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वाल्मीकि रामायण सुंदर कांड में चन्द्र उदय वर्णन

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स पाण्डुराविद्धविमानमालिनीं महार्हजाम्बूनदजालतोरणाम्।
यशस्विनीं रावणबाहुपालितां क्षपाचरैर्भीमबलैस्सुपालिताम्।। (वाल्मीकि
रामायण, सुंदर कांड, 2/56)

परस्पर चिपके हुए सफेद ऊँचे महलों रूपी माला वाली, बहुमूल्य सोने की जालियों से सजे तोरणों वाली, बहुत बलशाली क्षपाचर अर्थात् रात्रिचर राक्षसों और रावण के बाहुओं द्वारा पालित लङ्का में वे (हनूमान् जी) प्रवेश कर गये।

चन्द्रोपि साचिव्यमिवास्य कुर्वंस्तारागणैर्मध्यगतो विराजन्।
ज्योत्स्नावितानेन वितत्य लोकानुत्तिष्ठतेनेकसहस्ररश्मिः।। (वारासुका 2/57)

सहस्र किरणों वाले चन्द्रमा भी तारागणों के मध्य विराजमान होकर सभी लोकों पर अपनी चाँदनी का चँदोवा ताने हुए हनूमान् जी के सहायक- से होकर उदित हो गये।

शङ्खप्रभं क्षीरमृणालवर्णमुद्गच्छमानं व्यवभासमानम्।
ददर्श चन्द्रं स कपिप्रवीरः पोप्लूयमानं सरसीव हंसम्।।(वारा.सुका. 2/58)
वानरप्रवीर हनूमान् जी ने शङ्ख की कान्ति वाले, दूध और मृणाल के रंग वाले चन्द्र को आकाश में इस प्रकार भासमान देखा कि मानो किसी सरोवर में कोई हंस तैर रहा हो।

ततः स मध्यंगतमंशुमन्तं ज्योत्स्नावितानं मुहुरुद्वहन्तम्।
ददर्श धीमान् भुवि भानुमन्तं गोष्ठे वृषं मत्तमिव भ्रमन्तम्।।(5/1)

उसके बाद, धीमान् हनूमान् ने गोशाला के भीतर भ्रमण करते हुए मतवाले साँड़ के समान बार-बार चाँदनी का वितान ताने आकाश के मध्य तारागणों के बीच विचर रहे चन्द्रदेव को देखा।

लोकस्य पापानि विनाशयन्तं महोदधिं चापि समेधयन्तम्।
भूतानि सर्वाणि विराजयन्तं ददर्श शीतांशुमथाभियान्तम्।।(5/2)

शीतल किरणों वाले शीतांशु चन्द्रदेव लोकों के पाप का विनाश कर रहे हैं, महोदधि में ज्वार उठा रहे हैं, सभी प्राणियों को प्रकाशित कर रहे है और ऊपर की उठ रहे हैं- ऐसे चन्द्र को हनूमान् जी ने देखा।

या भाति लक्ष्मीर्भुवि मन्दरस्था यथा प्रदोषेषु च सागरस्था।
तथैव तोयेषु च पुष्करस्था रराज सा चारुनिशाकरस्था।।(5/3)

पृथिवी पर मन्दराचल में, सान्ध्यवेला में सागर में, जल में स्थित कमल में जो लक्ष्मी जैसे सुशोभित होती हैं, वैसे ही चन्द्रमा में शोभायमान थीं।

हंसो यथा राजतपञ्जरस्थः सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः।
वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थश्चन्द्रोपि बभ्राज तथाम्बरस्थः।।(5/4)

जैसे चाँदी के पिञ्जड़े में हंस, मन्दराचल की कन्दरा में शेर और मतवाले हाथी पर सवार वीर सुशोभित होते हैं, वैसे ही आकाश में स्थित चन्द्रमा शोभायमान थे।

स्थितः ककुद्मानिव तीक्ष्णशृङ्गो महाचलश्श्वेत इवोर्ध्वशृङ्गः।
हस्तीव जाम्बूनदबद्धशृङ्गो विभाति चन्द्रः परिपूर्णशृङ्गः।।(5/5)

जैसे तीखे सींगों वाला साँड़, ऊँचे श्वेत शिखर वाला महान् पर्वत (हिमालय), और सोने से जड़े दाँतों वाले हाथी-ये सब सुशोभित होते हैं, वैसे ही हिरण के पूरे-पूरे शृङ्गों के चिह्न से चन्द्रदेव विशेष रूप से सुशोभित हैं।

विनष्टशीताम्बुतुषारपङ्को महाग्रहग्राहविनष्टपङ्कः।
प्रकाशलक्ष्म्याश्रयनिर्मलाङ्को रराज चन्द्रो भगवान् शशाङ्कः।।(5/6)

शीतल जल और तुषार (पाला) के संसर्ग के जिनका दोष नष्ट हो गया है, महाग्रह सूर्य की रश्मियों को ग्रहण करने से अन्धकार रूपी कीचड़ को जिन्होंने नष्ट कर दिया है, प्रकाश-रूपी लक्ष्मी के आश्रय होने से जिनका धब्बा भी निर्मल दिख रहा है, ऐसे भगवान् शशाङ्क चन्द्र आकाश में विराजमान हुए।

शिलातलं प्राप्य यथा मृगेन्द्रो महारणं प्राप्य यथा गजेन्द्रः।
राज्यं समासाद्य यथा नरेन्द्रस्तथा प्रकाशो विरराज चन्द्रः।।(5/7)

जैसे शिलातल पर बैठा शेर, महान् युद्ध में पहुँचा हाथी और राज्य पाकर नरेन्द्र (राजा) सुशोभित होते हैं, वैसे ही प्रकाशमान चन्द्रदेव की शोभा मुखरित हो रही है।

प्रकाशचन्द्रोदयनष्टदोषः प्रवृद्धरक्षःपिशिताशदोषः।
रामाभिरामेरितचित्तदोषः स्वर्गप्रकाशो भगवान् प्रदोषः।।(5/8)

प्रकाशमान् चन्द्र के उदय होने से जिनका अन्धकार रूपी दोष नष्ट हो गया है, राक्षसों के मांसभक्षण जैसे दोष बढ़ गये हैं, रमणियों के चित्तदोष प्रेरित हो गये हैं, ऐसे में भगवान् प्रदोष (प्रदोषकाल) स्वर्ग के समान प्रकाशित (सुशोभित) हो गया है।

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