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महाकवि माघ





माघ माऽघवतो घूकान् क्षमस्व कवितामुखान्।
माघौघवीक्षका: माऽघं यात माघेऽघघातिनि।।
हे माघ! एतान् अघवतो  घूकान् (उलूकानिव
कवीन्) (प्रशंसार्थे - अन्धकारेऽपि दर्शनत्वात् , अन्धकारमयेऽपि लोके स्वकाव्यकृतप्रकाशप्रदातृत्वात् कवीनां घूकत्त्वम्,) (निन्दार्थे - घूकवद् रात्रिचरत्वात् रात्रिरत्र पापपर्याया , (कवयोऽपि प्रायोऽधुना यशोधनादिकामा निन्द्यकर्मरक्ता: भवन्ति, तदेव पापकर्म नरकान्धत्त्वदायित्त्वेन रात्रिरूपोदाहृतिरत्र, अतो घूकत्त्वं कवीनाम्) (गर्हार्थस्वीकृत्यैवार्थसिद्धिरत्र)

कवितामुखान्  मा क्षमस्व (विध्यर्थिलोट्)।
द्वितीयपक्षे - एतान् माघवतो (माघकाव्यसंरक्तान् , अथवा माघ-मास-कृत-स्नान-दानान्) घूकान् (प्रशंसापक्षे) क्षमस्व (एतेषां पापानि क्षमस्व) ।
किन्तु ये अघघातिनि माघमासे माघकाव्यस्य औघवीक्षका: (तत्र काव्यौघे कृष्णचरितपठनजातपुण्यशालिन:) ते अघं मा यात (विध्यर्थिलोट्) न यान्तीत्यर्थ:।
© हिमांशु गौड़
१२/१२ रात्रौ,११/०२/२०२०

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