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गल्पाष्टकम् Sanskrit Kavita Himanshu Gaur



"ऑडी" तिष्ठति मद्गेहे किन्त्वहं सरलोऽस्मि भो:।
आटोद्वारा ह्यतो यामि महागल्पी वदेदसौ।।१।।

पितृव्य: सांसदो मेऽस्ति भ्राता चैव विधायक:।
दरोगां भाययेदेवं मित्राणां नायकोऽभवत्।।२।।

व्हिस्लरीमेव नान्यच्च पिबेच्चेद् भारतागता ।
गल्पिराज: सुहृत्स्वाह - लन्दने मे पितुस्स्वसा।।३।।

महाधनानि मे सन्ति किन्तु नाहं प्रदर्शये।
इत्युक्त्वा गल्पिराजोऽसौ प्रभावं वर्धयेत्स्वकम्।।४।।

महाशीला महाविज्ञा सुन्दरी च गुणान्विता।
सर्वकारिवरं वाञ्छेदित्याह गल्पवान् पिता।।५।।

परस्वं निजमाकृत्य दर्शयेच्चेद् वरोऽपर:।
लन्दने चास्ति मे वृत्तिरेकलक्षं सुवेतनम्।।६।।

एवं गल्पप्रभावेण धनाढ्यां स वधूत्तमाम्।
प्राप्नुतेऽद्य विना यत्नैरहोऽसत्यस्य वञ्चना।।७।।

 वस्त्रं दासांस्तथा यानं भाटकेन गृहीतवान्।
तर्जयेद् रक्षिवर्गं च गल्पासत्यविडम्बर:।।८।।

गल्पाष्टकमिदं यो वै धारयेदाचरेज्जन:।
श्रद्धाविश्वाससंयुक्त:,सर्वत्र पूज्यते स वै।।
***
© हिमांशुर्गौडो
११:५९ मध्याह्ने, १८/०५/२०२० गाजियाबादगृहे।

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