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।।नरवर वाले श्री बाबा गुरु जी : संक्षिप्त भावोदयन।।



हमारे गुरु जी ने न जाने कितनी बार दूसरों के लिए संस्कृत कविता और श्लोक बनाकर दिए, सिर्फ इस शर्त पर कि हमारा नाम मत लेना या लिखना !
मतलब इतनी कीर्ति से विमुखता!
जहां लोग जरा-जरा सी बात पर कॉपीराइट का केस लगा देते हैं !
अपनी छोटी-मोटी संस्कृत श्लोक, कविताओं की किताब पर भी, बड़े बड़े अक्षरों में अपना नाम फोटो ऊपर नीचे लिखवाते हैं !
वहां एक इस संसार में कोई ऐसे भी पुरुष हैं, जो कभी भी अपने नाम का कहीं जिक्र नहीं चाहते !
सभी शास्त्रों का दिव्य ज्ञान करने के साथ-साथ संस्कृत कविता एवं श्लोक बनाने में भी महारत हासिल होने के बावजूद
वे कभी भी स्वयं के लिए काव्य लिखते नहीं!!
उनका कहना है इससे भी मनुष्य को प्रसिद्धि की इच्छा रहती है , ऐसी इच्छा रहती है कि हमारा काव्य सब सुनें!
इससे लौकिकता की आशाएं जगती हैं, इसलिए हम काव्य वगैरह नहीं लिखते !
शास्त्रों में ब्राह्मणों के उचित जो जो कर्म बताए गए हैं उन सभी का पालन वे हमारे श्री गुरुजी करते हैं !
प्रातस्स्मरणीय १००८ स्वामिश्री विष्णु-आश्रमजी-महाराज से शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करने के बाद एवं आजीवन स्वयं की महान् तपस्या के दौरान ही उनके ज्ञानचक्षु साक्षात् शैवलोक से कनेक्ट हो गए हैं।

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ब्राह्मण के लिए नाचना, गाना, बजाना - सब निषेध !
ऊपर के वस्त्र नीचे के वस्त्र पहनना - सब निषेध!
साबुन लगाना, तेल मालिश करना - यह भी निषेध !
(गुरुजी ने नैष्ठिकब्रह्मचर्य व्रत धारण करने के कारण, उनके नियमों के अनुसार ही तेल आदि को संपूर्ण जीवन में त्याग दिया है।)
(गुरु जी किसी श्लोक का भी कभी पूर्ण लयबद्ध तरीके से गाकर पाठ नहीं करते, ब्रह्मव्रती मुमुक्षु के लिए तन्निषेधत्त्वात्)
(अंग्रेजी पद्धति का पूर्णतः त्याग)
( अंग्रेजी दवाओं का पूर्णतः त्याग!
(जब तक मरने की स्थिति न हो जाए))
(यद्यपि शास्त्रों में तेल मालिश का निषेध नहीं है , फिर भी जो लोग जीवनपर्यंत अपने शरीर में तेल नहीं लगाते , वे मरने के बाद स्वर्णमय शरीर प्राप्त करते हैं।)
उन्होंने अपने जीवन में शीशा, कंघा, तेल, शैंपू का कभी प्रयोग नहीं किया !
वे जीवन में कभी फिल्म नहीं देखे, और कोई भी खेल नहीं खेलें।
मतलब जितने भी मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति आदि शास्त्रों में जो धर्म बताए हैं , उनका सभी सांसारिक लोगों की तुलना में बहुत अधिक कड़ाई से पालन करने वाले श्री बाबा जी हैं!
आपको आश्चर्य होगा यह जानकर, कि उन्हें यह भी नहीं पता कि सचिन तेंदुलकर कौन है ? और माधुरी दीक्षित कौन है ?
ऐसे पुरुष भी संसार में हैं !
और उनका नाम है - परमपूज्य गुरुदेव "श्री श्याम सुंदर शर्मा जी " !
नरवर के "श्रीसाङ्गवेद संस्कृत महाविद्यालय" के पूर्व प्रधानाचार्य एवं दर्शन विभागाध्यक्ष !
जिनको लोग "श्रीबाबागुरुजी" के नाम से जानते हैं ।
बड़े-बड़े पदों पर उनके शिष्य प्रतिष्ठित हैं! हमको उनसे ही हमेशा विद्या प्राप्त करने का अवसर मिला !
आपको पता है कि यह चंद्र और सूर्य संसार में क्यों घूम रहे हैं ?
क्यों इनकी मुक्ति नहीं हुई ?


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क्योंकि ब्रह्मतत्त्व के उपदेश के समय इनकी परीक्षा हेतु भगवान् ने एक तीव्र शब्द पीछे से उत्पन्न किया, तब सूर्य और चंद्रमा ने सिर्फ एक बार गर्दन घुमा कर देख लिया था ,
तब भगवान ने कहा -  "अरे, तुम्हारी अभी तक इस संसार में आसक्ति है!"
"ब्रह्म तत्व का ज्ञान चाहते हो और फिर भी इस संसार के शब्द में आसक्त  हो गए !"
"जाओ तुम घूमते रहो!"
तब से सूर्य और चंद्र घूम (संसारापन्न) रहे हैं !
कहने का मतलब यह है कि
       "रुक जाता परमार्थ वहीं,
             यदि राग रहा कौपीन में भी!"
ऐसे महापुरुष इस संसार में बहुत कम होते हैं।
लेकिन आज खुद नरवर के लोग भी इनसे इनकी विद्या का लाभ नहीं ले पा रहे हैं!
विद्यार्थी में तो अनुष्ठान-आसक्ति होने की वजह से , और शिक्षक स्वयं के ही अभिमान में चूर होने की वजह से !
मेरा तो यही मानना है कि
उस स्थान पर रहने वाले सभी प्राणियों को श्रीबाबाजी से संपूर्ण
शास्त्रलाभ अवश्य लेना चाहिए!
तभी उनका वहां निवास सफल है ।
इन्हीं गुरुजी के आश्रम (आध्यात्मिक विद्यालय हनुमद्-धाम) में 10 साल निवास के दौरान,
मैंने जो इनकी जीवनचर्या देखी,
इनके जो गुण देखे,
और इनका जो व्यक्तित्व देखा,
उसी का वर्णन सौ श्लोकों में , मैंने अपने इस संस्कृत-काव्य "श्रीबाबागुरुशतकम्" में किया है,




जोकि हिंदी सहित है , और मेरी प्रथम प्रकाशित पुस्तक भी!
जिसका प्रकाशन, True Humanity Foundation द्वारा नवंबर 2019 में हो चुका है ! http://www.truehumanityngo.com/about/

श्रीबाबा गुरु जी की वीडियो देखें -




हर हर महादेव।
© आचार्यो हिमांशुर्गौड:
२३/०१/२०२०, ०१:०० मध्याह्न ।


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Comments

  1. आने बाले 10 सालो के बाद ऐसे महापुरुष मिलना नामुमकिन हो जाएगा

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