सपने आते हैं , जब मैं उन सपनों में पूरी तरह डूब जाता हूं !
आपको भी कई बार ऐसा अहसास हुआ होगा कि आप सपने में डूब गए उसके बाद जब जागो तो ऐसा लगता है ये शायद सपना है वह हकीकत थी !
हम सपने को हकीकत और हकीकत को सपने की तरह महसूस करते हैं ।
उस समय हम हवा के जैसे होते हैं ।
हवा की तरह किसी को भी नजर ना आकर सब जगह घूम आते हैं !
और ये ही वे शहर होते हैं !
यही वह जगह होती हैं ,
जहां के दृश्य हमारे मनो-मस्तिष्क की दीवारों पर अंकित होते हैं।
कई बार सपनों के माध्यम से मैं ऐसे शहरों में भी , ऐसे स्थानों पर भी गया हूं जहां में वास्तव में तो कभी नहीं गया , लेकिन फिर भी लगता है यहां मैं पहले बहुत बार आ चुका हूं या यहां मैं रह चुका हूं !
तो मुझे लगता है कि ये हमारे पूर्व जन्मों के स्थान होते हैं जहां हम कभी-कभी सपनों के माध्यम से पहुंच जाते हैं!"

हिमेश ने चाय का घूंट पी कर कप नीचे रख दिया!

...
..............

................... जारी है!

Comments

Popular posts from this blog

संस्कृत सूक्ति,अर्थ सहित, हिमांशु गौड़

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु: हंसा महीमण्डलमण्डनाय हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैस्सह विप्रयोग:।। हंस, जहां कहीं भी धरती की शोभा बढ़ाने गए हों, नुकसान तो उन सरोवरों का ही है, जिनका ऐसे सुंदर राजहंसों से वियोग है।। अर्थात् अच्छे लोग कहीं भी चले जाएं, वहीं जाकर शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन हानि तो उनकी होती है , जिन लोगों को छोड़कर वह जाते हैं ।  *छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति* *तिष्ठन्ति स्वयमातपे।* *फलान्यपि परार्थाय* *वृक्षाः सत्पुरुषा इव।।* अर्थात- पेड को देखिये दूसरों के लिये छाँव देकर खुद गरमी में तप रहे हैं। फल भी सारे संसार को दे देते हैं। इन वृक्षों के समान ही सज्जन पुरुष के चरित्र होते हैं।  *ज्यैष्ठत्वं जन्मना नैव* *गुणै: ज्यैष्ठत्वमुच्यते।* *गुणात् गुरुत्वमायाति* *दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।।* अर्थात- व्यक्ति जन्म से बडा व महान नहीं होता है। बडप्पन व महानता व्यक्ति के गुणों से निर्धारित होती है,  यह वैसे ही बढती है जैसे दूध से दही व दही से घी श्रेष्ठत्व को धारण करता है। *अर्थार्थी यानि कष्टानि* *सहते कृपणो जनः।* *तान्येव यदि धर्मार्थी* *न  भूयः क्लेशभाजनम्।।*...

ननकू : हिमांशु गौड: आख्यान

ननकू ! हां यही नाम था उस विद्यार्थी  का जिसकी उम्र इस समय 17 साल थी और वह इस समय बाबा गुरु से प्रौढ़मनोरमा का पाठ पढ़ रहा था । बाबा गुरु जी जिस तरह से उसे पढ़ाते थे वह उसी तरह से कंठस्थ कर के उन्हें सुना देता था । इस तरह से वह उस संपूर्ण विद्या नगरी का होनहार शाब्दिक था बाबागुरुजी का उससे बड़ा प्रेम था । यद्यपि वह बहुत ही चंचल था वह नए-नए कौतुक करता था लेकिन फिर भी अपनी अत्यंत तीव्र बुद्धि के कारण वह व्याकरण के आचार्य काशी में प्रख्यात और अधुना नरवर के व्याकरण  पढ़ाने वाले श्री ज्ञानेंद्र आचार्य का भी अत्यंत प्रिय होने के साथ-साथ पढ़ने वाला शिष्य था । ज्ञानेंद्र आचार्य उसके विषय में सदा यह कहते थे कि ननकू तो बना बनाया ही विद्वान है । इसको तो बस अपने संस्कारों का उदय मात्र करना है । इस तरह से मनुष्य अपने पूर्व पुण्यों के आधार पर इस जन्म में तीक्ष्ण बुद्धि को प्राप्त करता है और उससे ही वह शास्त्रों का वैभव प्राप्त कर सकता है लेकिन यह सब पुण्य पर ही आधारित है । कोई कोई तीव्र बुद्धि का होते हुए भी विद्वान् नहीं बन पाता लेकिन कोई साधारण बुद्धि का होकर भी विद्वत...

श्रीबाबागुरुशतकम् (हिन्दीभावार्थ सहित) संस्कृत काव्य, डॉ. हिमांशु गौड़

    श्रीबाबागुरुशतकम् प्रणेताऽनुवादकश्च – आचार्यहिमाँशुगौडः       सर्वाधिकारः प्रकाशकाधीनः प्रथम-संस्करणम् - नवम्बर, २०१९ २०० प्रतयः   ।। श्रीगुरुं प्रति श्रद्धां कार्तज्ञं च व्यक्तीकुर्वत् शतश्लोकात्मकं काव्यम् ।। _____________________________ Publisher: True Humanity Foundation     Shri BabaGuru Shatkam Author & Translator: Acharya Himanshu Gaur                                                                                                         First Edition:   Nov. 2019 200 Copes Poetry of hundred verses expressing reverence and gratitude for Teacher. ­­­­­­­­_____________________________ Publisher: True Humanity Foundat...