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सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयम् - संस्कृतगीतम्

 सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं

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सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं

स्वभक्त-मनोकामनापूरिणीयं
सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं

स्मृता संस्तुता वैदिकैर्ज्ञाननिष्ठै:
सदा वन्दिता लौकिकै: कर्मनिष्ठै:
बिभर्त्त्यर्थदानि स्वरूपाणि सेयं
सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं

क्वचित् पुत्रदानं ददातीप्सितं सा
क्वचित् कञ्चनं यच्छति प्रीतियुक्तान्
क्वचित् प्रेमिकान् प्रापयेद् बान्धवांश्च
न किं किं करोति प्रसन्ना सदेयं

सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं
सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं

पुराणेषु ते सत्कथा सच्चरित्रं
समुद्गुम्फितं देवि प्रीतं सुचित्रं
कृपां मे कुरु स्वागतस्ते गृहेऽहं
शरण्यं प्रपाहि सुतं चाश्रुनेत्रं

मदीये हृदि भाति शाकम्भरीयं
मदीये हृदि भाति शाकम्भरीयं

इदं लड्डुकं नारिकेलं गृहाण
सुमानां सुगन्धं सुमालं गृहाण
हरिच्छाटिकां देवि दत्तां गृहाण
प्रसन्ना ऽ स्मदीयं कुटुम्बं प्रपाहि


सहारनपुरे भासि शाकम्भरि त्वं
सहारनपुरे भासि शाकम्भरि त्वं

मदीये हृदि भासि शाकम्भरि त्वं
मदीये हृदि भासि शाकम्भरि त्वं


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