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संस्कृत कविता - वर्षन्ति मेघा: - डॉ हिमांशु गौड़



वर्षन्ति मेघाश्च गृहाद्बहिर्मे
भावाम्बुदाश्चित्ततले तथैव
रात्रौ तृतीते प्रहरेऽधुनाहं
जागर्मि विद्वन्निति जीवनम्मे।।१।।

शीतानिलो मां स्पृशति क्वचिच्च
गताद्य विद्युत् तमसां च राज्ये
पुरे न जागर्ति जनोऽन्य एवं
यथाहमत्रारचयामि चिन्त्यम्।।२।।

मेघध्वनिश्चाम्बुनिपातशब्दो
विशत्यहो कर्णयुगे सुखङ्कृत्
मृद्गन्धिराप्नोत्यपि नासिकां मे
मध्ये क्वचिच्छ्वेततडित्सशब्दा।।३।।

कीटश्च कश्चित् सततं विरौति
गेहे पुरस्थे मशका न सन्ति
न वायुनाढ्यं गृहमेतदस्ति
लङ्कादिशामुख्यकपाटवत्वात्।।४।।

वृष्टिस्सुतीव्राप्यधुना पतेच्च
पार्श्वस्थकक्षे जनकोऽपि शेते
स वा कदाचिद्यदि जागृतस्स्यात्
शेतुं वदेन्मामिति मेऽस्ति शङ्का।।५।।

हे काव्यराजो झटिति ब्रुवन्तु
हे शब्दराजो मन उद्दिशन्तु
केयं गतिर्मां नयतीव यात्र
वृष्ट्यम्बुरावश्रवणैकलोके।।६।।

कोऽहं हिमांशुर्न न वेद्मि किञ्चित्
किं वा शिवांशुर्वचसा गृणानि?
अहोऽनुभूयैव सदात्मलोकं
ह्यस्मादृशा: सूक्ष्मतया वहन्ति।।७।।

उत्थाय मध्याह्नभवे च सूर्ये
पित्रिष्टलोकस्य चरामि चर्यां
अरे मदीयं हृदयस्थतत्त्वं
कोऽस्मीति यानि क्व च संवदेर्माम्।।८।।

भ्रान्तो न वै चेति विवेद्मि तथ्यं
किन्त्वाप्लक्ष्योपि न चाधुनास्मि
न स्वप्नलोको मन आवृणोति
न जागृतिर्मां विशतीव पूर्णा।।९।।
****

०३:३० रात्रौ,३१/०५/२०२०

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