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।।ब्रह्मलीन स्वामी श्री आनंद आश्रम जी महाराज के लिए श्रद्धांजलि।।(हिन्दी सहित)


।।ब्रह्मलीन स्वामी श्री आनंद आश्रम जी महाराज के लिए श्रद्धांजलि।।
...............(हिन्दी सहित)...........
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।।श्रीआनन्दाश्रमजीमहाराजाय श्रद्धाञ्जलि: ।।
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श्रीबाबागुरुराश्रमे यतिनुतं प्रेम्णा निवासं ह्यदात्
तद्वै निम्बतरोस्तलस्थभवने मन्नेत्रवर्ति ध्रुवं
काषायेन सुवेष्टितं धरति यो दण्डं स्वहस्ते सदा
भ्राम्येद्यश्च सनातनध्वजधरोऽद्य ब्रह्मलोकङ्गत:।।१।।

जिन साधु पुरुष को श्री बाबा गुरु जी ने प्रेम पूर्वक चातुर्मास निवास अपने आश्रम में दिया था उनका वह बाबा की कुटिया स्थित कक्ष नीम के पेड़ के नीचे था, वह मेरे समक्ष था । वे साधु पुरुष एक भगवा रंग के कपड़े से लिपटा हुआ दंड धारण करते थे ! और सनातन धर्म का झंडा हाथ में लेकर, इस संसार में घूमते थे ! आज वे ब्रह्मलीन हो गए हैं।।१।।

साङ्ख्याद्यध्ययने रतोऽस्मि हनुमद्धामातिरम्याश्रमे
दृष्टस्तत्रहरीशजप्यनिरतश्शास्त्रिद्वितीये मया
चायात: कपिमन्दिराद्यतिवरो गङ्गावगाहप्रियश्-
श्रीओमादिपदप्रियावृतगुरु: "आनन्दपूर्वाश्रम:"।।२।।

यह मेरे सन् 2008 (शास्त्री द्वितीय वर्ष) का यह दृश्य देखो - मैं हनुमत् धाम नामक अति रमणीय आश्रम में, सांख्य दर्शन के अध्ययन में लगा हुआ हूं , वहीं मैंने श्री हनुमान मंदिर नामक स्थान से आए हुए, हरि नाम का जाप करते हुए, इन महात्मा को देखा, गंगा नहाना जिन्हें प्रिय था , और वह अनेक, श्रीओम आदि वैयाकरण बटुकों से घिरे हुए गुरुजी थे! जिनका नाम था श्रीआनंदआश्रमजी महाराज।।२।।

यं पश्यामि यदा कदा स्वमनसि श्रेयोऽर्थसञ्जीविनं
येनैवात्र मुदा  सदा नरवरे वास: कृतश्श्रद्धया
सारल्ये स च बालवद् व्यवहरेत् सौख्याननो भ्राम्यति
"आनन्दाश्रम"नामभाग् यतिवरो गोलोकवासं गत: ।।३।।

कल्याण रूपी तात्पर्य में ही जीने का है स्वभाव जिनका - ऐसे उन महात्मा पुरुष को में यदा-कदा अपने मन में देखता ही रहता हूं! जिन्होंने इस नरवर नामक भूमि पर श्रद्धा पूर्वक निवास किया ! और जो बच्चे की तरह सरल हैं, और खुशमिजाज तरीके से रहते हैं, वे आनंद आश्रम जी महाराज , आज गोलोक धाम को प्राप्त किए।।३।।

य: खर्वोऽपि विशालहृद् द्विजबटुप्रेमार्पणे संरत:
प्रायो यो वसति स्म वै हनुमतो गङ्गातटस्थालये
यस्याप्याश्रमसन्निवासिपुरुषा: बालाश्च विद्यार्थिन:
नूनं स्नेहसुसिक्तमानसहृदस्स ब्रह्मलीनोऽधुना ।।४।।

जो कम लंबाई वाले भी , बहुत विशाल हृदय वाले थे ! और बच्चों को बहुत प्रेम करते थे! जिन का निवास प्राय: हनुमान मंदिर में ही रहता था और जिनके आश्रम पर रहने वाले लोग, बच्चे और विद्यार्थी निश्चय ही बहुत स्नेहपूर्ण मन और हृदय वाले हो जाते थे , वे स्वामी जी आज ब्रह्मलीन हुए।।४।।

हे हे विप्रसुरागरञ्जितयते! हे विष्णुनामामृत!
हे हेमादिविवर्जितश्शुभवपुष्! हे श्रीकपीशालय!
हे हेमाद्रिशुभाधिवासिशिवराड्ध्यायिन्! मुदा भ्राजितस्-
त्वं नूनन्द्विजराजहार्दिकजन:कैश्चिन्न वै विस्मृत:।।५।।

अरे ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले स्वामी जी! अरे विष्णु नाम के अमृत को पीने वाले स्वामीजी! अरे सोना चांदी से दूर रहने वाले स्वामीजी! आपका स्वरूप हनुमान मंदिर के अनुकूल ही है ! हे हेमाद्रि रूप शुभ में वास करने वाले भगवान् शिव का ध्यान करने वाले स्वामी जी ! आपकी कीर्ति अमर रहे ! आप नरवरस्थ ब्राह्मणों के ह्रदय में वास करते हैं ! और आपको कौन भूल सकता है? ।।५।।

स्मारं स्मारमहं च तं शुभयतिं दृश्यं ह्युपास्थापयम्
येष्वेतेन सहाऽवसं नरवरे बाबागुरोरालये
वेदान्तादिपदप्रतिष्ठितजनैस्सम्मानितश्शोभितो
ऽहोऽस्माकं स सताम्प्रियोऽतिविमलोऽद्य ब्रह्मतत्त्वं गत:।।६।।

जिन दिनों में , मैं इन स्वामी जी के साथ श्रीबाबागुरुजी के आश्रम में रहा,  मैंने उन दिनों का ही स्मरण करते हुए , यह दृश्य उपस्थित कर दिया है !
जब  वेदांत , व्याकरण आदि से प्रतिष्ठित लोगों के द्वारा सम्मानित और शोभित ,
ये सज्जनों के प्रिय, अति निर्मलचित्त वाले, वहां रहते थे !
और आज ये  ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए, मैं इन्हें श्रद्धांजलि देता हूं।।६।।

दृश्येऽस्मिंश्च मनीषशर्मसुजनश्शिष्योऽस्य संलोक्यते
यश्श्रीभागवतादिवाचनरतो भ्राम्येत्सदा भूतले
दुर्वासादिकनैकशिष्यविनतं श्रीमद्धिमांशुप्रियं
आनन्दाश्रमसाधुमद्य मनसा सञ्चिन्तये भावुकम् ।।७।।

इस चित्र में श्री मनीष शर्मा जी जो कि इनके प्रिय शिष्य हैं, वे इनके के पैर छूते दिखाई दे रहे हैं , ये मनीषशर्माजी आजकल भागवत आदि का वाचन करते , इस संसार में घूमते हैं !
और श्रीदुर्वासा आदि अनेक शिष्यों से प्रणाम किए जाते हुए , और इस हिमांशु गौड़ के प्रिय, अत्यंत भावुक , श्रीआनंदआश्रम स्वामीजी को आज मैं स्मरण करता हूं।।७।।©
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तत्स्नेहाद्रो हिमांशुर्गौडो
लेखनकालो दिनाङ्कश्च
१२:३० मध्याह्ने, ०२/०२/२०२०
गाजियाबादस्थे गृहे

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