Skip to main content

जुगाड़-महत्त्वम् Sanskrit Kavita Himanshu Gaur

।। जुगाड़-महत्त्वम् ।।
*******
यच्च दूरं दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्।
तत्सर्वं हि जुगाड़ाप्यं जुगाड़ो दुरतिक्रम:।।

महाविद्यालये विद्या-लये वैश्विकरूपके।
सर्वत्रापि जुगाड़ेन शिक्षकत्वमवाप्नुहि।।

नेता मन्त्री तथा तन्त्री सांसदो वा विधायक:।
क्वचिच्चापि पदं याहि जुगाड़ेन कलौ नर।।

येन निश्चीयते नेता देशयन्ता तदप्यहो।
मतदानं प्रवर्धेत जुगाड़ेनैव सर्वथा ।।

यस्य क्वचिज्जुगाड़ो न, कबाड़ोस्ति जनस्स वै।
जुगाड़ेनैव तिष्ठन्ति मूर्खा प्रोफेसरे पदे।।

अपि विद्वान् दयालुर्वा शैवो विप्रो महाकवि:।
जुगाड़स्य ह्यभावेन गृहे तिष्ठत्यवृत्तिक:।।

बहुवर्षतपस्याभि: प्रसीदन्ति न देवता:।
जुगाड़ु-तन्त्रमन्त्रैश्च सद्यस्ते स्यु: फलप्रदा:।।

परीक्षायां जुगाड़ोयं साक्षात्कारे फलप्रद:।
मा पृच्छ कुत्र नासौ वै जुगाड़ो फलति द्विज।।

चाटुकारै: क्वचित् सिध्येत् क्वचिद्दीर्घसुसेवया।
क्वचित्सम्बन्धदेशाद्यै: जुगाड़त्वं प्रजायते।।

मित्रत्वेन क्वचिल्लभ्य: प्रदेशवादजोऽप्यसौ।
शिष्यवादैर्जातिवादैर्जुगाड़स्साधयेत्समम् ।।

न पठेन्न लिखेन्मूढ! श्रमेन्नैवापि कुत्रचित्।
किन्तु सर्वप्रयत्नैश्च "जुगाड़ू भव" सर्वदा।।

ग्रामाध्याक्ष्ये जनाध्याक्ष्ये व्यापारे विनये नये।
जुगाड़: प्रबलो यस्य तस्य कार्यं सुनिश्चितम्।।

उत्तरे सुप्रदेशेस्मिन् शिक्षाक्षेत्रे तु सर्वथा।
नियुक्तौ पुलिसादीनां जुगाड़ो हि महाफल:।।

विवाहे वा प्रवाहे वा सम्बन्धकारणेपि वा
सुन्दरीणां प्रलाभे वा जुगाड़ो फलति द्रुतम्।।

कारयानं द्विचक्री वा पुलिसै रुध्यते सदा।
विना प्रमाणपत्रेण जुगाड़स्तत्र धावति।।
*****

०३/५० अपराह्णे, ०६/०५/२०२० गाजियाबादे।






https://www.dbwstore.com/product-category/all-products/

Comments

Popular posts from this blog

संस्कृत सूक्ति,अर्थ सहित, हिमांशु गौड़

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु: हंसा महीमण्डलमण्डनाय हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैस्सह विप्रयोग:।। हंस, जहां कहीं भी धरती की शोभा बढ़ाने गए हों, नुकसान तो उन सरोवरों का ही है, जिनका ऐसे सुंदर राजहंसों से वियोग है।। अर्थात् अच्छे लोग कहीं भी चले जाएं, वहीं जाकर शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन हानि तो उनकी होती है , जिन लोगों को छोड़कर वह जाते हैं ।  *छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति* *तिष्ठन्ति स्वयमातपे।* *फलान्यपि परार्थाय* *वृक्षाः सत्पुरुषा इव।।* अर्थात- पेड को देखिये दूसरों के लिये छाँव देकर खुद गरमी में तप रहे हैं। फल भी सारे संसार को दे देते हैं। इन वृक्षों के समान ही सज्जन पुरुष के चरित्र होते हैं।  *ज्यैष्ठत्वं जन्मना नैव* *गुणै: ज्यैष्ठत्वमुच्यते।* *गुणात् गुरुत्वमायाति* *दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।।* अर्थात- व्यक्ति जन्म से बडा व महान नहीं होता है। बडप्पन व महानता व्यक्ति के गुणों से निर्धारित होती है,  यह वैसे ही बढती है जैसे दूध से दही व दही से घी श्रेष्ठत्व को धारण करता है। *अर्थार्थी यानि कष्टानि* *सहते कृपणो जनः।* *तान्येव यदि धर्मार्थी* *न  भूयः क्लेशभाजनम्।।*...

ननकू : हिमांशु गौड: आख्यान

ननकू ! हां यही नाम था उस विद्यार्थी  का जिसकी उम्र इस समय 17 साल थी और वह इस समय बाबा गुरु से प्रौढ़मनोरमा का पाठ पढ़ रहा था । बाबा गुरु जी जिस तरह से उसे पढ़ाते थे वह उसी तरह से कंठस्थ कर के उन्हें सुना देता था । इस तरह से वह उस संपूर्ण विद्या नगरी का होनहार शाब्दिक था बाबागुरुजी का उससे बड़ा प्रेम था । यद्यपि वह बहुत ही चंचल था वह नए-नए कौतुक करता था लेकिन फिर भी अपनी अत्यंत तीव्र बुद्धि के कारण वह व्याकरण के आचार्य काशी में प्रख्यात और अधुना नरवर के व्याकरण  पढ़ाने वाले श्री ज्ञानेंद्र आचार्य का भी अत्यंत प्रिय होने के साथ-साथ पढ़ने वाला शिष्य था । ज्ञानेंद्र आचार्य उसके विषय में सदा यह कहते थे कि ननकू तो बना बनाया ही विद्वान है । इसको तो बस अपने संस्कारों का उदय मात्र करना है । इस तरह से मनुष्य अपने पूर्व पुण्यों के आधार पर इस जन्म में तीक्ष्ण बुद्धि को प्राप्त करता है और उससे ही वह शास्त्रों का वैभव प्राप्त कर सकता है लेकिन यह सब पुण्य पर ही आधारित है । कोई कोई तीव्र बुद्धि का होते हुए भी विद्वान् नहीं बन पाता लेकिन कोई साधारण बुद्धि का होकर भी विद्वत...

श्रीबाबागुरुशतकम् (हिन्दीभावार्थ सहित) संस्कृत काव्य, डॉ. हिमांशु गौड़

    श्रीबाबागुरुशतकम् प्रणेताऽनुवादकश्च – आचार्यहिमाँशुगौडः       सर्वाधिकारः प्रकाशकाधीनः प्रथम-संस्करणम् - नवम्बर, २०१९ २०० प्रतयः   ।। श्रीगुरुं प्रति श्रद्धां कार्तज्ञं च व्यक्तीकुर्वत् शतश्लोकात्मकं काव्यम् ।। _____________________________ Publisher: True Humanity Foundation     Shri BabaGuru Shatkam Author & Translator: Acharya Himanshu Gaur                                                                                                         First Edition:   Nov. 2019 200 Copes Poetry of hundred verses expressing reverence and gratitude for Teacher. ­­­­­­­­_____________________________ Publisher: True Humanity Foundat...