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बाबा रामदेव के लिए संस्कृत-श्लोकात्मक पत्र


।। योगगुरवे स्वामि-रामदेवाय पत्रम् ।।
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शास्त्राचारपथप्रवर्धितगुरुं नानासुशिक्षाप्रदं
लोकाचारयुतं तथात्मपथिकं कल्याणसंदर्शिनं
श्रीमद्भारतभूप्रियं प्रियकरं प्रेमैकबोधप्रदं
योगाचार्यपदप्रतिष्ठितगुरुं श्रीरामदेवं नुम: ।।१।।
यो योगस्थितमानसोsपि जनताकल्याणकार्ये रत:
धृत्त्वा वित्तयशोगृहाणि पुरुषस्तेभ्य: पृथक् तिष्ठति
यो भोगे समुपस्थितेsपि विरतो ब्रह्मात्मनिष्ठस्सदा
तं योगर्षिगुरुं नुमो जगति वै पातंजलस्थापकम् ।।२।।
के ते वाssत्मसुखं विहाय पुरुषा: लोकाय सौख्यप्रदा:
के वित्तेषु निमज्जिता न रमणीरक्ता भवन्तीव वा
नैरोग्यं ददतीति संयमपरा के सद्गुणप्रेरका:
सर्वेषामिदमेकमुत्तरमहो श्रीरामदेवा हि ते ।।३।।
भो भो व्याकरणप्रिय! श्रुतिविदां मान्यश्श्रुतिश्रीयुत!
श्रीमान्सज्जनवर्धनाग्रसरणोsस्मच्छास्त्रसंरक्षक!
भो विद्वज्जनवित्तमानकरण! ब्रह्मत्त्वविख्यापक!
जीवेद्वर्षशतं भवान् भुवि सदा श्रीरामदेवो गुरु: ।।४।।
त्वं यज्ञप्रिय ! वेदतत्त्ववदनो धीमज्जनैरर्चित:
त्वं कारुण्यनिधिर्दयार्द्रहृदयस्त्वं चार्यमार्गार्चक:
धत्से योगिशिरोमणे! स्वहृदये नैवाभिमानं क्वचित्
तस्मात् त्वां प्रणमामि भो यतिवर! त्वं वै शतं जीवतात् ।।५।।
किं किं चाद्य वदानि ते हि मतिमन् धूर्ता सुमानं गता: 
ये वै निष्कपटास्त एव सकलैर्दुष्टैस्सदा लुण्ठिता:
राजानोsपि धनं ददत्यपि, च ये हाडम्बरं कुर्वते
विद्वान्सं सरलं न कोsपि कविताभूषं समालिङ्गति।।६।।
केचित्संस्कृतसुप्रचारकरणायार्थं मुदा भुञ्जते
केचिच्चापि पदप्रतिष्ठितजना: आत्मीयमायुञ्जते
हा हा निश्छलतोच्छलज्जलरव: कस्मिञ्जने गुञ्जति
दृष्ट्वैतत्कविताsपि शोचति कवे:, धैर्यं न को मुञ्चति ।।७।।
केचिच्चाटुवचो ब्रुवन्ति धनिनामग्रे प्रलब्धुं धनम्
केचिद्यान्ति पदं द्रुतं , कुलपते: पादावलेहादिह
विक्रीणन्ति चरित्रमेव च परे भोगाय च प्रत्यहं
नैष्कापट्यविलुप्तिरद्य सततं संलोक्यते चाभित:।।८।।
(मन्ये भूतलवास एव ह कवे: नाद्योचितं वर्तते।।)
श्रीमन्! योगविबोधकारिपुरुष! त्वं सत्पथे वर्तसे
नैषा चाद्य तवोन्नतिश्च कुजनेभ्यो रोचते कर्हिचित्
तस्मात्ते , भवतां समुक्तवचसामन्यार्थविज्ञापनात्
सर्वत्राsपयश:प्रसारणरता: धास्यन्ति किं तेsशुभम् ?।।९।।
योsयं चाद्य हिमांशुरित्यभिहितो गौडश्च पत्रं लिखेत्
सोsयं काव्यविलासकारिपुरुषैर्ज्ञेयो मनोमोदक:
नाsहं विज्ञसभासु यामि मतिमन्! जानाति को मादृशम्
पद्यैरुल्लसितैस्सुगन्धितसुमैर्ग्रन्थामि मालां च ते।।१०।।
क्व रामदेवो भुवि योगिराड् हो
हिमांशुगौडो द्विजराट् क्व लोक्य:
हृज्जात-भावाश्रितकाव्यवल्लीं
तनोमि पद्मालयसौख्यमल्लीम्* ।।११।।
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*पद्मालयस्य सौख्यं मल्लीत्याख्यं पुष्पम् , अथवा मल्ली चन्द्रिकेति ज्ञेया ।
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प्रेषको हिमांशुर्गौडो लेखनसमयो दिनांकश्च - ०२:०८ मध्याह्ने, २८/०९/२०१९
गाजियाबादस्थे गृहे।
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