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असौ धूम्रो - संस्कृत काव्य

 असौ धूम्रो व्याप्नोति सर्वतस्

त्वं चैकाकी रहसि अज्ञातदिव्यपन्थानं प्रविष्ट इव


स्वप्नायमानानि दिनानि सन्ति, 

आम्! प्रविशास्मिंल्लोके

नेह पुनरायास्यसि भुवि, इहागत्य


वयं अदृश्या:

वागप्यत्र नोदेति, अव्यक्ता इव वर्तेमहि

कथेयं कथं कथयानि त्वां

एहि देहान्तं कृत्वात्मनो

काचिदाह्वयति वाक् त्वामदृश्या फुस्फुसायमाना

मन्ये, वदेद्यथा कश्चित्कर्णमात्रे


मौनमात्रा वयम्!

 नेत्रैरेवावगन्तुं शक्ष्यसि नो

अपरिचिता वयम्! अस्मल्लोको दूरम्!

वयमिह नास्यामो नेष्याम इमं लोकम्

न वेत्थ यूयं नो रूपं

नामानि लुप्तानि, देहा यथेह तथैव तत्रापि दृक्ष्यन्ते

अथवा पुण्यपापाद्याक्रान्ता विचित्ररूपा वयम्

अथवा भावरूपिणो वयम्

न लक्षणानि लक्ष्याणि वा विद्यन्ते

कथं तद्गृणानि!

शास्त्रैरपि साक्षात्त्वेनादर्शितरूप: , गौणत्वैर्लक्ष्येत तत्पृथक्


कस्त्रायेत तत्र, त्वमेव स्वमनसोज्जनितशक्तिसाहस्रैर्धृतशतरूपो विभासि!

अहो सुरवागायिम्मे गोपयित्री,

न काङ्क्षामि लोकान् आत्मानं दर्शयितुमत इयं कल्पा


क्व यन्ति कुत इहायान्ति कथं जीवमानाश्शतमायानिबद्धास्

सर्वं खल्वाश्चर्यम्

अश्रूयमाणानि जगन्ति, एकाकिनी रहस्यमयी निशा,

क्वचिद्दृश्यादृश्यविभृतरूपशतोसि

हहहा हा हेमानि मद्वाग्रूपाणि

हहा हा हं कोहं अविज्ञातात्मा! चुपानीत्येव रोचे।

शशशश निर्यान्ति तुषारवायुक्लिन्नानि दिवसानि।

*****

हिमांशुर्गौडो

१०:०२ नैशे 

१३/०४/२०२३


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