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चंद्रमा : कविता हिन्दी/संस्कृत : डॉ हिमांशु गौड़



चन्द्रमा
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जो है देता सुकूं चांदनी खूबसूरत
प्रभांशु के जैसा सुलगता नहीं है,
है शीतल सदा शीतरश्मि-प्रदाता ,
हिम-विखण्डों के जैसा पिघलता नहीं है
है हिमांशु वही जो बदलता नहीं है।।

वही है गुरु गौरवाढ्य प्रधी है
शिवांशु सुधांशु वही तो सुधी है
विमुग्धाएं , नक्षत्रिणी उसपे सारी
स्मरान्धाओं का एक वो कामधी है।।

दिनों के उजाले तो कर्मण्यता को
सिखाते , दिखाते हमें रास्तें हैं
मगर कल्पनाओं की रंगीन-जन्नत-
निशा-कौमुदी* ही मेरे वास्ते है।।
*शब़-ए-चांदनी

कहीं दूर जब-जब ये चंदा निकलता
हसीं ख्वाब सी दिलकशी को सजाए
तमन्नाओं के तब-तब गुलिस्तां महकते

है कैसी महक , रूप कैसा है तेरा
अरे चंद्रमा! मोह फैला है तेरा
ये संसार तो यूं ही चलता रहा है
मगर तू युगों से चमकता रहा है।

ह हिल्लोलसक्तासु नव्यां रतिं त्वं
तनोषीश ! रम्ये तडागस्य तीरे
रतेषूच्चकाट्टालिकाषु प्रभूणां
रतिश्रान्तिहन्! रागीनीश! प्रणौमि।।

क्वचिच्चोच्चकुच्यो भवन्तं विलोक्य
स्मरन्त्यस्स्मरासक्तचित्तास्स्वकान्तान्
कपाटाग्रवक्षोदृढाश्लेषदक्षान्
स्ववक्षोग्रजातान्मुहुर्मर्दयन्ति।।

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