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वीता दिवसाः - संस्कृत कविता, हिमांशु गौड़

डॉ.महेशनारायणशास्त्रिणां - वीता दिवसा मुहुरहो!जातु न क्वचिदायान्ति - इत्येकां काव्यपङ्क्तिमुत्थाप्य मया स्वविचारैस्सद्यस्स्फुरितैषा काव्यबन्धना कृता। तत्पिबन्तु सहृदया रसमस्याः। अनुभवन्तु चात्र जीवनदृश्यम्।

 

वीता दिवसा मुहुरहो!जातु न क्वचिदायान्ति।

अन्तर्भित्तौ सदा सौख्यदा अद्येवैते विभान्ति


काचिन्नव्यतरङ्गमनोजा यदा वयं नवयूनि

पीतानीव यदा चास्माभिर्वामाधरजमधूनि


यदा वयं चैकान्ते माधवमासे सुमरमणीये

लताविटपकुञ्जे बहुकालं मुदा हृदा कमनीये


यदा वयं च तडागहरितनीरे लोष्ठांश्च क्षिपन्तो

त्वदागमनकालं पश्यन्त: कालं यापितवन्त:


यदा वयं जगतो बहुचिन्ताभ्य: परिमुक्ता आस्म:

यदा वयं वीरैरिव दर्शिततेजस्काश्चैवास्म:


यदा वयं सुहृदां निश्छलप्रेमपयांसि पिबन्तो

यदाश्रमेषु दृष्टा: भ्रामं भ्रामं पूज्यास्सन्त:


यदा कामिनीवीक्षणबाणैर्विद्धं नो मन आसीत्

यदा तया मेलनकाङ्क्षायां व्यपगतरात्रिश्चासीत्


यदा न चासीच्चित्ते काचिद्धनपदलिप्सास्माकं

यदा जगन्नवताम्परियातं ह्यनुभूयते स्माऽस्माभि:


यदा वयं चञ्चच्चन्द्रं तारागणगणनासक्ता:

पश्यन्तश्छदिसीह मुदा राज्ञश्च कथां शृण्वन्त:


शेमहे स्म ग्रामारामे षड्रतुकृतरसं श्रयन्तो

कुर्महे आयान्तु दिनानि पुनस्तानि नृत्यन्त:

****

हिमांशुर्गौड:

०९:१७ रात्रौ

०९/०४/२०२३


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