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||श्रीमहाराणाप्रतापाभिनन्दनम्|| संस्कृत काव्य, हिमांशु गौड़


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प्रतापतापनिष्प्रतापवैरिणो रणे समे,

विहीनजीवना अवारिमीनतां प्रपेदिरे

भयङ्करैश्च खड्गसम्प्रहारणैस्सहस्रशो

द्रुतं श्रुता इवाशुदेहहानिमेव भेजिरे||१||


क्व जीवताद्विलोकितो हि येन रुष्टवीरराट्

दहेद्रिपुं न कं प्रतापनेत्ररोषहव्यवाट्

हरेदसून् क्षणे क्षणे हि हुङ्कृतै: रिपोश्च यो

जयेत्पराक्रमस्स कोऽपि वीरशब्दमूर्तिमान्||२||


उपत्यकाभिरावृते मनोहरे शुभस्थले

शिवैकलिङ्गमन्दिरे स रुद्रसेकतत्पर:

नमश्शिवाय चेति यो जपन्नजस्रमद्भुतं

जघान गोघ्नजातिकान् जयेज्जयस्स मूर्तिमान्||३||


मरुत्पदप्रवाहवाहनश्च यश्च चेतको

हयाधिराट् प्रतापभक्तदेशभक्तिसक्तिमान्

चतुष्पदस्स कोऽप्यशेषकीर्तिवाड्रणेऽग्रग:

प्रतापवाहनो जयेत्स वीरवाहनो जयेत्||४||


अशेषभारतप्रजेत्रखर्वगर्वनाशनो

भुजङ्गमाक्षरीलिपिप्रपाठिपाठनाशन:

स्वदेशमानरक्षणकृतप्रणस्तृणाशनो

जयेज्जयप्रियस्मृतिस्सुरालयाप्तशासन:||५||

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हिमांशुर्गौड:

१०:३७ रात्रौ,

२३/०४/२०२२


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