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राजघाट के श्री सीताराम बाबा

 ||दिवङ्गतेभ्यश्श्रीमत्-सीतारामबाबाभ्यश्-श्रद्धाञ्जलि:|| [[ हिंदी सहित ]]

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[[ दिवङ्गत १०८ श्री सीताराम बाबा के लिए श्रद्धाञ्जलि ]]

 ( संस्मरणात्मक )

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सीताराममतिस्सदा शुभगतिश्चाध्यात्मनिष्ठो यति:

सीतारामकथासुधामरवपुस्सीतेशमुत्सत्कृती

"सीतारामसुनाम जप्यमनिशं" वक्ति स्म यस्सर्वदा

सीतारामगुरुर्महात्मपुरुषस्सीतेशलोकङ्गत:||१||


जिनकी बुद्धि हमेशा सीताराम का चिंतन करती है । जिनकी क्रियाएं बहुत शुभ हैं। जो अध्यात्म ज्ञान में ही निष्ठ रहते हैं। "सीताराम यह सुंदर नाम ही हमेशा जपने योग्य है" - जो ऐसा कहते हैं । ऐसे श्री सीताराम बाबा जो महात्मा हैं, वे भगवान राम के लोक को ही चले गए।

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अश्वत्थाम्रवटादिवृक्षविलसद्दिव्याश्रमेऽध्यासने

गङ्गातीरमुदाश्रमे कपिशतैरान्दोलितेऽहर्निशं

सीतारामजपार्चनादिनिरतैस्साध्वादिभिश्शोभिते

सीतारामगुरुस्स शान्तिमलभै श्रीराजघाटस्थिते||२||


पीपल,आम, वट आदि अनेक वृक्षों से शोभायमान दिव्य आश्रम में निवास करने वाले। ऐसा आश्रम जो गंगा के किनारे आनंद पूर्वक स्थित है । और सैकड़ों बंदरों के द्वारा आंदोलित है । हर समय सीताराम का भजन करने वाले महात्माओं के निवास से पवित्र है । ऐसे आश्रम के मुखिया के रूप में श्री सीताराम बाबा ने अपने निवास को यहां सुशोभित करके शांति को प्राप्त किया।

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आयोज्यन्त इहैव वित्तपुरुषैस्सद्विप्रभोज्यान्यहो

येष्वायान्ति सहस्रवैदिकजना: सद्ब्राह्मणाश्शाब्दिका:

यो वा नन्दति कीर्तनैश्च भजनैश्श्रीरामनामाश्रितैस्

सीतारामयतिस्स देवनगरं यातोऽद्य हैवं श्रुतम्||३||


बड़े-बड़े सेठों द्वारा इनके आश्रम पर संत-महात्माओं और ब्राह्मणों के लिए भंडारे आयोजित किए जाते हैं जिनमें व्याकरणाचार्य, वेदपाठी लोग आते हैंऔर वहां देखते हैं कि ढोलक मंजीरे की तान पर सीताराम के भजनों से श्री सीताराम बाबा बहुत ही आनंदित होते हैं । ऐसे भजन आनंदी पुरुष देव लोक को चले गए - ऐसा मैंने सुना यह बड़ा दु:खपूर्ण है।

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आयाति स्म यदा कदा च बहुधा यो वै नरौरास्थिते

विप्राणां शतपूजने नरवरे शास्त्रैस्समुल्लासिते

यद्वा श्रीहरिधाम्नि चापि मदनाख्यब्राह्मणस्यालये

सीतारामकथाभिरामहृदयो रामत्वमद्याप्तवान्||४||


शास्त्रों का उल्लास जहां है , ऐसे ब्राह्मणों के सैकड़ों प्रकार के पूजनों में , श्री सीतारामबाबा जब कभी, या बहुत बार आते रहते थे । और श्रीमदनवशिष्ठजी (चेयरमैन) के हरिधाम नामक घर में भी प्रसन्नतापूर्वक आते थे , ऐसे, सीता राम की मनोरम कथाओं से भरा हुआ है ह्रदय जिनका - आज भगवान् राम में ही लीन हो गए - ऐसा मैंने सुना।

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बाबा! ते शुभदस्मृतिं नरवरश्चित्ते स्वके स्थापयन्

बाबा! ते सुखदं वच: प्रतिदिनं सर्वाञ्जनान्श्रावयन्

बाबा! ते गुणधाम नाम महतोत्कर्षेण विज्ञापयन्

एषो गौडहिमांशुरेष्यति समां रात्रिं त्वदीयस्मृतौ||५||


बाबा! तुम्हारी शुभ स्मृति को समस्त नरवर अपने मन में स्थापित करते हुए,

 बाबा! तुम्हारी सुख देने वाली वाणी सभी लोगों को खूब सुनाते हुए,

 बाबा! तुम्हारे गुणों के धाम और नाम को महान् उत्कर्ष के साथ बताते हुए, यह हिमांशुगौड़, सारी रात्रि तक तुम्हारी स्मृति में बिताएगा।

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मूर्ध्न्युष्णीश इव प्रभाति यतिकस्य श्मश्रवश्चानने

वर्चस्वीव विभाति साधुगणया: नैकैर्जनैर्वन्दित:

"सीताराम!जयोऽस्तु ते"त्विति गिराकाशोऽपि कम्पायते

यत्र त्वं शुभदर्शनैर्यतिवरो धन्यीकरोषीव नॄन्||६||


इनके सिर पर हमेशा मुंडासा बंधा रहता था । तथा चेहरे पर बड़ी-बड़ी दाढ़ी मूछें! साधुओं की मंडली में जाने पर वह बहुत ही वर्चस्वी मालूम पड़ते थे ! और सभी लोगों के द्वारा वंदित होते थे। जहां भी इनके शुभ दर्शन होते थे , वहीं "सीताराम बाबा की जय" - इस नारे से संपूर्ण आकाश गुंजायमान हो जाता था।

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यं वीक्ष्यैव जना भवन्ति मुदिता: धर्मास्थया भ्राजिता

यस्यास्वाद्य कथां सुधामिव नरे भोज्यं न वै रोचते

क्षुत्तृड्भ्यां म्रियते न कश्चिदपि यश्चास्याश्रमे तिष्ठति

क्षीरान्नै: परिमोदते, वदत रे "सीतेश!ते स्याज्जय:"||७||


उनको देखते ही लोग आनंदित हो जाते थे। और धर्म में आस्था रखने लगते थे। उनके द्वारा रामचरितमानस के किस्से सुनते वक्त लोग भूख प्यास भी भूल जाते थे। उनके आश्रम में आने वाला कभी भी भूखा नहीं मरता वह खूब खीर खाता है और सीताराम बाबा की जय बोलता है।

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हिमांशुर्गौड:

०७:४६ दिनान्ते

१९/०५/२०२१

उदयपुरे।


आरुह्य यानानि शतं सुविप्रा:

यान्ति स्म भोक्तुं पयसां सुभोज्यं

यस्याश्रमे तं यतिमद्य भावैस्

सीतादिरामान्तपदं भजाम:||८||


अनेक (टेम्पू, साइकिल आदि) वाहनों पर चढ़कर दुपहरी के समय जिनके आश्रम पर ब्राह्मण लोग भंडारा खाने जाते हैं ऐसे सीताराम बाबा की जय जयकार हो।

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मध्याह्नकाले धृतधौतवस्त्रा:

त्रिपुण्ड्रभस्मादिलसत्सुभाला:

रुद्राक्षमालाधृतकम्बुकण्ठा:

भोक्तुं प्रयान्ति स्म तदाश्रमेऽहो||९||


दुपहरिया में धोती पहने , त्रिपुंड , भस्म, चंदन आदि माथे पर लगाए, रुद्राक्ष,तुलसी आदि की माला धारण किए हुए, बहुत से ब्राह्मण और महात्मा उनके आश्रम पर भंडारा खाने जाते थे।

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शौवस्तिकं रे भविताऽऽश्रमे यद्

भोज्यं महद् ब्राह्मण! राजघाटे

इति ब्रुवन् मत्सहपाठिविप्र:

क्षीराशया योजयतीव मां स:||१०||


"अरे भाई! कल सीताराम बाबा के यहां भंडारा है,वहां हम सबको निमन्त्रण में चलना है" ऐसा कहते हुए मेरा सहपाठी मेरे मन में सहसा ही खीर पीने की आशा जगा देता है।

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अखण्डरामायणपाठकीर्ति:

गोस्वामिकृत्पद्यनिपीतगन्धि:

भक्त्यैकरस्यस्रवणैश्चतुर्दिक्

सम्पाव्यते वै यतिना ह्यनेन||११||


अखंड रामायण का पाठ करने से है कीर्ति जिनकी - ऐसे गोस्वामी तुलसीदास के विरचित पद्यों को पी लिया है जिन्होंने - ऐसी सुगंध वाले - ये सीताराम बाबा जी भक्ति रूपी रस ही चारों दिशाओं में बहाते हैं और इस संसार को पवित्र करते हैं।

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भण्डारा क्व प्रवर्तते त्विति दिशा धावन्ति येऽहर्निशं

तेषामप्यथ रागसक्तिलसितं स्थानं नरौराश्रम:

यैस्तत्रापि कथञ्चिदेव न सखे भुक्तं, स्वनिद्रावशात्,

सीतारामशुभाश्रमप्रजनितं भोज्यं हि तैस्स्वद्यते||१२||


"भंडारा कहां हो रहा है"- इस जुगाड़ में ही जो हमेशा लगे रहते हैं, उनके लिए नरौरा के आश्रम सबसे बेहतर स्थल है। किंतु मित्र! यदि तुम असावधानी के कारण भंडारा खाने से चूक गए हो, तो चिंता मत करो! सीताराम बाबा के आश्रम पर रोज भंडारे होते ही रहते हैं , हम वहां चलेंगे!

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नीत्वा स्वीयकमण्डलुं जलभृतं बद्ध्वा शिखां गोखुरीं

पिष्ट्वा शङ्करसुप्रियौषधिमथो कृत्वा च सन्ध्यादिकं 

गङ्गाया: लहरीं पठन्दिशि जनो वीक्षेत भोज्यं क्व मे

"सीतारामसदाश्रमे द्विजवरा!द्योद्भाव्यते भोजनम्"||१३||


अपने कमंडल में जल्दी भर लिया है। अपनी मोटी चुटिया में गांठ भी लगा ली है । भगवान् शंकर की प्रिय औषधि को पीस भी लिया है । संध्या वंदन कर चुके । अब गंगा लहरी का पाठ करते हुए , यह देख रहे हैं कि आज भोजन कहां करना है?, तो मित्र! तुम चिंता मत करो! सीताराम बाबा के आश्रम में ही आज का भोजन होगा!

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हृष्यन्तो विबुधा द्विजाश्च गुरवो मीमांसका याज्ञिका:

सीताराम जयोस्तु ते यतिवरेत्येतन्मुहुर्घोषणै:

शिष्याश्चैव सहस्रशो बहुपुरेभ्यो ये च तत्रागता:

माङ्गल्यं निभरन्ति रामकथया, हे प्रीतिमंस्ते नम:||१४||


बड़े-बड़े विद्वान् लोग, ब्राह्मण, गुरु लोग भी मीमांसक और याज्ञिक। और बहुत से शहरों से आए हुए आपके शिष्य, बार-बार "सीताराम बाबा की जय" , "सीताराम बाबा की जय" - ऐसे उद्घोष से सभी दिशाओं में मंगल भर देते हैं । और आप राम की कथा से मंगलप्रद हो! हे प्रीतियुक्त! आपकी जय हो।

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हिमांशुर्गौड:

०१:०१ मध्याह्ने,

२०/०५/२०२१


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