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तेहरावनी भोज में विद्वत्ता-प्रदर्शन

बात सन् २००६ की है।
कुछ ब्राह्मण, एक तेरहवीं-भोज खाने गए थे ।
वहां पर तेरहवीं से पहले, 
जिसका कोई सगा-संबंधी मरा है , वह एक पत्तल लेता है ,
और सब तेरह ब्राह्मणों के सामने, पत्तल लेकर जाता है ।
और सभी ब्राह्मण उस पत्तल में अपने भोजन में से शुरुआत में एक-एक टुकड़ा ग्रास के रूप में निकाल कर रख देते ,
और वह ग्रास गाय के लिए जाता है ।
तो जब तेहरावनीं खाने जाते थे, तब उन तेरह ब्राह्मणों में विद्वत्ता प्रदर्शन करने की होड़ सी लग जाती थी !
आयोजित कार्यक्रम में कोई कहता था, कि अभी संकल्प बाकी है !
कोई कहता था अभी तो मृतक कर्म का आखरी हिस्सा बाकी है !
कोई मुर्दे का नाम पूछ कर संकल्प करता था!
कोई उसका गोत्र पूछ कर उसमें प्रेत नाम की जगह पितर जोड़ता था !
किसी ब्राह्मण का मानना था कि तेहरावनी खाना एक बहुत ही पुण्य-नाशक कर्म है !
एक ब्राह्मण के समुदाय में तो यह भी प्रचार था
कि अगर हम चिता का उपला (कंडा) लाएं ,
और उसमें छेद करके, भोजन करते हुए पंडतों को देखें,
तो हमें उन ब्राह्मणों की पत्तलों में ,
ब्राह्मणों के साथ-साथ वह मरा हुआ व्यक्ति भी, खाता हुआ दिखता है !
इस तरह की कुछ भ्रांतियां, अज्ञानी लोगों ने भी फैलाई थीं।
लेकिन यह बात तो सही है ,
कि मृतक-व्यक्ति , ब्राह्मणों के माध्यम से भोजन करता ही है।
और ब्राह्मण उस श्राद्ध भोजन के प्रति ग्रह से बचने के लिए गंगा स्नान करते हैं और 10000  बार गायत्री का जाप करते हैं , तब जाकर वह उस श्राद्ध-भोजन को झेल पाते हैं,
लेकिन कुछ ऐसे भी ब्राह्मण है जिन्होंने सैकड़ों तेहरावनीं खा डालीं,
लेकिन जाप बिल्कुल नहीं करते !
ऐसे ब्राह्मणों के चेहरे का तेज नष्ट हो जाता है , और मलिनता आ जाती है ।
एक हमारे साथ भिक्षानंद भी था!
उसे बड़ी उत्सुकता रहती थी,  विद्वत्ता दिखाने की !
अब, एक बार जब वह एक तेरहवीं में जजमान से (जोकि गंजा था) बोला - " अब आप जरा पत्तल लेकर और घूम जाइए हम उसमें गोग्रास डालेंगे" !
जजमान थोड़ा गंभीर और एक्स्ट्रा जानकार टाइप का आदमी था ,
उसने कहा - "हमें भी पता है पंडित जी! " लेकिन उससे पहले आप मृतक व्यक्ति का अपने शरीर में विन्यास कर लीजिए ,
और मृतक का ध्यान भी करना जरूरी है।"
उसके बाद उस तेरहवीं के आचार्य पेटूराम जी ने उससे कहा - "कि थोड़ा शांत रहा कर! हर जगह विद्वत्ता दिखाना सही नहीं रहता!"

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