Skip to main content

फिल्म – हिना । गीत – जाने वाले, ओ जाने वाले । संस्कृतम् - हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् !


Text Box: फिल्म – हिना । गीत – जाने वाले, ओ जाने वाले । संस्कृतम् - हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् ! 


हिन्दी
संस्कृतम्
सदा न बुलबुल नगमें गाये
सदा न फसले बहारा
सदा न हुस्न जवानी रहते
सदा न सोहबतें यारा

रब जाने किस दामण के लिए
कौन सा गुल चुनता है
कहते है सच्चे दिल की दुवाये
 जल्द खुदा सुनाता है

तेरा अल्लाह निगेहबान
तेरा मौला निगेहबान
तेरा अल्लाह निगेहबान
तेरा मौला निगेहबान ओ ओ ओ ओ………

जानेवाले ओ जानेवाले
जानेवाले ओ जानेवाले

किया तुझे हमने
किया तुझे हमने
ख़ुदा के हवाले

जानेवाले ओ जानेवाले
जानेवाले ओ जानेवाले
तेरा अल्लाह निगेहबान
तेरा मौला निगेहबान
तेरा अल्लाह निगेहबान
तेरा मौला निगेहबान

कोई मुश्किल न आये
तेरी राहों में
पोहंचे साथ ख़ैरियत के,
अपनी मंज़िल की बाहों में

कोई मुश्किल न आये,
तेरी राहों में
पोहंचे साथ ख़ैरियत के
अपनी मंज़िल की बाहों में

तुझे तेरी मंज़िल
तुझे तेरी मंज़िल, गले से लगाले

जानेवाले ओ जानेवाले
जानेवाले ओ जानेवाले

तेरा अल्लाह निगेहबान
तेरा मौला निगेहबान
तेरा अल्लाह निगेहबान
तेरा मौला निगेहबान

ओ ओ ओ
यह बेलौस चाहत, यह बेदाग़ नाते
जहां में कहाँ
लोग ऐसे निभाते

तुम्हारी मुहब्बत भूला न सकूंगा
तुम्हारा यह एहसान चुका ना सकूंगा

दिए ज़िन्दगी के,
दिए ज़िन्दगी के तुम्ही ने उजाले

दिलवाले दिलवाले
दिलवाले दिलवाले

मेरा दिल न चाहे
मेरा दिल न चाहे के
तुमसे विदा ले

दिलवाले दिलवाले
दिलवाले दिलवाले

नायिका -

तू है दिल के करीब, दूर आँखों से
हम तन्हाईयों में, बातें करे तेरी यादों से

तू है दिल के करीब, दूर आँखों से
हम तन्हाईयों में, बातें करे तेरी यादों से

फूल से दिल पर,
फूल से दिल पर, पड़ गए छाले

जानेवाले ओ जानेवाले

सदा खुश रहे तू
सदा खुश रहे तू
ये मेरी दुआ ले

जानेवाले ओ जानेवाले
जानेवाले ओ जानेवाले

तेरा अल्लाह निगेहबान
तेरा मौला निगेहबान……

मूलगीतलेखक - रविन्द्र जैन
सदा पिकानां नो मधुगानं
सदा न वै मधुमास:
सदा युवत्वं नैव तिष्ठति
सदा न प्रियतमसङ्ग:

जानातीश एव स कस्मै
किं पुष्पं विचिनोति
उक्तं, छलरहितस्य प्रार्थनाम्
स्सद्यश्शृणोति

तव शम्भू रक्षयिता,
 तव शम्भु: पालयिता
तव शम्भू रक्षयिता,
 तव शम्भु: पालयिता..... ओ ओ ओ ओ...

हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् ! 
हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् ! 

कृतस्त्वं मया रे!
कृतस्त्वं मया रे!
ईशार्पित एव

हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् ! 
हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् ! 
तव शम्भू रक्षयिता
तव शम्भु: पालयिता
तव शम्भू रक्षयिता
तव शम्भु: पालयिता.....

काचिन्नेयाद् विपत्तिस्-
तव मार्गे
प्राप्यो लक्ष्यस्त्वया 
सौगम्येन

काचिन्नेयाद् विपत्तिस्-
तव मार्गे
प्राप्यो लक्ष्यस्त्वया 
सौगम्येन

गन्तव्यं लभेस्स्वं
गन्तव्यं लभेस्स्वं,  मोदेन प्रगन्त:!

हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् ! 
हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् ! 

तव शम्भू रक्षयिता,....
तव शम्भु: पालयिता......
तव शम्भू रक्षयिता....
तव शम्भु: पालयिता......

ओ ओ ओ
अच्छला तव प्रीति: , पवित्रात्मबन्ध:
जगत्यां जना: क्वैवं
मिथो निर्वहन्ति

प्रेम तवैतन्न विस्मर्तुमर्हम्
न कार्तज्ञमेतच्च विस्मर्तुमर्हम्

त्वयैव प्रदत्ता:
त्वयैव प्रदत्ता: ,  जीवनप्रकाशा:

हृदयवन् हे! रे हृदयवन् मे
हृदयवन् हे! रे हृदयवन् मे

न वाञ्छामि त्वत्तो
न वाञ्छामि त्वत्तो
 विरहतां कदापि

हृदयवन् हे! रे हृदयवन् मे
हृदयवन् हे! रे हृदयवन् मे

नायिका -

 त्वं हृदयस्थोसि,  नेत्रतो दूर:
रहसि समावृण्वन्ति,  ते स्मृतयो मां

त्वं हृदयस्थोसि,  नेत्रतो दूर:
रहसि समावृण्वन्ति,  ते स्मृतयो मां

पुष्पवद् हृदये
पुष्पवद् हृदये, घात इव जातो

हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् ! 

सदा भू: प्रसन्नस्-
सदा भू: प्रसन्नस्-
त्वियं प्रार्थना मे

हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् ! 
हे प्रयात्रिन् ! हे रे प्रयात्रिन् !

तव शम्भू रक्षयिता
तव शम्भु: पालयिता......

संस्कृतानुवादकः - हिमांशुगौडः


Comments

Popular posts from this blog

संस्कृत सूक्ति,अर्थ सहित, हिमांशु गौड़

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु: हंसा महीमण्डलमण्डनाय हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैस्सह विप्रयोग:।। हंस, जहां कहीं भी धरती की शोभा बढ़ाने गए हों, नुकसान तो उन सरोवरों का ही है, जिनका ऐसे सुंदर राजहंसों से वियोग है।। अर्थात् अच्छे लोग कहीं भी चले जाएं, वहीं जाकर शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन हानि तो उनकी होती है , जिन लोगों को छोड़कर वह जाते हैं ।  *छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति* *तिष्ठन्ति स्वयमातपे।* *फलान्यपि परार्थाय* *वृक्षाः सत्पुरुषा इव।।* अर्थात- पेड को देखिये दूसरों के लिये छाँव देकर खुद गरमी में तप रहे हैं। फल भी सारे संसार को दे देते हैं। इन वृक्षों के समान ही सज्जन पुरुष के चरित्र होते हैं।  *ज्यैष्ठत्वं जन्मना नैव* *गुणै: ज्यैष्ठत्वमुच्यते।* *गुणात् गुरुत्वमायाति* *दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।।* अर्थात- व्यक्ति जन्म से बडा व महान नहीं होता है। बडप्पन व महानता व्यक्ति के गुणों से निर्धारित होती है,  यह वैसे ही बढती है जैसे दूध से दही व दही से घी श्रेष्ठत्व को धारण करता है। *अर्थार्थी यानि कष्टानि* *सहते कृपणो जनः।* *तान्येव यदि धर्मार्थी* *न  भूयः क्लेशभाजनम्।।*...

Sanskrit Kavita By Dr.Himanshu Gaur

शान्तविलास, पण्डितराज जगन्नाथ विरचित

 विशालविषयाटवीवलयलग्नदावानल- प्रसृत्वरशिखावलीविकलितं मदीयं मनः। अमन्दमिलदिन्दिरे निखिलमाधुरीमन्दिरे मुकुन्दमुखचन्दिरे चिरमिदं चकोरायताम्‌॥१॥ अये जलधिनन्दिनीनयननीरजालम्बन ज्वलज्ज्वलनजित्वरज्वरभरत्वराभङ्गुरम्‌। प्रभातजलजोन्नमद्गरिमगर्वसर्वङ्कषै- र्जगत्त्रितयरोचनैः शिशिरयाशु मां लोचनैः॥२॥ स्मृतापि तरुणातपं करुणया हरन्ती नृणा- मभङ्गुरतनुत्विषां वलयिता शतैर्विद्युताम्‌। कलिन्दगिरिनन्दिनीतटसुरद्रुमालम्बिनी मदीयमतिचुम्बिनी भवतु कापि कादम्बिनी॥३॥ कलिन्दगिरिनन्दिनीतटवनान्तरं भावयन्‌ सदा पथि गतागतक्लमभरं हान्‌ प्राणिनाम्‌। लतावलिशतावृतो मधुरया रुचा संभृतो ममाशु हरतु श्रमानतितरां तमालद्रुमः॥४॥ वाचा निर्मलया सुधामधुरया यां नात्ग शिक्षामदा- स्तां स्वप्नेऽपिन संस्मराम्यहमहंभावावृतो निस्त्रपः। इत्यागः शतशालिनं पुनरपि स्वीयेषु मां बिभ्रत- स्त्वत्तो नास्ति दयानिधिर्यदुपते मत्तो न मत्तोऽपरः॥५॥ पातालं व्रज याहि वा सुरपुरीमारोह मेरोः शिरः पारावारपरम्पराहत यदि क्षेमं निजं वाञ्छसि श्रीकृष्णेति रसायनं रसय रे शून्यैः किमन्यः श्रमैः॥६॥ मृद्वीका रसिता सिता समशिता स्फीतं निपीतं पयः स्वर्यातेन सुधाप्यधायिकतिध...