Skip to main content

एक चुड़ैल की कहानी : आचार्य हिमांशु गौड़



आज शाम 6:00 बजे से ही आसमान में काले काले बादल मंडराने शुरू हो गए ।

 ठंडी हवाएं चलने लगीं।

और फिर अचानक बारिश शुरू हो गई।

मैं अपने उसी शांत एकांत कमरे में बैठा हुआ खिड़की से बाहर का दृश्य देख रहा था ।

 फिर मैं उठा और बाहर आ कर दरवाजा खोल, बारिश को देखने लगा !

एक ठंडा सा एहसास मन-मस्तिष्क में प्रवेश किया , तो एक ताजगी सी महसूस हुई ।

कब तक खड़ा रहता, सो अंदर आया, और अपने बेड पर आ लेटा ।

आज सांझ से ही मन में उस गुड़िया का ख्याल आ रहा था, जो सबसे पहले दीनानाथ शिरोडकर को एक पोस्ट के जरिए मिली थी।

 और उसके बाद शिरोडकर साहब के घर में, मनहूस खामोशियों का सिलसिला सदा के लिए कायम होता चला गया।

शिरोडकर साहब आज नितांत अकेले हैं ।

उनकी पत्नी जो 5 साल पहले गुजर चुकी हैं।

 उनकी कोई संतान नहीं है ।

45 साल की उम्र में शिरोडकर , इस भरी दुनिया में तन्हाई की जिंदगी गुजार रहे हैं।

और फिर मैं, अपनी सोचो में गुम हो गया।

शिरोडकर साहब से मेरा परिचय तब हुआ , जब मैं सक्सेना साहब के घर में महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने के लिए गया था ।

सक्सेना साहब का मेरे ऊपर इतना विश्वास था , कि वह मुझ, छोटी आयु के पंडित को बुलाते थे ।

सक्सेना साहब का इकलौता लौंडा , राहुल सक्सेना !
जिसकी उम्र 25 साल थी , कार एक्सीडेंट के कारण जिंदगी और मौत से जूझ रहा था ।

सक्सेना साहब का रात के 10:00 बजे मेरे पास फोन आया ।
मैंने तुरंत बस पकड़ी और , दिल्ली , सक्सेना साहब के घर के लिए रवाना हो गया ।
एक प्राइवेट हॉस्पिटल में उनका लड़का भर्ती था । उन्होंने मुझसे कहा - पंडित जी ! कुछ हो सकता हो तो करिए!
 मैंने तुरंत महामृत्युंजय मंत्र का जाप शुरू कर दिया ।
3 दिन बाद लड़का खतरे से बाहर हो गया था ।

भगवान की कृपा ही इसमें कारण थी।

मैंने उन्हें बताया कि मंत्र का जाप तो सभी करते हैं, लेकिन मंत्र के साथ आत्मीयता कोई-कोई ही बिठा पाता है ।

यह एक ऐसी विद्या है ,जो कभी-कभी जिंदगी भर जपते रहने वाले को भी वैसा फल नहीं देती , जैसा कम जपने वाले को भी कभी-कभी दे जाती है ।

मतलब कुल मिलाकर इस अध्यात्म विद्या, इस मंत्र शक्ति के विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता ।

किसी किसी का पूर्व जन्मों का पुण्य इतना प्रबल होता है , कि उसकी छुई हुई मिट्टी भी तलवार का काम करती है ।

और वह इस संसार में प्रसिद्ध होता है।

 साधक का शुद्ध ह्रदय, तपस्या की पवित्रता, और इष्ट देव की कृपा -  यही मंत्रों से सब कामों को सिद्ध करती हैं।

खैर, कुल मिलाकर, बेटे के ठीक हो जाने के कारण तब से सक्सेना साहब बहुत खुश हैं ।

जिस दिन महामृत्युंजय-मंत्र का हवन था, उसी दिन राहुल को देखने के लिए दीनानाथ शिरोडकर जी भी आए हुए थे , जोकि सक्सेना साहब के ही खास दोस्त थे।

 सक्सेना साहब की उम्र लगभग 50 साल थी ।
वे बिल्कुल तरोताजा दिखाई पड़ते थे।
इस उम्र में भी रोजाना खूब भागदौड़ करते थे।

 सक्सेना साहब की स्टील की फैक्ट्री भी काफी अच्छा चल रही थी।

सक्सेना साहब कभी भी नहीं भूलते, कि कैसे वह एक साधारण दुकानदार से एक स्टील की फैक्ट्री के मालिक बने।

आज से 10 साल पहले जब उनकी साधारण स्टील के बर्तनों की दुकान थी , तब मेरा उनसे परिचय गंगा जी के घाट पर हुआ।

 मैं बैठा हुआ माला फेर रहा था ।
सक्सेना साहब आए और मुझसे अपना हाथ देखने के लिए कहा।
 मेरी उम्र उस समय सिर्फ 18 वर्ष थी ।

मैंने साधारण रूप से कहा कि आपका शनि का पर्वत उठा हुआ है, आप लोहे या स्टील के क्षेत्र में अच्छा बिजनेस कर सकते हैं ।

 मैंने उन्हें कुछ शनि के मंत्रों का जाप बताया।

 इस समय उनकी हालत ऐसी नहीं थी कि वह जाप के लिए ब्राह्मणों को बैठा पाते , सो मैंने मात्र ₹1 में ही उनके लिए शनि के मंत्रों का संपूर्ण जाप पूरा किया।

शनि देवता की अंगूठी और एक यंत्र बनवा कर अभिमंत्रित कर उनके गले में डाला।

 सक्सेना साहब दिन-ब-दिन उन्नति करने लगे ।
 फिर तो हर वर्ष ही वह किसी न किसी देवता का अनुष्ठान कराने लगे ।
और इस प्रकार सक्सेना साहब ने पीछे मुड़कर नहीं देखा ।
आज उनका अच्छा खासा स्टील का बिजनेस है ।
तो बात हो रही थी , शिरोडकर साहब की।

 हवन वाले दिन शिरोडकर साहब मुझसे मिले ।
उसके बाद उन्होंने मुझे एक हवन करने के लिए अपने घर बुलाया ।
तब उनकी पत्नी जिंदा थी ।
मैंने उनसे पूछा- हवन क्यों कराना चाहते हैं?

मेरे कई बार पूछने पर भी उन्होंने कुछ नहीं बताया ।

कोई बात नहीं ।

जब यह अंधेरी रात , इस दुनिया में उतरी ,
तब मैं निद्रा देवी के प्रभाव में आया।

और अभी मेरी पहली झपकी लगी ही थी, कि मुझे ऐसा एहसास हुआ कि कहीं दूर से किसी औरत के रोने की आवाज आ रही है।

 मेरी नींद उचट गई!

 मैंने ध्यान लगाकर सुना!

 वह मेरे कमरे से बाहर थी !

मैं समझ गया कि यह कोई बुरी आत्मा है!

 मैंने अपना मृत्युंजय रक्षा कवच निकाला, और उसे पहन कर, गंगाजल के छींटे अपने शरीर पर मारे , और बाहर आया !

पूरे घर में टार्च लेकर मैं घूम आया , लेकिन कहीं भी कोई नहीं !

शिरोडकर साहब और उनकी पत्नी सोए हुए थे , मैंने उन्हें जगाना उचित नहीं समझा!

यह पूजा का पहली ही तो रात थी।
 खैर , मैंने मृत्युंजय-कवच को उतारा और दोबारा अपनी थैले में रख दिया और सो गया।
 वह कोई रात के 3:00 बजे थे, जब एक साथ कई बिल्लियों के रोने की आवाज के साथ ही तेज आंधी चलने लगी।

 और उसी आंधी के साथ मेरी खिड़की भी खुल गई ।

अब मैं समझ गया कि मामला कुछ और ही है ।
मैंने ऐसे बड़े बड़े जिन्नात देखे थे जिनका सताया आदमी पानी नहीं मांगता !

ऐसी बहुत सी चुड़ैल देखीं थीं, जो आदमी की छाती पर चढ़ जाया करती हैं !

इसलिए मैं इससे अधिक डरता नहीं था।

 मैं उठा और खिड़की से बाहर झांका ।
बाहर पेड़ों के पत्तों की सांय-सांय की आवाज़ थी सिर्फ !

बिल्लियों की आवाज बंद हो चुकी थी !

मैंने कुछ अपने सिद्ध किए हुए मंत्रों का जाप किया ,और फिर सो गया ।

लगभग 5:30 बजे मैं उठा , और नित्य कर्म से फारिग होकर पूजा वाले कमरे में पहुंचा।

 लगभग 7:00 बजे तैयार होकर शिरोडकर साहब पूजा वाले कमरे में आए ।

मैंनें घूरते हुए कहा - "देखो शिरोडकर जी! मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं, कि आपके घर में कुछ ना कुछ गड़बड़ है !"
"और कुछ ऐसी गड़बड़ , जिसके बारे में आपने मुझसे बताया नहीं !
यह बात ठीक नहीं है ।"

मेरी इतना कहना था कि शिरोडकर साहब की पत्नी फूट-फूट कर रोने लगी।

.........
.............. क्रमशः।
१०:४९ रात्रि, ३०/०४/२०२०

Comments

Popular posts from this blog

संस्कृत सूक्ति,अर्थ सहित, हिमांशु गौड़

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु: हंसा महीमण्डलमण्डनाय हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैस्सह विप्रयोग:।। हंस, जहां कहीं भी धरती की शोभा बढ़ाने गए हों, नुकसान तो उन सरोवरों का ही है, जिनका ऐसे सुंदर राजहंसों से वियोग है।। अर्थात् अच्छे लोग कहीं भी चले जाएं, वहीं जाकर शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन हानि तो उनकी होती है , जिन लोगों को छोड़कर वह जाते हैं ।  *छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति* *तिष्ठन्ति स्वयमातपे।* *फलान्यपि परार्थाय* *वृक्षाः सत्पुरुषा इव।।* अर्थात- पेड को देखिये दूसरों के लिये छाँव देकर खुद गरमी में तप रहे हैं। फल भी सारे संसार को दे देते हैं। इन वृक्षों के समान ही सज्जन पुरुष के चरित्र होते हैं।  *ज्यैष्ठत्वं जन्मना नैव* *गुणै: ज्यैष्ठत्वमुच्यते।* *गुणात् गुरुत्वमायाति* *दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।।* अर्थात- व्यक्ति जन्म से बडा व महान नहीं होता है। बडप्पन व महानता व्यक्ति के गुणों से निर्धारित होती है,  यह वैसे ही बढती है जैसे दूध से दही व दही से घी श्रेष्ठत्व को धारण करता है। *अर्थार्थी यानि कष्टानि* *सहते कृपणो जनः।* *तान्येव यदि धर्मार्थी* *न  भूयः क्लेशभाजनम्।।*...

ननकू : हिमांशु गौड: आख्यान

ननकू ! हां यही नाम था उस विद्यार्थी  का जिसकी उम्र इस समय 17 साल थी और वह इस समय बाबा गुरु से प्रौढ़मनोरमा का पाठ पढ़ रहा था । बाबा गुरु जी जिस तरह से उसे पढ़ाते थे वह उसी तरह से कंठस्थ कर के उन्हें सुना देता था । इस तरह से वह उस संपूर्ण विद्या नगरी का होनहार शाब्दिक था बाबागुरुजी का उससे बड़ा प्रेम था । यद्यपि वह बहुत ही चंचल था वह नए-नए कौतुक करता था लेकिन फिर भी अपनी अत्यंत तीव्र बुद्धि के कारण वह व्याकरण के आचार्य काशी में प्रख्यात और अधुना नरवर के व्याकरण  पढ़ाने वाले श्री ज्ञानेंद्र आचार्य का भी अत्यंत प्रिय होने के साथ-साथ पढ़ने वाला शिष्य था । ज्ञानेंद्र आचार्य उसके विषय में सदा यह कहते थे कि ननकू तो बना बनाया ही विद्वान है । इसको तो बस अपने संस्कारों का उदय मात्र करना है । इस तरह से मनुष्य अपने पूर्व पुण्यों के आधार पर इस जन्म में तीक्ष्ण बुद्धि को प्राप्त करता है और उससे ही वह शास्त्रों का वैभव प्राप्त कर सकता है लेकिन यह सब पुण्य पर ही आधारित है । कोई कोई तीव्र बुद्धि का होते हुए भी विद्वान् नहीं बन पाता लेकिन कोई साधारण बुद्धि का होकर भी विद्वत...

श्रीबाबागुरुशतकम् (हिन्दीभावार्थ सहित) संस्कृत काव्य, डॉ. हिमांशु गौड़

    श्रीबाबागुरुशतकम् प्रणेताऽनुवादकश्च – आचार्यहिमाँशुगौडः       सर्वाधिकारः प्रकाशकाधीनः प्रथम-संस्करणम् - नवम्बर, २०१९ २०० प्रतयः   ।। श्रीगुरुं प्रति श्रद्धां कार्तज्ञं च व्यक्तीकुर्वत् शतश्लोकात्मकं काव्यम् ।। _____________________________ Publisher: True Humanity Foundation     Shri BabaGuru Shatkam Author & Translator: Acharya Himanshu Gaur                                                                                                         First Edition:   Nov. 2019 200 Copes Poetry of hundred verses expressing reverence and gratitude for Teacher. ­­­­­­­­_____________________________ Publisher: True Humanity Foundat...