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एक सांझ : हिमांशु गौड

एक सांझ अपनी सुनहरी काया लेकर उतर रही हो,
सूरज अस्ताचल की तरफ जा रहा हो
उस समय
अगर आप उस शाम का आनंद ना ले पाए
एक घास के हरे घास के मैदान में
या किसी कॉफी शॉप में बैठे हुए उस सांझ के दृश्य में डूब कर कॉफी का आनंद न ले पाए
सिर्फ पैसा कमाने के लिए ऑफिस में कंप्यूटर में अपनी आंखें फोड़ रहे हैं तो यकीन मानिए आप से ज्यादा दुर्भाग्यशाली कोई नहीं है!
उस तरक्की का क्या मतलब !
जब आसमान में काले-काले बादल मंडरा रहे हैं
और सावन झूम कर आ रहा हो
और ऐसे में आप ऑफिस की जल्दी में हैं
तो वह तरक्की किस काम की !
पूरी जिंदगी कंप्यूटर में आंख गड़ाए
हिसाब किताब करते करते
डाटा चेक करते-करते
या गिनी चुनी किताबों को रटने और रटाने में बीत गई
अगर ऐसी तुम्हारी जिंदगी है
तो वह जिंदगी किस मतलब की !
क्या परमात्मा ने तुम्हें यहां इन मूर्खतापूर्ण कामों में उलझने के लिए भेजा था?
नहीं !
बिल्कुल नहीं !
यह मानव जीवन का दुरुपयोग है !
आप व्यर्थ में की प्रशंसा पाने में ही खुद का जीवन स्वाहा कर डालते हैं!

अरे कम से कम आत्मा का ज्ञान ना कर पाओ, तो प्रकृति का तो वास्तविक आनंद ले ही लो ।
साहित्य के रसों को तो साक्षात् अपने जीवन में उतार ही दो ।
सिर्फ किताब में ही साहित्य का रस पढ़े! सिर्फ किताब में ही अलंकार पढ़े!
उनका तुम्हारे जीवन से कोई लेना देना नहीं!
तो फिर वह नितांत मूर्खता है!
वह कोई ज्ञान नहीं , बल्कि ज्ञान रूपी अंधकार की चादर है , जिसे आपने लपेट कर अपने को एक प्रोफेसर समझ रखा है!
आपका जीवन एक सोने के पिंजरे में बंद तोते की तरह है, जो लोगों को देखने में तो बहुत अच्छा लगता है ,
लेकिन तोता जानता है कि वह एक बेबस और गुलामी का जीवन है।
अगर आप होली जैसा त्यौहार भी खुलकर नहीं खेल पाए ,
1 दिन की होली को 10 दिन तक ना खेल पाए
तो फिर वह गंभीरता बहुत बड़ी कुंठा को जन्म देने वाली है ।
ऐसी हालत में
या तो आप अपने जीवन को व्यर्थ कर रहे हैं और या फिर आप ब्रह्म में रमण करनेवाले आत्मानन्दी महात्मा हैं।
मैं कहता हूं वह धन किस काम का, जो आयु के २०- 30 साल ऑफिस में अपनी जवानी गवां कर आपने हासिल किया हो ।
वह गंभीरता,
वह पढ़ाई -लिखाई ,
वह सभ्यता
सब व्यर्थ
सब बहुत ही बचकानी चीजें मालूम पड़ते हैं।
जहां मानव जीवन का सहज हर्ष उल्लास सहज मानवता का गुण ना दिखलाई पड़ता हो
!
यह बड़ी-बड़ी उपाधियां ,
लंबे-लंबे कोट पैंट,
बड़ी बड़ी बातें ,
अंग्रेजी की लफ्फाजी ,
नितांत सारहीन हैं
तत्वहीन हैं
मैं तो समझता हूं कि आज पृथ्वी पर एक भी विश्वविद्यालय , कॉलेज की कोई जरूरत नहीं है !
क्योंकि जिस जीवन को समझने के लिए किताबें पढ़ाई जाती हैं वह शायद ठीक से मानवता के मूल्यों को  , मनुष्यता के आनंद को , समझा नहीं पा रही हैं !
अरे , इतना समझदार तो जानवर भी होता है कि क्या अच्छा है क्या बुरा!
आप तो इतनी बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल करे हुए लोग हैं !
क्या आपको इतना भी दिखाई नहीं पड़ता, कि क्या उचित है और क्या अनुचित?
आप एक गांव के, ठेठ गांव के  , अनपढ़ आदमी के घर जाइए,
और एक  उच्च शिक्षित शहरी आदमी के घर जाइए
उन दोनों का व्यवहार ही आपको बता देगा कि असली रूप से पढ़ा हुआ कौन है !
किसी भी काम की नहीं है वह पढ़ाई ,
जो मानव का अपमान करना सिखाती हो!
जो जीव-प्रेम से दूर हो !
और असलियत तो यह है , कि आजकल का अधिक पढ़ा लिखा व्यक्ति  पूरा नापतोल का हंसता है!
कहां हंसने से कितना फायदा हो सकता है कहां दांत दिखाने से कितना प्रमोशन मिल सकता है!
किस के आगे दुम हिलानी है और किसको आंखे दिखानी है
यह पूरी नापतोल कर लेता है !
एक पढ़ा लिखा आदमी और वही एक गांव का गंवार, जिसे हम गंवार कहते हैं ,
उसकी आंखों में देखिए आप !
कितना सौहार्द लगता है उससे मिलकर!
आप  पूर्णत: स्वाभाविक हो जाएंगे।

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