Skip to main content

देहि चरणामृतं मे Himanshu Gaur Sanskrit Geet



हे वासुदेव हे गोवर्धन
 हे शक्तिशील हे सुखवर्धन ।
जगतीत्रयं त्वया धृतं रे
देहि चरणामृतं मे।।१।।

तुलसीसहितं त्वत्स्नानकरं
जलमेतद्वै मम मुक्तिकरं
दुग्धादिपञ्चामृतथ रे
देहि चरणामृतं मे।।२।।

हे पापदहन हे सर्वसहन
हे सत्यकथन हे दिव्यवसन
हे मुग्धकोटिमन्मथ रे
देहि चरणामृतं मे।।३।।


सरितस्सर्वा जलधिस्सकलस्-
तव रूपमिदं कमलं विमलं
एहि मनसोऽन्तरं मे
देहि चरणामृतं मे।।४।।

वंशीवादन सर्वाच्छादन
वाञ्छाफलदोसि विपद्धरण
हर दुर्गतिमत्र शुभागम मे
देहि चरणामृतं मे।।५।।

हे यादव माधव नाकपते
गोलोकपते ध्रुवसत्यपते
भव भवात्तारको मे
देहि चरणामृतं मे।।६।।


राधारमण गोपीरमण!
वृन्दावनदिव्यविलासमणे!
कुरु दृष्टिमिहाच्युत! केशव हे!
देहि चरणामृतं मे।।७।।


तव पादतले मतिरस्तु सदा
तव रूपसुधां च पिबेयमहम्
जनिरोगजरा: जहि नटवर मे
देहि चरणामृतं मे।।८।।

झटितीव च सन्दंशतीह फणि:
सुर मृत्युरसौ , मम जीव्यमणिं
हरति क्षणतस्त्वमिमं हर रे!
देहि चरणामृतं मे।।९।।
***
डॉ हिमांशु गौड़
०१:०७ मध्याह्ने, १८/०५/२०२० गाजियाबादे।

Comments

Popular posts from this blog

संस्कृत सूक्ति,अर्थ सहित, हिमांशु गौड़

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु: हंसा महीमण्डलमण्डनाय हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैस्सह विप्रयोग:।। हंस, जहां कहीं भी धरती की शोभा बढ़ाने गए हों, नुकसान तो उन सरोवरों का ही है, जिनका ऐसे सुंदर राजहंसों से वियोग है।। अर्थात् अच्छे लोग कहीं भी चले जाएं, वहीं जाकर शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन हानि तो उनकी होती है , जिन लोगों को छोड़कर वह जाते हैं ।  *छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति* *तिष्ठन्ति स्वयमातपे।* *फलान्यपि परार्थाय* *वृक्षाः सत्पुरुषा इव।।* अर्थात- पेड को देखिये दूसरों के लिये छाँव देकर खुद गरमी में तप रहे हैं। फल भी सारे संसार को दे देते हैं। इन वृक्षों के समान ही सज्जन पुरुष के चरित्र होते हैं।  *ज्यैष्ठत्वं जन्मना नैव* *गुणै: ज्यैष्ठत्वमुच्यते।* *गुणात् गुरुत्वमायाति* *दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।।* अर्थात- व्यक्ति जन्म से बडा व महान नहीं होता है। बडप्पन व महानता व्यक्ति के गुणों से निर्धारित होती है,  यह वैसे ही बढती है जैसे दूध से दही व दही से घी श्रेष्ठत्व को धारण करता है। *अर्थार्थी यानि कष्टानि* *सहते कृपणो जनः।* *तान्येव यदि धर्मार्थी* *न  भूयः क्लेशभाजनम्।।*...

Sanskrit Kavita By Dr.Himanshu Gaur

ननकू : हिमांशु गौड: आख्यान

ननकू ! हां यही नाम था उस विद्यार्थी  का जिसकी उम्र इस समय 17 साल थी और वह इस समय बाबा गुरु से प्रौढ़मनोरमा का पाठ पढ़ रहा था । बाबा गुरु जी जिस तरह से उसे पढ़ाते थे वह उसी तरह से कंठस्थ कर के उन्हें सुना देता था । इस तरह से वह उस संपूर्ण विद्या नगरी का होनहार शाब्दिक था बाबागुरुजी का उससे बड़ा प्रेम था । यद्यपि वह बहुत ही चंचल था वह नए-नए कौतुक करता था लेकिन फिर भी अपनी अत्यंत तीव्र बुद्धि के कारण वह व्याकरण के आचार्य काशी में प्रख्यात और अधुना नरवर के व्याकरण  पढ़ाने वाले श्री ज्ञानेंद्र आचार्य का भी अत्यंत प्रिय होने के साथ-साथ पढ़ने वाला शिष्य था । ज्ञानेंद्र आचार्य उसके विषय में सदा यह कहते थे कि ननकू तो बना बनाया ही विद्वान है । इसको तो बस अपने संस्कारों का उदय मात्र करना है । इस तरह से मनुष्य अपने पूर्व पुण्यों के आधार पर इस जन्म में तीक्ष्ण बुद्धि को प्राप्त करता है और उससे ही वह शास्त्रों का वैभव प्राप्त कर सकता है लेकिन यह सब पुण्य पर ही आधारित है । कोई कोई तीव्र बुद्धि का होते हुए भी विद्वान् नहीं बन पाता लेकिन कोई साधारण बुद्धि का होकर भी विद्वत...