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बुधेषु कविष्वपि खेदपूर्णा स्थितिरधुना

 एतद्धि महद्दौर्भाग्यं यदद्यत्वे संस्कृतं यच्च देवभाषेति, तत्रापि दैवप्राप्तपदत्वेन केचित् खला इव वर्तमाना:, कूटनीतिं चरन्त: परपक्षगुणोपेक्षका, आत्मीयानल्पगुणवतोऽपि स्वजनान् पुष्णन्त इव कदाचित् "सर्वशास्त्रतत्त्वज्ञा:" कदाचिद् "आधुनिककालिदासा:" कदाचिच्च "शास्त्रतपस्विन" इत्यादिपदवीभिस्स्वयमेवात्ममुखत आत्मात्मीयश्लाघनपरा दृश्यन्ते। परांश्च महाकवित्वलसितानपि प्रतिभासूर्यानपि महान्धकारमेघीभूयाच्छादयितुमहर्निशं प्रयतन्ते।


तेषां दृष्टिस्स्वचाटुकारिसम्पन्नेषु कविषु वैशिष्ट्यं पश्यति, तत्कृतकवितासु चैव (असार-अनुद्देश्य-निर्गभीर-नीरसासु गुणालङ्कारध्वन्यादिवर्जितास्वपि) "अहो मन्मित्रकृतकाव्यम्!" "अहो ह्यत्र शास्त्रनिष्पादनवैलक्षण्यम्!" "अहो हैतस्य सत्कवित्वम्!" अहोऽस्मज्जनकृतकाव्ये भावदर्शनप्रावण्यमित्यादिका स्वजनवर्धापनाय कूटनीतिच्छन्ना वाग्झरी प्रतिदिनं जर्झरीति। 


किन्तु ये तेषां समूहे न सन्तिष्ठन्ते, ये तानहर्निशं न नन्नमन्ति , ये सत्यत्वेन शास्त्रनिष्ठोल्लसिता, ये व्यर्थाडम्बरविडम्बनशून्या, ये काव्यवणिक्त्वशून्या, ये निश्छलोच्छलत्काव्यधारयैव वर्तमानास्


तांस्त उपेक्षन्ते, तान्नैवेक्षन्ते, तान्नैव गणयन्ति, न मन्यन्ते, तद्गुणान् गोपायितुमेव सततं यतन्ते, तत्काव्यानि दृष्ट्वापि , "नैवात्र किञ्चित्काव्यत्वमिति" "नायं स्वजनोऽतोऽस्य गुणकथने मूकीभवेमेति अन्तश्चिन्तयन्तस्तथैव च वर्तयन्तोऽपि, अकादम्यादिष्वपि एते स्वपक्षिपक्षानेव प्रसारयन्ति, दिवानिशं कृतचाटुवाक्यवल्लरीविटपवसन्तास्तेऽसन्त: क्षेत्रवाद-शिष्यवाद-स्वार्थवाद-धनवादादिकानेव गर्दभानिव वहन्तो वाहयन्तश्च जगति वसन्ति। 


धिगेतेषां समीक्षा, या स्वजनकृतकाव्येष्वेव काव्यशास्त्रीयसमस्तगुणगौरवान्पश्यति!


धिग्घैषां हृदयकमलानि, यान्यात्मीयानामेव काव्यानि दृष्ट्वा विकसन्ति!


धिक् समत्वहीनत्त्वं चैषां गुणज्ञानोद्गीर्णे! 


एते चात्मचाटुकारानेव संस्कृतकविसमवायेष्वामन्त्रयन्ति, तेषां ग्रन्थानेवाग्रीभूय प्रकाशयन्ति, तेषां कवितास्वेव सामाजिकाधुनिकशास्त्रलोकालोकभावना एतैर्दृश्यन्ते दर्श्यन्ते च!


धिक्तानैतान्! 


एतन्न केवलमधुना, 

परञ्चाम्बिकादत्तव्याससदृक्षो महान् कविरपि एवंविधैर्मत्सरग्रस्तैश्चिक्लेशितस्सन्नभाषत शिवराजविजयभूमिकायाम्- "ये तु पुरोभागिनो निगीर्यापि प्रबन्धममुं तुण्डमुण्डकण्डूयनै:, ताण्डवकरण्डीकृतभ्रूभङ्गैश्चास्मानास्माकांश्च हासयिष्यन्ति, तेऽप्यसङ्ख्यप्रणतिपात्राण्येवास्माकम्। ये तु जोषं जोषमालोक्यापि काव्यानि, समासाद्यापि च तोषम्, सरोषमुज्जृम्भिताभिर्जाठरज्वालाभिरेव तं जारयन्ति, जारयन्ति ते ग्रावणोऽपि लौहमपि विषमपि दाधीचास्थीन्यपि चेति विलक्षणकुक्षयस्ते न कस्य नमस्या:?"


इत्यस्मादपि पूर्वं चोक्तं हरिणा - बोद्धारो मत्सरग्रस्ता इति।


न केषाञ्चिदपि दूषणं मदन्तस्तात्पर्यम्! न कांश्चिदवहेलयितुम्मे यत्नो! नैव चात्मोपस्थितिप्रदर्शनं वा मेऽसौ वाक्कल्प:! 


किन्तु प्रसृतकाव्यजगद्गतिविधीनेव दर्शं दर्शं नात्मानं रोद्धुमशक्नुवमत इयम्मे वाग्ज्वाला ज्वालयिष्यत्येव तान्, य इत्थं वर्तमाना जीवन्ति। येऽस्माद्विपरीतास्ते त्वस्मन्नमस्यास्सर्वदैव।

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हिमांशुर्गौड:

११:१२ पूर्वाह्ण:

०७/०८/२०२२

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