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संस्कृत श्लोक/ डॉ.हिमांशुगौड़

 


।। हरिकृपा शुभदा भज तत्पदम् ।।

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(केवल हरि की कृपा ही शुभ फल देने वाली है इसलिए उन्हीं के चरणों का भजन करो)

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वदतु संस्कृतसेवक!सज्जन!

क्व वयमर्थविनिश्चिनुयाम रे

न तमसीव वृते जगतीह नो

सुपथदर्शकतामभियाति ना ।।१।।

 

अरे संस्कृत के सेवक! सज्जन! आप मुझे बताओ , कि मैं किस अर्थ का (तात्पर्य का) निश्चय प्राप्त करूं ? इस अंधेरे से भरे हुए संसार में सच्चे रास्ते को दिखाने वाला मनुष्य कोई नहीं (अर्थात् दुर्लभ है) ।

 

अथ च शास्त्रनिषेवणमद्भुतं

विविधकाव्यरसामृतपायनं

शिवपथाश्रितलोकनिजीवनं

स्वहितमार्गविलोकनसंश्रितम्।।२।।

 

शास्त्रों का सेवन करना यह तो बड़ी अद्भुत बात है ! विविध काव्य रसों के अमृत का पान करना या पिलाना , कल्याणमय पथ के आश्रित संसार में जीना, यह भी बहुत अच्छा है ! यह सब वस्तुतः अपनी ही हितकर-मार्ग युक्त, दृष्टि के आश्रित है।

 

न विषहीनमिदं जगदर्थितं

विषयवासितजीवनयापनम्

अहह रागविवर्धनमत्र वा

स्वपतनाय समुद्यतनं ह वै।।३।।

 

अरे भाई , इस संसार से जो मांगा गया है (जगदर्थितं) वह विषहीन नहीं है (अर्थात इस संसार की कामनाएं विषैली हैं) । विषय वासनाओं में जीवन यापन करना , इस संसार में अनुराग बढ़ाना , यह निश्चित रूप से, ऐसा ही है , जैसे अपने पतन के लिए खुद ही प्रयत्नशील होना।

 

त्यजतु नो यदि लौकिकवासना

सरतु नो यदि शम्भुपदार्चना

श्रयतु नो यदि चात्मविलोकनं

विफलतां प्रतियास्यति जीवनम्।।४।।

 

यदि लौकिक वासनाओं को नहीं छोड़ोगे , शिव के चरणों की अर्चना नहीं करोगे और आत्मविलोकन नहीं करोगे , तो भैया, जीवन तो  विफल जाएगा ही।

 

मनुजता सुकृतैर्द्विज! लभ्यते

पशुवदाचरणं चरतान्नहि

हरिकृपा शुभदा, भज तत्पदं

कुरु च सौख्यविनिश्चयमानसम् ।।५।।

 

अरे भाई, यह मनुष्यता तो बहुत ही पुण्य से प्राप्त होती है ,इस मनुष्य जन्म को पाकर पशुओं की तरह आचरण करना उचित नहीं है ।  सिर्फ हरि की कृपा ही शुभ फल देने वाली है , इसलिए उनका ही भजन करो , और उससे ही अपने मन को सुखी करो।

 

यदि शतैरपि काव्यमनश्श्रितै:

सकलजीवनमेव वियापितं

हरिविचिन्तनवर्जितमानसै:

न कवितापि तदोद्धरतात्कवीन्।।६।।

 

यदि अपने मन के आश्रित सैकड़ों काव्यों के द्वारा भी अपना पूरा जीवन बिता दिया , और हरि का चिंतन नहीं किया, तो वे कविताएं भी उन कवियों का उद्धार नहीं कर सकतीं।

 

धनमहो यशसां यदि ते चय:

सुबुधता तव बुद्धिगतास्ति चेत्

हरिदयैव , न हेतुरिहान्यथा

भज सदा सुखदं कमलापतिम्।।७।।

 

अगर आपके पास धन है , यश है , और तुम्हारी बुद्धि में विद्वत्ता है, तो यह सब सिर्फ भगवान् विष्णु की कृपा से ही है , यहां दूसरा कोई कारण नहीं है , इसलिए उन्हीं लक्ष्मीपति भगवान का भजन करो वही सभी सुख देने वाले हैं।

 

हरिचरित्रसुधापरिमग्नता

सुरसरीजलसेवनलग्नता

ह तुलसी स्वगृहे यदि रोपिता

क्व यमराट् तव दु:खकरस्तदा।।८।।

 

हरि के चरित्र रूपी अमृत में ही डूबा रहना , गंगा जी के जल के सेवन में ही लगा रहना, और तुलसी का अपने घर में बोना , यह काम मनुष्य यदि करें तो भैया , यमराज की क्या मजाल जो आपको दुख दे जाए।

 

नहि जगत्परिगाथनमश्नुहि

सदसतीव च के , न विवेत्ति य:

स परिसीदति भीतिकरे जनो

हरिसुचिन्तनवर्जितमानस:।।९।।

 

संसार की बातों पर मत जाओ , (अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करो ) क्या कर्म अच्छा है क्या कर्म बुरा है जो इस बात को नहीं जान पाता और हरि के चिंतन को छोड़ता है, वह इस भयंकर संसार में बड़ा ही पछतावा प्राप्त करता है ।

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- डॉ हिमांशुगौड:

लेखनकालो दिनाङ्कश्च - ०८:१३ रात्रौ, १८/०३/२०२०

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