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दन्ती जी - हिन्दी कविता, हिमांशु गौड

।।। दंती जी ।।।

गांव-गांव में यज्ञ,भागवत
कथा कराते दंती जी !
शहरों में जा राहु-केतु
शांत कराते दंती जी!
देश विदेशों के लोगों में
प्रेम बढ़ाते दंती जी!
दुनिया भर के लोगों को
प्राणों से प्यारे दंतीजी!
।।१।।

दन्ती जी अब दिल्ली आकर
लोगों का उद्धार करो
कालसर्प से डसे हुओं का
जल्दी से उपचार करो
शनि ग्रह की बाधा काटो
सुखवर्षा की बौछार करो
दन्तीजी ! अपने लोगों से
सदा सदा तुम प्यार करो
।।२।।

कभी कभी जब दंती जी
कुछ पागल से हो जाते हैं
आसमान में घने घने जब
बादल से हो जाते हैं
मंत्रोच्चारण करते करते
आपा भी खो देते हैं
नाना भूत प्रकट होकर के
इनके चरण भिगोते हैं
।।३।।

पूरब से पश्चिम तक लेकर
लोग पुकारें - दंतीजी !
उत्तर से दक्षिण तक लेकर
लोग पुकारें - दन्तीजी!
आसमान धरती पर गूंजे -
दंती! दंती ! दंती जी !
धर्म समाज आवाज लगाए
जल्दी आओ, दन्ती जी!
।।४।।

सत्यसंग में सदा रहें
अपने आश्रम पर रहते हैं
समय-समय पर धर्म-कर्म
का मर्म सभी से कहते हैं
श्रद्धालु लोगों में भक्ति
का नित ही संचार करें
तरह-तरह से लोगों का
भवसागर से उद्धार करें
।।५।।

भंडारों में जहां-तहां
पंगत में बैठें दंती जी !
खीर और पूड़ी को खाते ,
खुश होते हैं दंती जी!
जजमानों का मान बढ़ाते,
सिर मुंडवाते दंती जी !
बटुकों के गंजे सिर पर
सतिये  धरवाते दंती जी!
।।६।।
-

लेखनसमय - २०१३ या १४ , ठीक से याद नहीं। अंतिम दो अभी लिखे!

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