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शब्दब्रह्मगतं प्रणौमि सततं श्रीरामयत्नं गुरुम्

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काश्यां यस्य निशम्य शब्दपरकां नानार्थचिन्तावलीं

छात्राश्चैव यतो ह्यधीत्य मुदितास्सिद्धान्तमुक्तावलीं

विद्वत्सज्जनलोकनैर्भवति वा यस्येह दीपावली

तस्मै च प्रददामि देवनगरस्थायाद्य भावाञ्जलिम्||१||


यो वै शब्द इति प्रकाशितपथे छात्रान्नवान् वर्धयन्

ब्रह्मत्वं प्रतिपादयन् पदमुचां वाचाञ्च तत्त्वं वदन्

सोऽसौ नागपदैकचिन्तनरत: पातञ्जलं धारयन्

शैवं लोकमगात्सहस्रजनतां दिव्यार्थमुत्प्रेरयन्||२||


काश्यां देवनदीतटे घटपटाद्यर्थं समुद्बोधयन्

न्यायाश्लिष्टपदप्रचारणविधिं विद्यार्थिनश्शिक्षयन्

वेदास्यार्थमुपास्यतामिति जनानाजीवनञ्जीवयन्

शब्दब्रह्म गतश्श्रुतं गुरुवरश्श्रीरामयत्नस्सुधी:||३||


भाष्ये कैय्यटवाक्समुद्रसलिलं योऽगस्त्यवत् पीतवान्

शब्दानां महिमानमेव सततं चाजीवनं गीतवान्

मञ्जूषां शिरसा प्रधार्य सततं नागेशभट्टस्य यो

वैलक्षण्यमथाह शब्दजगतां जातस्स शब्दोऽधुना||४||


देहेऽप्यस्ति विभिन्नवाक्स्वरलयाबद्धा तरङ्गान्विता

नानाभावविलासबोधकरणी शुक्लाम्बरा कुत्रचित्

आकाशे तडिदुद्भवेत्क्षणभवा तद्वत्प्रकाशान्विता

हेत्थं योऽर्थमबोधयत् सुवचसां वाचि प्रलीनोऽधुना||५||


काशीयं मम सुप्रिया कथमहं त्यक्त्वा प्रयामि क्वचित् 

त्वां नाना न हि रोचते सुरपुरं मह्यं न सौख्यं धनं 

इत्याद्यैश्च पुराणशास्त्रगदितै: काशीरसाकाशितै-

रर्थैर्जीवनमुन्नयन् शिवमगाच्छ्रीरामयत्नो गुरु:||६||


काशीवासविभासजीवनवशादन्धं तमो वारयन्

पाणिन्यर्थसमेतसूत्रसरणीं छात्रेषु विस्तारयन्

अज्ञानादिमनोमलं च जडतामुत्पाटयन् कौशलैर्

योऽजीवज्जनताप्रियोऽप्रियहरश्श्रीरामयत्नस्स वै||७||


लब्ध्वा राष्ट्रपतिप्रभाविलसितं पद्मादिसम्भूषणं

हृत्वा द्वेषभवं विधर्मिवचसां यच्छाब्दिकं दूषणं

शब्दाम्रस्य सदाऽकरोदहरहश्चित्तेन यश्चूषणं

सोऽसौ शब्दभृताम्प्रमाणितगुरुश्श्रीरामयत्नो गत:||८||


दृष्ट्वा छात्रगणान्सुतानिव सदा स्नेहेन यो हृष्यति

पात्रं शास्त्रगुणस्य दिव्यनयनैर्यो दूरत: पश्यति

सारल्यादिसुरप्रवृत्तिघटकैर्दौ:ख्यं च यो नश्यति

तस्यालोक्य दिवप्रयाणमधुना भोज्यं न मे रोचते||९||


हे विद्वन् बहुधा शतैश्च शतधा त्वद्वेतृता संश्रुता

दौर्भाग्यं न कदापि भौतिकतया साक्षान्मयालोकित:

सम्बन्धो भवति प्रवेतृषु मुदा वाचां, न वै दैहिकं

तस्मात्त्वां परिदृष्टवान् शतपथैरित्येव सञ्चिन्तये||१०||


हे विद्वंस्तव शब्दकीर्तिमहिमा दूराज्जनैर्गीयते

श्रीमंस्ते पदपाठनप्रवणता पुण्यान्विता लक्ष्यते

बोद्ध्रीशाशुविबोधदा च शुभता गुण्यान्विता लोक्यते

याते त्वय्यथ शब्दराजि निशि हा निद्रा न मे नेत्रयो:||११||


किन्तु त्वामभिगायति त्रिभुवनं त्वां लोकते लोकराट्

किन्तु त्वामभिवेत्ति शब्दजगति प्रत्येकमुत्कण्ठया

किन्तु त्वाम्परिहृष्यमाणहृदयैर्गायन्ति मेघस्वरास्

त्वं यातोऽपि न यात इत्यहमहो तुष्यामि चित्तेऽधुना||१२||


कीदृग्भावगिरां प्रयामि मतिमन् पारं न विज्ञायते

यातानां च महात्मनां स्मृतिरतो मत्तो न निर्गच्छति

तस्माद्भावनिवेदनाय शतधा सोऽयं प्रकल्पारतस्

त्वत्कीर्तौ हि हिमांशुगौडपदभाक्सक्त: प्रयाते त्वयि||१३||


देहं नो गणयन्ति शाब्दिकवरास्सद्ब्रह्मजिज्ञासवस्

तस्मान्नष्ट इतीह भावपरता लेशा न तेषु क्वचित्

आत्मा सत्यमिति प्रभाविलसिताश्शैवेन सूद्भासितास्

तद्वच्च प्रचरन्ति रामयतना: काशीविभाकाशिता:||१४||


शास्त्रायार्पयतु स्वजीवनमिति प्रारीरचज्जीवनं

शास्त्रायैव समं धनं च तृणवत् त्यक्त्वा सुखैस्संवसेत्

शास्त्राधिष्ठितनिष्ठया शिवगुरो: प्रीतिं प्रविन्देन्मुदा

यो वक्ति स्म पुरारिशूलनगरीवासी स काशीवर:||१५||

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हिमांशुर्गौड:

०९:२७ रात्रौ

२०/०९/२०२२

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