Skip to main content

मनुस्मृति में मांस खाने का निषेध : डॉ हिमांशु गौड़


******
यावन्ति पशुरोमाणि तावत्कृत्वो ह मारणम् ।
 वृथापशुघ्नः प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि ॥
********
एक पशु की हत्या करने पर,
जानवर के शरीर में जितने रोएं होते हैं, उतने जन्म तक वह मारने वाला पशु बनता है।
*********
 नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्ज्जयेत् ॥
*********
प्राणी को मारे बिना मांस नहीं प्राप्त होता, और प्राणी हत्या कभी भी स्वर्ग देने वाली नहीं, इसलिए मांस कभी भी नहीं खाना चाहिए।
********
 समुत्पत्तिञ्च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम् ।
 प्रसमीक्ष्य निवर्त्तेत सर्व्वमांसस्य भक्षणात् ॥

*****
इसलिए जो नरक में नहीं जाना चाहते, जो पशु योनि में नहीं जाना चाहते वे लोग बिल्कुल भी मांस न खाएं।
*******
 मनुस्मृति/पंचम अध्याय

Comments

Popular posts from this blog

संस्कृत सूक्ति,अर्थ सहित, हिमांशु गौड़

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु: हंसा महीमण्डलमण्डनाय हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैस्सह विप्रयोग:।। हंस, जहां कहीं भी धरती की शोभा बढ़ाने गए हों, नुकसान तो उन सरोवरों का ही है, जिनका ऐसे सुंदर राजहंसों से वियोग है।। अर्थात् अच्छे लोग कहीं भी चले जाएं, वहीं जाकर शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन हानि तो उनकी होती है , जिन लोगों को छोड़कर वह जाते हैं ।  *छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति* *तिष्ठन्ति स्वयमातपे।* *फलान्यपि परार्थाय* *वृक्षाः सत्पुरुषा इव।।* अर्थात- पेड को देखिये दूसरों के लिये छाँव देकर खुद गरमी में तप रहे हैं। फल भी सारे संसार को दे देते हैं। इन वृक्षों के समान ही सज्जन पुरुष के चरित्र होते हैं।  *ज्यैष्ठत्वं जन्मना नैव* *गुणै: ज्यैष्ठत्वमुच्यते।* *गुणात् गुरुत्वमायाति* *दुग्धं दधि घृतं क्रमात्।।* अर्थात- व्यक्ति जन्म से बडा व महान नहीं होता है। बडप्पन व महानता व्यक्ति के गुणों से निर्धारित होती है,  यह वैसे ही बढती है जैसे दूध से दही व दही से घी श्रेष्ठत्व को धारण करता है। *अर्थार्थी यानि कष्टानि* *सहते कृपणो जनः।* *तान्येव यदि धर्मार्थी* *न  भूयः क्लेशभाजनम्।।*...

ननकू : हिमांशु गौड: आख्यान

ननकू ! हां यही नाम था उस विद्यार्थी  का जिसकी उम्र इस समय 17 साल थी और वह इस समय बाबा गुरु से प्रौढ़मनोरमा का पाठ पढ़ रहा था । बाबा गुरु जी जिस तरह से उसे पढ़ाते थे वह उसी तरह से कंठस्थ कर के उन्हें सुना देता था । इस तरह से वह उस संपूर्ण विद्या नगरी का होनहार शाब्दिक था बाबागुरुजी का उससे बड़ा प्रेम था । यद्यपि वह बहुत ही चंचल था वह नए-नए कौतुक करता था लेकिन फिर भी अपनी अत्यंत तीव्र बुद्धि के कारण वह व्याकरण के आचार्य काशी में प्रख्यात और अधुना नरवर के व्याकरण  पढ़ाने वाले श्री ज्ञानेंद्र आचार्य का भी अत्यंत प्रिय होने के साथ-साथ पढ़ने वाला शिष्य था । ज्ञानेंद्र आचार्य उसके विषय में सदा यह कहते थे कि ननकू तो बना बनाया ही विद्वान है । इसको तो बस अपने संस्कारों का उदय मात्र करना है । इस तरह से मनुष्य अपने पूर्व पुण्यों के आधार पर इस जन्म में तीक्ष्ण बुद्धि को प्राप्त करता है और उससे ही वह शास्त्रों का वैभव प्राप्त कर सकता है लेकिन यह सब पुण्य पर ही आधारित है । कोई कोई तीव्र बुद्धि का होते हुए भी विद्वान् नहीं बन पाता लेकिन कोई साधारण बुद्धि का होकर भी विद्वत...

संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के अध्यक्ष के लिए दोहात्मक

बीमारी के कारण अवकाश स्वीकृति के सन्दर्भ में--- मौसम रोज बदल रहा, गर्मी की है मार । सर्दी-गर्मी से क्वचित्, हो जाता है बुखार ।। ऑफिस में एसी चले, बाहर लू भरमार । खाँसी नजला हो गया, ...