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।।भाव-महिमा।। हिंदी कविता।। हिमांशु गौड़।। Himanshu Gaur



।। भाव-महिमा ।।
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भावों से घर-बार बना है, ये सारा संसार बना है,
जीवन की आशा से शोभित, खुशियों का त्यौहार बना है।
भावों की लहरें जब-जब,आक्रामक हो टकराती हैं
बड़े-बड़े पर्वतों को , सागर में तुरत डुबाती हैं।।

भावों की नन्ही सी बूंदें , जीवन अमृत कर देतीं,
दुर्भावों की रीत सदा, तन-मन को दूषित कर देतीं,
भाव कि जो छोटे से धागों, में सजते हैं कलाई पर
बहन सुरक्षा हेतु बनें जो, कवचरूप इक भाई पर।।

भावशक्ति से बाबागुरु, सारे शास्त्रों के राजा हैं,
भावों के ही फूल खिले हैं , रंग-बिरंगे, ताज़ा हैं
भाव कि जिनसे कर्म-क्रिया, कर्ता सब सद्गति पाते हैं,
भाव-स्वर-लहरी से गायक, दुनिया नई सजाते हैं।।

भाव कि वे जो गिरने ना दें, अन्धेरों की खाई में,
भाव कि वे जो सुंदरतम सी डोर बहन और भाई में।
प्रेम-भाव में कट-कट कर भी, कोई नित मर सकता है,
सद्भावों की शक्ति से , मानव सब कुछ कर सकता है।।

भाव कि जिनसे देवा ने, गुंडे का हाथ उखाड़ दिया
भाव कि जिनसे तारासिंह ने, हैंडपंप उखाड़ दिया।
भाव कि जिनसे कालिदास और भास काव्य को लिखते हैं,
भाव कि जिनसे पत्थर में , भगवान् , भक्त को दिखते हैं।।

हो कितनी ही दूर वह, स्वर्गों का यदि संसार अमर,
पर भावों के वशीभूत क्षणभर में , हम जाते हैं वहां,
पार्थिव देहों, इन नामों को , मत जरा भी सच्चा मानों तुम,
सद्भावाश्रु देखें जाते हैं, ध्रुव लोकों में सदा वहां।।

भाव कि जिनसे भक्त सदा , हरि-हर को वश में करते हैं
भाव देशभक्ति के धारे, सैनिक रण में मरते हैं
भाव कि जिनसे कवियों की, कविताएं युगों तक जीती हैं
भाव कि जिनसे मीराबाई, हंस कर विष भी पीतीं हैं।।

भाव ही शिव के वीरभद्र हो, दक्ष-यज्ञ विध्वंस किये,
भावस्तुति से प्रकट देवी ने, चंड मुंड विध्वंस किये।
भावों की है महिमा वह , भगवान् धरा पर आ जाएं
भावों के प्राबल्य योग से , महाप्रलय भी आ जाए।।

और अधिक क्या कहूं अगर, हो भावुक सच्चे दिल से तुम,
आज्ञा दो निर्जीवों को भी , वे सजीव हो जाते हैं,
जैसे मेघ, यक्ष-विरही का, ले संदेशा जातें हैं,
जैसे रामनाम-भावों से, पत्थर भी तर जातें हैं।।

है भावों की शक्ति ऐसी, कोई जिसका प्रतिकार नहीं,
सद्भावों से बढ़कर कोई, दुनिया का उपकार नहीं
भूतकाल भी वर्तमान बन, खड़ा सामने हो जाए,
भावों से, बिछड़ा स्नेही जो, युगों बाद भी मिल जाए।।

भावों के ही स्वप्नलोक, बनकर हम पर छा जाते हैं,
हैं दूर बहुत, जो बहुत दूर , वे भी समीप आ जाते हैं,
मत शोक करो, मत चिन्तित हो, ये भाव तुम्हारे निश्चित ही
हों वपुष्मान् और द्युतिमान् ,साक्षात् क्वचिन् मिल जाते हैं।

दानभाव की शक्ति धार कर, कर्ण युगों तक अमर हुए,
सत्यभाव की शक्ति धार कर, हरिश्चंद्र वे अमर हुए,
वीरभाव को प्राप्त शिवाजी, राणा, पूजे जाते हैं,
त्यागभाव से विप्र दधीचि, देहास्थि भी दे जाते हैं।।

कौन जगत् में वीर हुआ, कौन हुआ सबसे महान्
किसकी गाथाओं को गाएं ये, भूत भावि और वर्तमान्
कौन स्वर्ग में देवों से भी , पूजित पाता दिव्य गान
जो सद्भावों से भरा हुआ, हो दयाधर्म ही मूर्तिमान् ।।

वे जटा-जूट रखने वाले वे कालकूट पीने वाले 
वे चंद्रमौलि वे नीलकंठ, वे सदा सदा जीने वाले
वे भाव भक्ति से हो प्रसन्न, भक्तों को दर्श दिखाते हैं 
इसीलिए हम सदा भाव की, महिमा-गाथा गाते हैं।।
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०३:२९ अपराह्णे,१२/०५/२०२०, गाजियाबाद।






भाव महिमा -२
*****
वे जटा-जूट रखने वाले वे कालकूट पीने वाले 
वे चंद्रमौलि वे नीलकंठ, वे सदा सदा जीने वाले
वे भाव भक्ति से हो प्रसन्न, भक्तों को दर्श दिखाते हैं 
इसीलिए हम सदा भाव की, महिमा-गाथा गाते हैं।।१४।।

खुश होकर वे महादेव सौभाग्य नहीं दे सकते क्या?
क्षणिक दृष्टि की शुभता से, दुर्भाग्य नहीं हर सकते क्या?
धन-गुण-विद्या-कलालाप,नृपतादिक,मोक्ष सभी कुछ वे,
सद्भाव-भक्ति-हार्दिकता से, वरदान नहीं दे सकते क्या?१५?

भावों से यह बना चंद्रमा, ग्रह नक्षत्र चमकते हैं,
भावों से ही प्रेरित हो ये सूर्यदेव दमकते हैं,
भावों के ही फूल खिले हैं , रंग-बिरंगे नए-नए
भावों के ही रूप धरे ये, पर्वोत्सव हैं नए-नए।।१६।।

विश्वास-भाव से सराबोर जो काली मंदिर में रहती,
आएंगे मेरे कर्णार्जुन, सबसे जो कहती रहती,
उस बुढ़िया के वे पुत्र पुनः, लौटाते वही रूप लेकर
आकाश भेद , धरती को चीर, विश्वास फला, जन्म लेकर।।१७।।

पितृभक्ति के वशीभूत वह, सरल, सुजन, हीरा ठाकुर,
दुर्भाग्य योग से बना जो अपने , ही घर में मात्र नौकर,
सद्भावों के पुण्यों का , प्रताप भला मिटता है क्या,
मिली नई नायिका उसको, गुणों से आकर्षित होकर।।१८।।

भानुप्रताप जो सिद्धान्तों से नहीं डिगा निज जीवन में,
नहीं किया तनय को जिसने, बेटे सम्बोधन सुखमय,
वही देखकर भाव अंत में, स्नेहभाव से छलक पड़ा,
"हीरा बेटे" कहकर ठाकुर, सूर्यवंश सा झलक पड़ा।।१९।।

केवल ये हैं नहीं कहानीं, ये जीवन की सच्चाई हैं,
चलचित्रों से मिले प्रेरणा, जनता कहती आई हैं,
करुण-वीर-शृङ्गार-हास्य-रस भावों से जो भरा हुआ,
वो कहलाता मानव है, जो पृथक् है , वो है मरा हुआ।।२०।।

अभिनय, गीतों और नृत्यों में भावों का  विज्ञापन है,
नितकर्मों में सब धर्मों में भावों का आवाहन है,
भावों की भाषा चौदह लोकों में समझी जाती है,
हर प्राणी पर भावों की ही भाषा पढ़नी आती है।।२१।।

भावों से दिखती है श्रद्धा, भावों से अश्रु छलकते है
भावुक मंत्रों सद्विधियों से, देव हविष् भी लेते हैं,
शुनश्शेप की भावुक वाणी, मंत्र स्वयं बन जाती है,
वरुणयज्ञ में बलिवेदी से, पाशमुक्त करवाती है।।२२।।

भाव झलकते आंखों से , वाणी से और चेष्टाओं से,
गतिविधियों से, प्रेमपूर्ण या द्वेषपूर्ण चेष्टाओं से,
भावों से बढ़कर नहीं कोई , अनमोल जगत् की वस्तु है,
भावों से हैं रामकृष्ण, ओशो, सुकरात, अरस्तू है।।२३।।

भावों के हैं रूप विविध, भावों की कई कहानीं हैं
 भावों का रिश्ता हार्दिक है, जैसे तरंग औ' पानी हैं,
भावाभाव सुभाव कुभाव प्रभाव विभाव विभेद बहुत,
इन भेदों की बातों से छात्रों की गई जवानी है।।२४।।

अब तो बिकते बाजारों में भाव सभी का मोल लगा,
प्रेम की कीमत मांगे प्रेमी,  प्रेमिकाओं का भाव बढ़ा,
कितने ही भावुक हो जाओ, लोग पसीजें क्योंकर अब,
कलियुग मारामार मचा है, सद्भाव बचें हों क्योंकर अब?२५?

निस्स्वार्थ-भाव अब दंतकथा है, स्वार्थभाव चहुंओर सजा,
भावुक सज्जन प्रेमी से, लें कुटिल धूर्त जन खूब मजा,
कुटिल कामिनी ठगे रोज, भावुक प्रेमी को धनहेतु,
सबका चरित्र बिकता है, दो-दो पैसे की प्राप्ति हेतु।।२६।।

न्यायधीश हों बड़े-बड़े, या डॉक्टर और पुलिस वाले,
नेता, अभिनेता हों या फिर प्रोफ़ेसर कालेज वाले,
भाव-धर्म बिकते हैं सभी के, कीमत कुछ कम ज़्यादा होगी
सद्भावों की बात करें क्या ये तो अमर्यादा होगी।।२७।।

भावों की गहराई को समझें पण्डित टीकाओं से,
भावों की भाषा विस्तृत , सारल्यपूर्ण प्रतिमाओं से,
शास्त्रों के भी भाव अनोखे जो समझे वह आनंदित,
आधा समझे जो रहता है , अभिमानों से आंदोलित।।२८।।
***
०२/४५ रात्रि।१३/०५/२०२०



।। भाव महिमा-३ ।।
****
भाव,मेघ ,माघ में बसते,भाव बसें मधुमास में,
भाव बरसते बादल में हैं, नवयुवता के उल्लास में,
शीत, शिशिर,शरद् आतीं हैं, नये नये भाव लेकर
आता-जाता मौसम कितने रंग रूप भाव देकर।।२९।।

आओ हम विश्राम करें अब, भावों की अमराई में,
बैठें कुछ गुज़रे सालों की, सुस्मृति की पुरवाई में,
कोई हवा का झोंका शायद, कुछ शीतल मन कर जाए
हम लोगों के हृदयों को , सद्भावामृत से भर जाए ।।३०।।

भू धातु और घञ् प्रत्यय से भाव शब्द निष्पन्न हुआ,
उपसर्गों से बंधकर नाना अर्थों में प्रतिपन्न हुआ,
साहित्यिक विद्वानों कवियों ने इसकों सम्मान दिया,
वैयाकरणों ने जनता को भावार्थों का ज्ञान दिया।।३१।।

भाव भावना क्रिया वही है, वही तो है उत्पादना,
धातु अकर्मक से योजित, होती कृत्प्रत्ययभावना,
सोना, होना, हंसना,रोना,जाग, लजाना अर्थों में,
भावार्थि-प्रत्यय होता है, शाब्दिक! नैक सदर्थों में।।३२।।

भावों से ही नये गीत की प्रीत रीत सृजित होतीं,
भावों से मनमीत, राग की उत्कण्ठादि रचित होतीं,
भाव नयन मिलने से उपजें, दो अनजाने लोगों में,
भावों से रिश्ता बनता है, दो अनजाने लोगों में।।३३।।

भावों का उत्कर्ष मनुज को सुरपद तक पहुंचाता है,
नीचभाव के कारण मानव, अध:पतन में जाता है,
सुर नर मुनि जन सब कोई भावों का ही तो भूखा है,
भावहीन तो जीवन मानों बिल्कुल रूखा-सूखा है।।३४।।

मन के भाव प्रकट करें कोई चुप हो कर जीते हैं,
कोई उगलते पीड़ा को, कुछ,मौन भाव से पीते हैं,
टेढ़े मेढे रस्तों वाली जीवन की पगडंडी है,
सद्भावों दुर्भावों की ही सजी हुई यह मंडी है।।३५।।
०४:१९ अपराह्णे,१३/०५/२०२०




भावों की सीमा अनंत है देखो संत फकीरों में
खूब हिलोरें लेते सागर में नदियों के नीरों में
सुंदर-सुंदर भाव उकेरे चित्रकार तस्वीरों में
भावनाओं को बांधों मत तुम लघुता की जंजीरों में ।।३६।।

भावलोक में जो रम जाए, उसको जग से क्या लेना
खुद उसके संसार अलग हैं , बाहर से उसको क्या लेना
भावुकता की दुनिया ऐसी सतरंगी सपने जैसे
सब पराई हो जाएं भले ही, भाव सदा रहते अपने।।३७।।

आओ चले हम दुनिया के उस पार भाव में खो जाएं ,
रंग रंगीले भावों के गोदी में जाकर सो जाएं
 एक यही तो अपने हैं , जो बाद मौत के साथ चले
जीवन भर के रिश्ते-नाते, छोड़ आत्म के साथ चले।।३८।।

सूक्ष्म देह धरते मानव के, भाव देही बन जाते हैं
क्या खोया क्या पाया जग में भाव हृदय में आते हैं
एक अकेला चला अंत में भावों की डोली लेकर 
लुका छुपी खत्म होती है, सांसों की होली लेकर।।३९।।

धन पद संपति मिल जाने पर, किस के भाव नहीं बढ़ते
मान कीर्ति के मिले कौन, अभिमान गगन नहीं चढ़ते
अभिमान-भाव मानुष को नित ही गर्तों में ले जाता है,
एक यही दुर्गुण विनाश की परतों में ले जाता है।।
०४:२३ अपराह्न,१६/०५/२०२०


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