Skip to main content

द्व्यक्षरी श्लोक - सिर्फ दो अक्षरों से रचित श्लोक

सरससारसरं सरसस्सरे-
स्सरिरसौ रसिराससरोरिरास्-
सर रसासुसरे सुरसंसरिस्
सररसासरसौरसरारसे: ।।

विच्छेद:

प्रथमपङ्क्ति:-
(हे परमात्मन् त्वं)

सरस: - रसेन सहित:, यस्सार: (कस्यापि वस्तुनस्तत्त्वभूत:, यथा दुग्धस्य घृतमित्यादि)(अर्थात् त्वं सरस एव सारोसि),  तस्य सर:, तं
(त्वं) सरस: सरे:! (तादृक्त्वं = सरससारसरत्त्वं सरसीति वा - सरससारसर: (त्वं सरसस्सन्नपि सरेरित्यर्थ:))

हे परमात्मा ! आप खुद रसवान् हैं और फिर सरस तत्त्व भूत पदार्थ वाले (सर) सरोवर या जल को प्राप्त करते हैं या वहां गतिमय दिखते हैं।

द्वितीयपङ्क्ति: -

एवं च, त्वमसौ सरि: (निर्झरोसि) (सृ अच् इन्) , रसीनां य: रास: , तं ये सरन्तीति रसिराससरा:, तेषामपि ये उरिण: (ऋ गतौ इत्यस्मात्कर्तर्यचि उर:, पश्चादिनि ) तेषु (तन्मनस्सु) अपि रा: ( रासीति रा:) इति रसिराससरोरिरा इति चापि त्वमसीति भाव:!
(नह्यत्र सान्तो रूढश्च उरस्-शब्दश्शङ्क्य:, अपितु यौगिकोऽकारान्तश्च इन्नन्तो सहृदय इत्यर्थको ग्राह्य: )

हिंदी -

आप खुद बहुत (सरिन्) झरने जैसे गतिमान् स्वरूप वाले हैं और रसिक लोगों (रसिन्) का जो आनंद है , उसको जो प्राप्त करते हैं (रसिराससरा:) , ऐसे लोगों को भी गति प्रदान करने वाले मनुष्यों (रसिराससरोरिण:) के मन में (या उन लोगों में) आप (रातीति रा:) रमण करने वाले हैं।

तृतीयपङ्क्ति: -

हे रस! रसधातोरचि,(रस शब्दे आस्वादने वात्र ग्राह्य:, परमात्मवाची), त्वं असुसरे (असून् सरतीति असुसर: प्राणी, तस्मिन्) सर , वहेत्यर्थ:, (त्वं तु) सुरसंसरि: इव (सुरा अपि संसरिण इव यस्मात्) (यदपेक्षया) असि ।

हे रसस्वरूप परमात्मा!
आप इन प्राण धारियों में भी (जीवंतता रूपी) आनंद या ध्वनिस्वरूप बनकर बहते हो । अरे! आप को देखें तो ये देवता लोग भी संसारी की तरह ही प्रतीत होते हैं।

चतुर्थ -

हे सराणां (गतिशीलिनामथवा जलादिनां) रस!
त्वं असरेषु (अगतिशीलेषु , आलस्ययुतेषु) सौर इव (शनैश्चर इव) सर: (गतिमान्) आरसे: (आस्वादनं करोसीति, अथवा अलसेषु शनिरिव मन्दत्त्वेन सर इव आरसे: शब्दितो भवसीत्यर्थ:)

हे गतिशील जलादि की तरह सरस-स्वभाव वाले!
तुम अगतिक पदार्थों में , या आलसी लोगों में , (न सरन्तीति असरा:, तेषु) भी,  मंदगति स्वरूप सनीचर की तरह शब्दायमान होते हो ।

या फिर

सौर शब्द का अर्थ यदि सूर्य का तेज मानें तो -
हे परमात्मा आप आलसी लोगों या अगतिक पदार्थों में भी तेज स्वरूप बनकर बहने लग जाते हो (मतलब उनको भी तेजस्वी बना देते हो) ।

© हिमांशु गौड़
लेखन समय और दिनांक
१८/०१/२०२०, १२/३० रात्रि ।

Comments

Popular posts from this blog

संस्कृत सूक्ति,अर्थ सहित, हिमांशु गौड़

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु: हंसा महीमण्डलमण्डनाय हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैस्सह विप्रयोग:।। हंस, जहां कहीं भी धरती की शोभा बढ़ाने गए हों, नुकसान तो उन सरोवरों का ही है, जिनका ऐसे सुंदर राजहंसों से वियोग है।। अर्थात् अच्छे लोग कहीं भी चले जाएं, वहीं जाकर शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन हानि तो उनकी होती है , जिन लोगों को छोड़कर वह जाते हैं ।  *छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति* *तिष्ठन्ति स्वयमातपे।* *फलान्यपि परार्थाय* *वृक्षाः सत्पुरुषा इव।।* अर्थात- पेड को देखिये दूसरों के लिये छाँव देकर खुद गरमी में तप रहे हैं। फल भी सारे संसार को दे देते हैं। इन वृक्षों के समान ही सज्जन पुरुष के चरित्र होते हैं।  *ज्यैष्ठत्वं जन्मना नैव* *गुणै: ज्यैष्ठत्वमुच्यते।* *गुणात् गुरुत्वमायाति* *दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।।* अर्थात- व्यक्ति जन्म से बडा व महान नहीं होता है। बडप्पन व महानता व्यक्ति के गुणों से निर्धारित होती है,  यह वैसे ही बढती है जैसे दूध से दही व दही से घी श्रेष्ठत्व को धारण करता है। *अर्थार्थी यानि कष्टानि* *सहते कृपणो जनः।* *तान्येव यदि धर्मार्थी* *न  भूयः क्लेशभाजनम्।।*...

Sanskrit Kavita By Dr.Himanshu Gaur

शान्तविलास, पण्डितराज जगन्नाथ विरचित

 विशालविषयाटवीवलयलग्नदावानल- प्रसृत्वरशिखावलीविकलितं मदीयं मनः। अमन्दमिलदिन्दिरे निखिलमाधुरीमन्दिरे मुकुन्दमुखचन्दिरे चिरमिदं चकोरायताम्‌॥१॥ अये जलधिनन्दिनीनयननीरजालम्बन ज्वलज्ज्वलनजित्वरज्वरभरत्वराभङ्गुरम्‌। प्रभातजलजोन्नमद्गरिमगर्वसर्वङ्कषै- र्जगत्त्रितयरोचनैः शिशिरयाशु मां लोचनैः॥२॥ स्मृतापि तरुणातपं करुणया हरन्ती नृणा- मभङ्गुरतनुत्विषां वलयिता शतैर्विद्युताम्‌। कलिन्दगिरिनन्दिनीतटसुरद्रुमालम्बिनी मदीयमतिचुम्बिनी भवतु कापि कादम्बिनी॥३॥ कलिन्दगिरिनन्दिनीतटवनान्तरं भावयन्‌ सदा पथि गतागतक्लमभरं हान्‌ प्राणिनाम्‌। लतावलिशतावृतो मधुरया रुचा संभृतो ममाशु हरतु श्रमानतितरां तमालद्रुमः॥४॥ वाचा निर्मलया सुधामधुरया यां नात्ग शिक्षामदा- स्तां स्वप्नेऽपिन संस्मराम्यहमहंभावावृतो निस्त्रपः। इत्यागः शतशालिनं पुनरपि स्वीयेषु मां बिभ्रत- स्त्वत्तो नास्ति दयानिधिर्यदुपते मत्तो न मत्तोऽपरः॥५॥ पातालं व्रज याहि वा सुरपुरीमारोह मेरोः शिरः पारावारपरम्पराहत यदि क्षेमं निजं वाञ्छसि श्रीकृष्णेति रसायनं रसय रे शून्यैः किमन्यः श्रमैः॥६॥ मृद्वीका रसिता सिता समशिता स्फीतं निपीतं पयः स्वर्यातेन सुधाप्यधायिकतिध...