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।। दुष्टवञ्चकैर्हता हस्तिनी ।। संस्कृत श्लोक।। हिमांशु गौड़


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का भावना मम भवेन्न विनिश्चिनोमि
दु:खप्रकाशवचसा न गतीस्तनोमि
किं मानवत्त्वमिति नापि धियाऽद्य मन्वे
ताङ्गर्भिणीञ्च गजिनीन्निहतां विलोक्य।।१।।

विश्वस्तचित्तगजिनी क्षुधयार्त्तचित्ता
गर्भस्थशैशवविचिन्तितमानसा या
साऽरण्यखाद्यमविलभ्य पुरं समेता
सारल्ययुग्गजवरी मरणं प्रयाता ।।३।।

विस्फोटकान्तरभवं फलमेतदर्थं
दुष्टा ददत्यथ, गजी न विलोक्यमाना
शुण्डे निधाय स्वमुखे स्वदनं यतेत
अस्फोटदाननमतो महती च पीडा।।४।।

नूनङ्क्षुधा न परिपश्यति किं ह्यनर्थं
ये पाशवा न विविदन्ति च कूटनीतिं
किन्त्वद्य मानव इतीह पदाख्यजाति:
पापाब्धिमग्नहृदयेव विभाति मह्यम्।।५।।

या चेह हस्तिपदकास्ति विलुप्तजातिस्-
तल्लोपकारण इवाग्रसरो मनुष्य:
वृक्षान्नदीरथ पशूंश्च विनश्य हैते
कामुन्नतिं प्रतिवजन्ति न कोऽपि वेत्ति।।६।।

विज्ञान-नाम-नरका: स्युरिवोन्नता: किम्?
मांसादना असुहरा प्रतियात पुष्टिम्?
पश्वैकनिर्दयमना इह मानवाख्यश्?
चेन्, नास्म्यहं नरगणे , पशुरेव वर्य:।।७।।

स्वस्याङ्गुलिर्यदि भवेत्त्रुटितोऽपि भिन्ना
चीत्कारपूर्वकमसौ परिरोदितीव
यश्चाजकुक्कुटगलञ्च निकृन्तयन्सञ्
जिह्वासुर: क्षणमसौ न दयान्दधाति।।८।।

नो केवलङ्गजगणस्य चरन्तु चर्चाम्-
प्राणप्रियत्त्वमथ सर्वजने जगत्याम्
मृत्युं न काङ्क्षति, द्विजा! लघुकीटकोऽपि
यो हन्ति तं स नरकेषु शतेषु याति।।९।।

चेद्वा भ्रमन्ति शतमानवताभिवादा
नास्त्येकतोऽपि पशुरक्षणधर्मवादो
म्लेच्छैर्निहन्यत इयं त्वबला सुजातिस्
तत्त्राणकारणपथे न नृपाश्चरन्ति।।१०।।

विक्रीय मांसमपि कोटिसहस्रमूल्यं
वैदेशिकेभ्य इत, एति गवादिनां यल्
लक्षाधिकं पशुनिकृन्तनमन्वहं मे
सद्भारते कथमहं सुखतो भवानि।।११।।

यन्निर्बलाक्षमपशूद्धननं नरत्वं,
किं वा भवेदित उताप्यधमत्वमेव?
सद्धर्मपुस्तकशतै: परिभाष्यते यत्
तज्जीवरक्षणमहो सुजनाश्चरध्वम्।।१२।।

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डॉ.हिमांशुगौड:
०९:१६ पूर्वाह्णे,०४/०६/२०२०
गाजियाबादस्थगृहे।

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