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तपस्वी पुरुष - आख्यान, हिमांशु गौड

और फिर कई शरद आईं और गईं, वसन्त,ग्रीष्म,वर्षा,शीत,हेमन्त बार बार आ आ कर जाने लगीं , लेकिन उनके तप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उनके तप में कुछ और तीव्रता आ गई , उनका संयम कुछ और गाढ़ा होने लगा , उनके मंत्रों की शक्ति कुछ और बढ़ने लगी,  उनका वैराग्य कुछ और प्रबल होने लगा , उनका शरीराध्यास बिल्कुल नष्टप्राय हो गया , सांसारिक वस्तुएं उनके मन को मोह ना सकीं ।

और तब बहुत वर्षों के बाद,

इस सृष्टि के एकमात्र स्वामी भगवान् वृषभध्वज, अपने महान् तपोमय स्वरूप के साथ प्रकट हुए । उस समय काल का वेग रुक गया, दिशाएं समाप्त हो गई ।

मानों, पंचभूतों से परे जो महादेव हैं, उन्होंने अपनी इच्छा से पांचभौतिक जगत में अपने स्वरूप को दर्शाया।

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संस्कृत सूक्ति,अर्थ सहित, हिमांशु गौड़

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु: हंसा महीमण्डलमण्डनाय हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैस्सह विप्रयोग:।। हंस, जहां कहीं भी धरती की शोभा बढ़ाने गए हों, नुकसान तो उन सरोवरों का ही है, जिनका ऐसे सुंदर राजहंसों से वियोग है।। अर्थात् अच्छे लोग कहीं भी चले जाएं, वहीं जाकर शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन हानि तो उनकी होती है , जिन लोगों को छोड़कर वह जाते हैं ।  *छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति* *तिष्ठन्ति स्वयमातपे।* *फलान्यपि परार्थाय* *वृक्षाः सत्पुरुषा इव।।* अर्थात- पेड को देखिये दूसरों के लिये छाँव देकर खुद गरमी में तप रहे हैं। फल भी सारे संसार को दे देते हैं। इन वृक्षों के समान ही सज्जन पुरुष के चरित्र होते हैं।  *ज्यैष्ठत्वं जन्मना नैव* *गुणै: ज्यैष्ठत्वमुच्यते।* *गुणात् गुरुत्वमायाति* *दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।।* अर्थात- व्यक्ति जन्म से बडा व महान नहीं होता है। बडप्पन व महानता व्यक्ति के गुणों से निर्धारित होती है,  यह वैसे ही बढती है जैसे दूध से दही व दही से घी श्रेष्ठत्व को धारण करता है। *अर्थार्थी यानि कष्टानि* *सहते कृपणो जनः।* *तान्येव यदि धर्मार्थी* *न  भूयः क्लेशभाजनम्।।*...

Sanskrit Kavita By Dr.Himanshu Gaur

शान्तविलास, पण्डितराज जगन्नाथ विरचित

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