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स्वाभिमान - हिन्दी कविता

 स्वाभिमान का सौदा कर के जिंदा नहीं रहा जाता है 

अधिक देर तक जीवन में शर्मिंदा नहीं रहा जाता है 


भूल सभी करते हैं और वो धुलती पश्चात्ताप से है

विजय-वरण के इच्छुक का संघर्ष तो अपने आप से है


धन से ही चलता है जीवन, तिनका तिनका धन से है

भाग्य,बुद्धि से मिलता धन, और एकनिष्ठ शुभ मन से है


लेकिन धन की खातिर भी अपमान नहीं सहा जाता है 

स्वाभिमान का सौदा करके जिंदा नहीं रहा जाता है


नष्ट करो ब्रह्माण्ड समूचा, जल जाए दुनियां सारी

सौ सौ बार कटो खड्गों से, मिट जाने की हो तैयारी,


तभी एकछत्र पौरुष से पृथ्वी का भोग किया जाता है,

कायरता को अपनाकर के जीवित नहीं रहा जाता है,


शक्ति मात्र को सत्य मानकर जीवन को न्योछावर कर

बुद्धि तपस्या देवी श्रद्धा से पूरा जीवन भी जी कर


शक्तिवाद का मात्र आचरण राजासन दिलवाता है

मात्र भावना और दया से सन्तासन मिल पाता है


शक्तिवाद का खंडन, मण्डनमिश्र विप्र के जेता का

चतुष्पीठ के संस्थापक, शंकर का, युगप्रणेता का


क्षण भर में ही शक्तिहीन कर, मार्ग यह दिखलाता है

शक्तिहीन हो जीवन में फिर जीवित नहीं रहा जाता है।


स्वाभिमान का सौदा करके जीवित नहीं रहा जाता है।


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