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श्रीवाचस्पतिमिश्रेभ्य: पत्रम् - हिमांशुर्गौड:


वाचस्पते ! कुलपते ! ‌‌‌बुध! मिश्रवर्य!
नूनं समस्तजनतासुखदायितत्त्वं
धृत्त्वा चरेदथ भवानपि संस्कृतश्री-
संवर्धनाग्रसरणो गणमान्य! भाति।।१।।
श्रीमन् ! हिमांशुरिति यो लिखतीह पत्रं
सोsस्मत्पुराणपुरुषैर्द्युतिलब्धमोदो
गौडो गिरैकशरणो गिरिजापतिं च
स्मृत्त्वा, समस्तसुखतामिव याति सद्य:।।२।।
श्रीसंस्कृतोल्लसितवाक्स्रवितामृतानि
पातुं , समुत्सुकजनो भ्रमतीह चित्तैर्-
दृष्ट्वा हि कंचिदतिशिष्टविशिष्टभाव-
पुष्पं, द्विरेफ इव वा हृदि हृष्टरूप:।।३।।
कुत्र भ्रमानि मुहुरेव किमुत्सृजानि
किं शब्दरूप इव वा करवाणि वायौ
भ्रान्तोsप्यदृश्य इव वा मनसां विरूपै:
संलोकते क्वचिदनाप्तसुवर्णलोकान्।।४।।
कस्मै निवेदयतु वा हृदि जातभावान्
कं ध्येयमत्र  पुरुषोsपि यथार्थयेद्वा
वार्तामनेककुसुमोच्चयभूगतां क:
रम्यां पिबेदथ सुधामिति निश्चित: कै:।।५।।
उत्तरे सुप्रदेशेsस्मिन् संस्कृतोद्धारकारणै:।
प्रचाराचारसंचारा: भ्रमन्ति भवतां जना:।।६।।
कुत्रचित्पाठनं कुर्याच्छोभायात्रा क्वचिच्चरेत्।
पठेयुस्संस्कृतं सर्वे ध्येय इत्येव नापर:।।७।।
गृहे गृहे गिरा दैवी स्याल्लक्ष्यं हृदि संधरेत्।
सर्वदा संस्कृतेनैव भाष्यतां हास्यतां जनै:।।८।।
कुत्रचिच्चायचर्चा स्यात्क्वचित्संस्कृतमेलनम्।
कवितागायनं चैव प्रतियोगित्त्वकारणम्।।९।।
बालेषु छात्रसंघेषु प्रचारोsस्य विधीयताम्।
तेनैव संस्कृतोत्कर्षश्चित्ते चैतन्निधीयताम्।।१०।
श्रीमन् ! यूट्यूबमार्गेण शिक्षा संस्कृतसारिणी।
द्रुतं सौष्ठवमापन्ना संसारे सुलभा भवेत्।।११।।
मयापि स्वीयकाव्यानि संस्कृतच्छन्दसां चयै:।
दृश्यश्रव्यस्वरूपेण स्थापितानि यथा तथा।।१२।।
कार्यार्थं गतवान् प्रयागनगरे कुम्भोत्सवे श्रीजले
स्नातुं , तत्र विराजितो शतमखैर्युक्तो महामण्डप:
यत्र श्रीकरपात्रयत्यभिसृतं धर्मादिसम्भाषणं
जातं, त्र्यम्बकचेतनेश्वरयतेस्तत्रैव होराद्वयम्।।
स्थित्त्वा दर्शनमालभीति भवतो शिष्यैर्वृतस्याsध्वरे
देवीवाक्चरणो भवानिति ततो ज्ञात्त्वा जनैर्निर्गत:
स्थानं स्वं , क्व चरेद्द्विजोsपि झटिति श्रौतार्थदं सत्फलम्
ये चाद्यापि कलौ सुरार्चनरता: धन्या: हि ते सज्जना:।।१३।।
अधुना परिवारेषु प्रेममात्रं न दृश्यते।
धनार्थं धावमानाश्च यन्त्रवद्भान्ति मानवा:।।१४।।
सोदरौ च मिथश्शत्रू जातौ सम्पत्तिकारणै:।
माता पिताsधुना पुत्रैर्गण्येते नहि कुत्रचित्।।१५।।
गुरुशिष्यसुसम्बन्धो नष्टो, मैत्री परस्परम्।
वित्तमाश्रित्य जायन्ते विवाहा:, न गुणाश्रिता:।।१६।।
विप्रकन्यापि शूद्रेण पित्रा नूनं विवाहिता।
सर्वकारीयवृत्तिश्चेत् जातिश्चापि न लोक्यते।।१७।।
सुशीलोsपि युवा विद्वान् सुन्दरश्च गुणान्वित:।
अनूढस्सीदतीवाद्य अल्पवित्तश्च चेद्भवेत्।।१८।।
अश्वत्था: न तथैवाम्रा: निम्बा: नष्टा पुरेष्वपि ।
सर्वत्र मृत्युदं वायौ वाहनाद्यै: प्रदूषणम्।।१९।।
भूजलस्तरहानिश्च तापमानाभिवर्धनम्।
हिमखण्डा: गलन्तीव नद्यो नश्यन्ति भारते।।२०।।
महिष्यश्चाप्यजा: गावो विलुप्ता: नगरेषु हा।
ग्रामेष्वेता: न सर्वत्र, लोक्यन्ते चैव कुत्रचित्।।२१।।
दुग्धं घृतं न तक्रं वा कुत्रापि लभ्यते मधु।
लुप्तप्राया: प्रजायन्ते भैषजानि वनस्पति:।।२२।।
मच्चित्ते हि महाचिन्ता प्रादुर्भूता विलोक्य तत्।
कथं जीवनमद्धा  हा प्राणिनां स्यात्सुरक्षितम्।।२३।।
कृषियोग्यासु भूस्वद्य भवनानि महान्ति च।
निर्मीयन्ते गृहाण्येवं कृषिहानिर्भवेत्तत:।।२४।।
जनसंख्याप्रवृद्ध्या वा फलान्यन्नान्यपांसि हा।
नश्यन्ति द्रुतवेगेन कोsप्यत्र चिन्तितो नहि।।२५।।
विकासो वा विनाशो वा किं ब्रूमो वयमत्र च।
लाभा: न्यूना: हि विज्ञानैर्विनाशस्सर्वतोsधिक:।।२६।।
प्रकृतिं यो विनश्येच्चेत् तं प्रकृतिर्विनश्यति।
अज्ञात्वा नियमं चेमं विज्ञानी नाशतत्पर:।।२७।।
गंगा गोदावरी नष्टा कालिन्दी च सरस्वती।
धर्मकर्माणि नष्टानि जनानां हृदयानि च।।२८।।
उद्घाटनाय मनसि प्रभवेद्विचार:
सच्छात्रभृद्गुरुकुलं प्रकृतिश्रितं च
वृक्षादिरोपणरता: जलरक्षिणश्च
स्युर्यत्र गोप्रियजनाश्शिवशास्त्रमग्ना:।।२९।।
मित्रैरपीह बहुधाsथ समर्थितोsस्मि
अध्यापनादिगतिभि: परिहर्षितोsस्मि
संरक्षणाय बहवस्सुहृदो नियुक्ता:
वित्तैकवाप्तिरिव वाsल्पतमत्त्वमेति।।३०।।
वांछामि चैव मतिमन् सुरवाग्भिरेवं
सम्भाषणेषु कुशला: प्रकृतेस्सुरक्षां
कुर्युस्तथा विषयमेतदधीत्य शोधै:
ग्रामेषु चापि नगरेषु निबोधयेयु:।।३१।।
यद्राजनीतिगतमेव विशिष्टतथ्यं
किं सर्वकारकृतलोकहितं सुकार्यं
राष्ट्रेsधुना भवति किं त्विह जाग्रताश्च
स्युस्संस्कृतेन गिरया जनबोधकास्ते।।३२।।
इत्थं ममास्ति सुरवाक्शरण! प्रसाद्यश्-
श्रीकप्रदार्थ इव कश्चिदहो प्रमोद्यो
नानूतनोsपि विषयो प्रकृतिप्रियश्च
यश्चाद्य पत्रदिशया विनिवेदितस्ते।।३३।।
हारित्यमेव परिकल्पयितुं प्रयत्नो
पत्रैश्च संस्कृतसरैस्सरति द्विजोsसौ
भावश्रियं च विदधामि बुधेभ्य एवं
काव्यादिमार्गपथिको लभतां शिवश्री:।।३४।।
***********
प्रेषको हिमांशुर्गौडो
लेखनसमयो दिनांकश्च - ११:०५, गुरुवासर:,२२-०५-२०१९ चायपानानन्तरम्।
स्थानम् - गाजियाबादस्थे गृहे।


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