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सूर्यशतकम् हिन्दीभावार्थसहितम् हिमांशुगौडकृतम्





||सूर्यशतकम्||

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विदितशिवकरो यः खेचरैस्स्तूयमानो

दिनमणिरतितीव्रोद्गामिभिः पूज्यमानः

सकलमनुजकर्मख्यापकश्श्रीपपीस्सः

प्रणतमिममथार्तं पातु मां पातकेभ्यः||||

 

जानी गईं हैं शिवमयी किरणें जिसकी, सभी ग्रह-नक्षत्रों से स्तुत, अतितीव्र गति वाले सभी पदों से पूज्य, दिन के मणि, सभी मनुष्यों के कर्मों का व्याख्यान करने वाले, लोकरक्षक, मुझ प्रणत दुःखी भक्त की पातकों से रक्षा करें।

 

हरितहयरथेन भ्राम्यति ब्रह्मभाण्डे

भ्रमितमतियुतानां विभ्रमध्वंसकारी

दिवसकरगुरुर्यो भ्राजते खे विशाले

घटयतु स ममापि श्रीघनैस्सौख्यवृष्टीः||||

 

जो हरे घोड़ों वाले रथ से इस ब्रह्माण्ड रूपी भाण्ड में घूमता है, भ्रमित बुद्धि वालों के भ्रम का नाश करता है, दिवस को करने वाला गुरु, जो इस विशाल आकाश में शोभायमान है, वह मेरे लिए भी समृद्धि के बादलों से सुख की बारिश करे!

 

मम सकलदुराशान् हे पपे! नाशय त्वं

तपन! बुधनत! त्वं तापयेह्यद्य दुष्टान्

सफलपथमहो मे स्वप्रकाशैतनुष्व

जलमिव धनवृष्टिं जीवने मे कुरुष्व||||

 

हे पपी! मेरी सभी बुरी आशाओं को तुम नष्ट कर दो। तपन! विद्वानों के पूज्य तुम मेरे पास आ जाओ। दुष्टों को सन्ताप दो और अपने प्रकाश से मेरे रास्ते को सफल बना दो। जैसे पानी की बरसात होती है, ऐसे ही धन की बारिश मेरे जीवन में कर दो।

 

अहमिह निखिलस्य त्राणकर्त्र्यास्तटेऽहो

दशकसमनिवासैस्त्वत्समर्चारतश्च

कथमिव न विलोक्य त्वं दशां मे दयार्द्रो

भवति सुखदशीलस्सूर्य! तुभ्यं नमस्ते||||

 

मैं संपूर्ण संसार की रक्षा करने वाली गङ्गा माता के तट पर एक दशक तक निवास करने के द्वारा तुम्हारी अर्चना में लगा रहता था। फिर भी आज मैं वर्चस्व विहीन होकर घूम रहा हूं। तुम मेरी इस दशा को देखकर क्यों दयालु नहीं होते? सुख देने का ही है तुम्हारा शील, सूर्य! इसलिए तुम्हें नमस्कार करता हूं।

 

 

त्वमिह च जगतीत्थं दर्दुरैः पूजितोऽसि

जलधरकरणत्वात् वर्षणस्य प्रियैर्वा

नहि जलसुचर्या त्वद्विना सम्भवास्ति

जलदगुरुमतस्त्वां मानवाश्चार्चयन्ति||||

 

क्योंकि बादल बनाने में आपका ही हाथ है। और मेंढकों को वर्षा ऋतु बहुत प्रिय है। इसलिए मेंढक भी अपनी भाषा में आपकी स्तुति करते हैं। क्योंकि ऋतुओं का क्रमपूर्वक चलना, जल की चर्या आपके बिना संभव नहीं है! इसलिए तुम बादलों के भी गुरु हो। और तुम्हें मनुष्य इसीलिए पूजते हैं।

 

दिनगतिरतस्त्वं शम्भुरूपोऽसि विष्णु-

प्रविदितशुभरूपोऽनेकरूपं बिभर्षि

सुरमुनिमनुजाद्यैस्संस्तुतो लोककारिन्!

भव मम हि सदाऽघौघान्धकारप्रणाशी||||

 

दिन को गति देने वाले! इसीलिए तुम शम्भुरूप हो! विष्णु का जाना गया है शुभ रूप! ऐसे तुम ही हो! अनेक रूप धारण करते लेते हो! देवता, ऋषि, मुनि और मनुष्य सब तुम्हारी प्रस्तुति करते हैं! क्योंकि तुम संसार को बनाते भी हो! और इसीलिए तुम मेरे पापों की बाढ़ का जो अन्धकार है, उसको भी नष्ट करने का स्वभाव धारण कर लो।

 

सुगजबलसहस्रं यच्छसीति प्रमन्ये

विपिननगपुरेषु प्रापयन् स्वप्रकाशम्।

अहिमणिकरणस्त्वं मौक्तिकं हस्तिकेषु[1]

जनयसि निजभासैर्जीवकारिन्नमस्ते||||

 

आप हजारों हाथियों का बल भी प्रदान कर देते हो - ऐसा मैं मानता हूं! जंगल, गांव, शहर सब में अपना प्रकाश फैलाते हो! तुम्हारी किरणों के द्वारा ही हाथियों को ताकत मिलती है! हाथियों के मस्तिष्क में मुक्तामणि का उदय होता है! नाग की मणि भी आपकी किरणों के प्रभाव से बनती है! अपने भास के द्वारा जीवन का निर्माण करने वाले, तेरे लिए नमस्कार है।

 

दिवसमुखकरं त्वां पूर्वदिश्युद्भवन्तं

विहगविविधशब्दैस्स्तूयमानं स्वभावैः

अहिनकुलकुलेषूत्साहमाभावयन्तं

ह्यरुणयुतरथं चाऽऽप्यारुणाभम्भजेऽहम्||||

 

तुम सुबह करते हो। पूर्व दिशा में उदित होते हो। विविध पक्षियों के स्वाभाविक (प्राकृतिक) शब्दों से स्तुति किए जाते हो। सर्प, नेवला - इन सब जातियों में उत्साह की भावना भरते हो। अरुण है सारथी जिसका ऐसे रथ पर बैठते हो और अरुण लालिमा युक्त आभा वाले आप हो। आपका मैं भजन करता हूं

 

भरतु निजसुवीर्यं मय्यथ त्र्यक्षमोदिन्!

लसयतु सुरकान्त्या मस्तकं मत्स्वभावम्

श्रुतिपथमखचारिन्! हव्यनीर्हे हयाढ्यो-

दयतु जयतु देव! स्मार्तकर्मेक्षरक्षिन्||||

 

तीन नेत्रों वाले शिव जी को तुम प्रसन्न करते हो, अपना सुन्दर तेज (पराक्रम) मुझ में भी भर दो। अपनी दिव्य कान्ति से मेरा मस्तक चमका दो। मेरा स्वभाव उन्नत करो। वेदों के रास्ते में बतलाए गए जो यज्ञ हैं, उनमें विचरण करने वाले तुम सूर्य हो। तुम हव्य को देवताओं तक भी पहुंचाते हो। घोड़ों की सम्पत्ति वाले हो। स्मार्त आदि कर्मों के निरीक्षण तथा सुरक्षा करने वाले देव, हम पर दया करो, आपकी जय हो।

 

निशि तमसि यदाऽयं सुप्तिमग्नो हि लोको

भवति च रजनीशश्शीतरश्मिप्रदाता

जडमिव सकलं तद्वीक्ष्य मोहान्धकारे

प्रकटयति निजोद्भासैश्शनैरेष सूर्यः||१०||

 

जब यह सारा संसार सो जाता है और रात का स्वामी चन्द्रमा शीतल किरणें बिखेरता है, तब इस सारे संसार को मोह रूप अन्धकार में जड़ की तरह सोता हुआ देखकर आप धीरे-धीरे प्रकाश के साथ अपना स्वरूप प्रकट करते हो।

 

ज्वलयति  वनानि स्वाग्निना तापनोऽसौ

शमयति जलवृष्ट्या मेघहेतुः क्वचिद्वा।

वमयति मणिभिर्वाऽग्नीन् मयूखैश्च तीव्रैः

दलयति कुमुदानीशो दिनस्यायमर्कः||११||

 

 

हे तापन! कभी-कभी अपनी अग्नि से तुम जंगलों को जला डालते हो! लेकिन तुम चूंकि बादल बनाने के कारण (मेघहेतु) भी हो, अतः आप उसको कभी जल की वृष्टि से शान्त भी करवा देते हो सूर्यकान्त आदि मणियों से आप ही आग उगलवाते हो। और दिन के स्वामी आप ही कुमुद के फूलों की पंखुड़ियों को बंद करते हो!

 

विकसयति च पद्मं नीलमम्भोजमेवं

वनहरिततरून् यो जीवयन् जीवनाथः

शशकहरिणवत्साँश्चञ्चलीकारयन् यो

ह्युदयति नभसीशस्तं प्रणौति द्विजोऽसौ||१२||

 

जिस तरह हजारों पंखुड़ियों के लालकमल को, इसी तरह नीलकमल को भी जो खिलाता है। जंगल के हरे-भरे वृक्षों को जो जीवित रखना है, ऐसा समस्त जीवों का जो नाथ (सूर्य) है। खरगोश, हिरण, बछड़े आदि को चञ्चल बनाने वाला जो इस आकाश में उदित होता है - यह ब्राह्मण उस स्वामी को प्रणाम करता है।

 

अखिलभुवननाथ! ब्रह्मरूपिन्! जगत्यां

भ्रमति खचरवन्द्यो नन्द्यरूपोऽग्निरूपः

तव हि विमलगाथा गीयते ब्राह्मणैर्हे

हिमरुचिरसुहृत्त्वां हैमरूपं नमामि||१३||

 

सारे भुवन के नाथ ब्रह्मरूपिन्! इस संसार में सभी नक्षत्रों से वन्दित! प्रशंसनीय रूप वाले! अग्नि रूप वाले! तुम्हारी विमल गाथा, ज्ञानी ब्राह्मण लोग गाते हैं। ठंडी है रुचि जिसकी ऐसा चन्द्रमा आपका मित्र है, और आपका स्वर्ण के समान रूप है। आपको मैं नमस्कार करता हूं।

 

अरुणफलमिव त्वां मन्यमानो कपीशः

स्वशुभमुखगुहायां स्थापयंश्चैव बाल्ये

निखिलभुवनतमांस्युत्पाटनायेह कोऽपि

न हि सुरजनोऽन्यश्शक्तवान् त्वाम् ऋतेऽर्क||१४||

 

लाल रंग का फल समझकर हनुमान् जी ने अपनी शुभ मुख रूपी गुफा में आपको बचपन में रख लिया था। उस वक्त पूरे संसार में अंधेरा छा गया। कोई भी अन्य देवता उस अंधेरे को आपकी अनुपस्थिति में उखाड़ नहीं पाया (हटा नहीं पाया)।

 

मम मनसि धियीत्थं ज्ञायते नैव कोऽद्य

कवनपटुतरोऽयं मन्मनीषां प्रचोद्य

सुरमुनिमनुजार्च्यस्याऽर्कदेवस्य काव्यं

विरचयति मदिष्टाऽऽश्लिष्टशिष्टं विभाति||१५||

 

मेरे मन और बुद्धि में में न जाने कौन यह कविता करने में अत्यन्त निपुण मेरी बुद्धि को प्रेरित करके देवता, मनुष्य, ऋषि-मुनि के पूजनीय अर्क, सूर्य देव का काव्य रचवा रहा है, यह कुछ ऐसा ही है जैसे मेरे इष्ट देवता से सम्पृक्त हुआ कोई शिष्ट काव्य शोभा देता हो।

 

निपतति दहनाग्नौ जायते तत्सुवर्णं

कनकमिति तु लोके ख्याप्यते तस्य नाम

इति  जनगणाय ज्ञापयंश्शोभसे खे

शिव! निजतनुतापात् स्यात् प्रकाशः परेभ्यः||१६||

 

जब जलती हुई अग्नि में गिरता है, तब वह सोना बनता है और संसार में कनक इस नाम से प्रसिद्ध होता है (इसी तरह मनुष्य भी जब परिश्रम रूपी अग्नि में पड़ता है तो महान् बनता है) - इस प्रेरणा को जनता को आप बता रहे हो , क्योंकि आप खुद जलते हो और दूसरों को प्रकाश देते हो! आप कल्याण हो।

 

तनयसुखमवाप्तुं श्रीवशिष्ठानुशिष्टः

क्रतुरतधृतधन्वा प्राणदानोद्यतोऽभूत्

मृगपतिसमुपेतां नन्दिनीं रक्षितुं यस्-

तव  कुलजराजा चित्रभानो! दिलीपः||१७||

 

पुत्र का सुख प्राप्त करने के लिए श्री वशिष्ठ के आदेश का पालन करते हुए, यज्ञ के कार्य में लगे हुए धनुष धारण करके, मृगराज के पास पहुंची नन्दिनी गाय की रक्षा हेतु (स्वयं को विवश पाकर) अपने प्राण देने के लिए उद्यत हुए जो, हे चित्रभानो (सूर्य)! तुम्हारे ही तो कुल के थे वो राजा दिलीप।

 

रघुरपि सुरराजं चाहवे तुष्टवान् यो

मखहयमथ वाप्तुं धर्मकर्तव्यनिष्ठः

तव कुलजवीर्यश्श्रीदिलीपस्य पुत्रो

मिहिर! तव महिम्ना सोऽव्यथश्चाव्यथस्त्वम्||१८||

 

अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को छुड़ाने के लिए, जिसने देवताओं के राजा इन्द्र को युद्ध में युद्ध में सन्तुष्ट किया, हे मिहिर! धर्म-कर्म में निष्ठ तुम्हारे ही कुल में पैदा हुए पराक्रमशील श्रीदिलीप के पुत्र, महाराज रघु थे। जिस तरह तुम अव्यथ हो, वे भी वैसे ही व्यथित नहीं होते थे - ये सब तुम्हारी ही महिमा से है।

 

हरिरपि तव वंशे रामरूपेण जातो

दिविजदलनदक्षः क्षात्रधर्मानुसारी

अतुलबलमहो त्वां को न वेत्ति प्रभाभृद्!

भरतु नवमथौजोऽस्मद्भुवां रक्षकेषु||१९||

 

भगवान् विष्णु भी आपके कुल में राम के रूप में जन्म लिए, जो राक्षसों का वध करने में दक्ष थे। क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाले थे। हे प्रभा धारण करने वाले तुम अतुल्य बल वाले हो, इस बात को कौन नहीं जानता? आप अपना यह तेज हमारी धरती के रक्षकों में भी भर दीजिए!

 

गरुडखगरुरुक्षुर्विष्णुरेवं विभाति

धवलवृषभपृष्ठे रोढुकामोऽथ शूली

हरितहयरथे त्वं हेमभूतेऽम्बुजेश!

ह्यरुणनुतवपुष्को रोहणाय प्रभाते||२०||

 

पक्षिराज गरुड़ पर आरूढ होने की इच्छा वाले भगवान् विष्णु की जो शोभा होती है। सफेद रंग के सांड पर बैठने वाले भगवान् शूली शङ्कर की जो शोभा होती है, इसी तरह हरे घोड़े से जुते हुए रथ पर जो कि सोने का बना हुआ है, अरुण से प्रणाम स्वीकार करते हुए सुबह के समय उस पर चढ़ते हुए, हे कमलों के स्वामी! आपकी भी शोभा होती है!

 

बुधजनगणगोष्ठ्यां प्रायशो यस्य चर्चा

प्रचरति बहुचिन्त्यैश्श्रौतकर्माध्वरस्य

तदपि दिनकर! त्वां नो विना भाव्यते वै

जयतु मखविभाविन्! भास्करार्चानुकूलः||२१||

 

विद्वानों के समूह की गोष्ठियों में जिस श्रौत कर्म के यज्ञ की बहुप्रकारक चिंतनों द्वारा चर्चा का प्रचार होता है, हे दिनकर, आपके बिना उसकी भावना हो नहीं सकती, क्योंकि आप प्रत्येक यज्ञ की भावना वाले हैं, और प्रत्येक यज्ञ, हे भास्कर! आपकी अर्चना के ही (या अर्चना से ही) अनुकूल है।

 

कविगणगणनाग्रो बाणभट्टो बभूव

प्रथयति तव गाथां श्यालकस्तस्य विद्वान्

श्रुतिरतधृतदर्पान् नष्टवान् विज्ञसर्पान्

कवनबलभृता वै चञ्चुना श्रीमयूरः||२२||

 

श्रुति को धारण करने के कारण अभिमानी विद्वान् रूपी सांपों को अपने ज्ञानमय काव्य रूपी बल को धारण करने वाली चोंच से श्री मयूर कवि ने नष्ट का डाला। ऐसे उन कवियों की गणना में अग्रगण्य बाणभट्ट के साले मयूर भट्ट ने आपकी गाथा का प्रचार किया सूर्यशतकम् लिखा।

 

स्फुरति च यदि चित्ते काव्यकल्पाऽप्यनल्पा

प्रभवति हृदये वा हर्षवर्षाप्रकर्षः

अरुणिमनवबालार्कप्रभाते प्रभाते

जनयति जनवृन्दे नूतनाशाप्रकाशः||२३||

 

यदि चित्त में अनल्प काव्यकल्पना, हृदय में यदि हर्ष की वर्षा का प्रकर्ष उत्पन्न होता है (तो वह सूर्य के द्वारा की सुबह से)। (क्योंकि) लाल-लाल उगते प्रभासमान सूर्य के सुबह के समय लोगों के समुदाय में नूतन आशा का प्रकाश जन्म लेता है।


प्रसरति दिशि सुगन्धं मल्लिकापाटलानां

बकुलतगरपद्मायूथिकाचम्पकानाम्।

दिवसकरकरैस्तत्पुष्पजात्युद्भवानां

सुरभिकरमहस्कृद्देवमर्च्यं नमामि||२४||

 

सूर्य की किरणों से दिशाओं में मोगरा, गुलाब, बकुल, तगर, कमल, जूही, चम्पा इत्यादि पुष्प की जातियों में पैदा हुए फूलों की सुगन्ध फैल रही है। ऐसे सुरभि के हेतु, दिन को निर्माणकर्ता देवता, जो अर्चनीय हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ।

 

गणयति मनुजः कस्त्वां समासेव्यमानो

जगति विविधभोगान् नष्टतापान्तरात्मा

यदिह तव शरण्यो येन कामेन लोकस्-

तदपि मनसि चिन्त्यं प्राप्नुते सूर्यदेवात्||२५||

 

नष्ट हो गए हैं ताप जिसके ऐसी अन्तरात्मा वाला व्यक्ति जब आपकी सेवा में लग जाता है, तब वह इस संसार के विभिन्न प्रकार के भोगों को भी नहीं गिनता,। और जो व्यक्ति आपकी शरण में आ जाता है। जिस जिस भावना से आपकी शरण में जाता है उस-उस मन के चिन्तित काम को, हे सूर्यदेव! आपसे प्राप्त कर लेता है।

 

दधिमधुघृतदुग्धैरर्घ्यमाकल्पयन्तस्-

सजपकुसुमहस्तास्त्वन्नमस्कारकृत्ये

श्रुतिगतबहुसूक्तैश्श्रद्धया तोषयन्तो

दिनकर! कमभीष्टं नाप्नुवन्ति प्रसन्न! ||२६||

 

दही, शहद, घी, दूध इन सब से आपके लिए अर्क देते हुए, गेंदे के फूल हाथ में उठाए हुए तुमको नमस्कार करते हैं। वेदों के बहुत से सूक्तों से श्रद्धापूर्वक आपको संतुष्ट करते हैं। हे दिनकर हर एक चिंतित काम को, अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं करते? अर्थात् प्रत्येक अभीष्ट को तुम्हारे प्रसन्न होने पर प्राप्त कर लेते हैं।

 

हरि-हर-विधि-कृष्ण-क्रव्यवाड्-ढव्यवाहान्

क्रतुपति-यम-वायु-श्राद्ध-मन्त्रेश-चन्द्रान्

जलद-धनपतीन्द्रा-नङ्ग-हस्त्यास्य-राम-

हनुमदखिलदेवाँस्त्वय्यहं वीक्ष्य हृष्टः||२७||

 

ब्रह्मा, विष्णु महेश, कृष्ण, क्रव्यवाट् (स्वधा), हव्यवाट् (स्वाहा,अग्नि), क्रतुपति (यज्ञ के देवता), यम, वायु, श्राद्ध के देवता, मन्त्रों के अधिपति देवता, चन्द्र, जल देने वाले देवता वरुणादि, धनपति कुबेर, इन्द्र, कामदेव, गणेश, राम, हनुमान् – इन सब देवताओं को हे सूर्य! मैं आपके स्वरूप में ही देखकर प्रसन्न हुआ।

 

मठयति घटतोये स्वीयबिम्बं यथार्को

घटयति घटनानीत्थं घटीभिः क्षणैश्च

शठमठपठनानि ध्वंसयेद्ध्वान्तहर्ता

हटयतु हटनो[2] हे दुष्टघट्टातिपट्टम्[3]||२८||

 

घड़े के पानी में जिस प्रकार सूर्य अपना मठ अर्थात् घर बनाता है, अपना बिम्ब बनाता है। हर एक क्षण, हर एक घटी के द्वारा इस संसार की समस्त घटनाओं को जो घटाते हैं। वे ध्वान्त के हर्ता (अंधकार के हर्ता) शठों के, धूर्तों के मठों में चलने वाले पठनों को विध्वंस करें। दुष्टों की अनधिकार को नष्ट करें।

विगलितहिमराशिस्ते प्रचण्डातपेन

सुमधुरजलरूपैस्तर्पयत्यत्र लोकम्

त्वमिव निखिलसृष्टेः पोषकश्शोषकश्च

नहि भवति सुरान्यो यो बिभर्तीह साक्षात्||२९||

 

हे सूर्य! आपकी प्रचण्ड धूप से ये बर्फ की चट्टानें गल गई हैं और वह नदी के रूप में सुमधुर जल बह रहा है, जो इस सारे संसार को तृप्त करता है। तुम ही सारी सृष्टि के पोषक हो, और शोषक भी हो। ऐसा कोई दूसरा देवता नहीं है जो आपकी तरह साक्षात् भरण-पोषण करता हो।

 

फणिकृतपदभाष्ये मन्मतिं सन्तनुष्व

शिवभजनरतोऽहं स्यां यथा व्रध्र! मित्र!

तपन! सकलकल्याणं प्रदेहि प्रभांशो!

मिहिर! तव समर्चासंरतोऽयं हिमांशुः||३०||

 

पतञ्जलि द्वारा विरचित व्याकरण महाभाष्य में मेरी बुद्धि का विस्तार करिए। हे व्रध्र! मेरी बुद्धि को ऐसा बनाओ, जिससे मैं शिव के भजन में रमा रहूँ। हे तपन! सम्पूर्ण कल्याण मुझे ,दो क्योंकि तुम प्रभांशु हो, हे मिहिर! तुम्हारी ही अर्चना में लगा रहता है ये हिमांशु।

 

धवलयति स लोकान् नष्टतामिस्ररूपो

विभवयति मनुष्यानर्घ्यदाने रताँश्च

निकरयति गतान् यो दूरदेशेऽपि बन्धून्

विकिरयति बुधानां हृत्प्रदेशे नवाभाः||३१||

 

सारे लोकों को धवल कर डालता है। रात्रि को मिटा दिया है जिसने ऐसा। अर्घ्य देने वाले सभी मनुष्यों को वैभव देता है। दूर देश में गए हुए बांधों को भी वापस बुला लेता है, स्नेही लोगों से मिलाता है। बुद्धिमान् लोगों के हृदय में नई चमक (नवीन प्रकाश) जगाता है, बिखेरता है।

 

शमयति बहुदुःखं रोगदारिद्र्यरूपं

प्रथयति यशसां यो राशिमाशासु शासी

सुखयति धनदानैरिष्टदेवो नवार्चि-

स्त्विति च तव पुराणेष्वाप्तवान् सूर्य! शस्तिम्||३२||

 

रोग तथा दारिद्र्य रूपी जो बहुत सा दुख है, आप उसका शमन करते हो। सभी दिशाओं में मेरी यश-राशि को फैला दो।  क्योंकि आप शासक हो। नई-नई ज्वालाओं वाले हे सूर्य! आप धन-दान देकर इष्ट देवता के रूप में मनुष्यों को सुख पहुंचाते हो, तुम्हारी पुराणों में मैंने यह प्रशंसा सुनी है।

 

इन! दिनखमणे! हे सप्तसप्ते!  गभस्ते!

अग! भग! खग! मोदिन्! पद्मबन्धो! तमोनुत्!

प्लवग! पतग! पीत-अद्रेऽम्बरीशांऽशुहस्त!

विविधरुचिरभावैस्त्वं जनैरर्चितोऽर्क! ||३३||

 

हे सम्राट्! हे दिन में आकाश के मणि! हे सात घोड़े वाले! हे किरण वाले! कमल के बंधु! अन्धकार के शत्रु! उछलकर गति करने वाले! गिरते हुए गति करने वाले! पीले रंग वाले! पर्वत के समान! आकाश के स्वामी! प्रकाशमय किरणों वाले! अनेक रुचिकर भावों से तुम जनसमुदाय द्वारा पूजित हो।

 

बुधतनयजनिं मे सद्गृहे देहि सूर्य!

रतिचतुरसुभार्याः अर्यमन्! गोपते हे

मयि च रमणशक्तिं वीर्यरूपां भर त्वं

शतनतिपरकोऽहं पद्मिनीकान्त! तुभ्यम्||३४||

 

मेरे घर में बुद्धिमान पुत्र को जन्म दो हे अर्यमन्! रति करने में चतुर नारियाँ मुझे दो। हे गोपते! वीर्यरूप रमणशक्ति मेरे अन्दर भर दो। हे पद्मिनीकान्त! मैं आपको सौ बार प्रणाम करता हूँ।

 

वरद! भव कृपालुर्मादृशेभ्यो जनेभ्यस्-

तव चरणसुपूजासंरतेभ्यो द्विजेभ्यः

नवरसकृतहासं जीवने देहि देव

श्लथयितभवबन्धं मां कुरुष्वोष्णरश्मे! ||३५||

 

हे वर देने वाले! मेरे जैसे मनुष्यों के लिए कृपालु हो जाओ। तुम्हारे चरणों की सेवा में लगे रहने वाले ब्राह्मणों के लिए भी कृपालु हो जाओ। नए-नए रसों से उत्पन्न होने वाला हास्य मेरे जीवन में भर दो। ढ़ीले पड़ गए हैं भव के बंधन जिसके ऐसा मुझे, हे गर्म किरणों वाले! तुम बना दो।

 

नरवरसुरनद्याश्शुद्धतीराश्रितोऽहं

गुरुकुलकृतवासो वृद्धिकेशीशिवस्य

सुकृतशरणतीर्थे सज्जनैर्मण्डितेऽपि

प्रसृतदिनशुभश्रीभास्कराऽऽसीन्ममार्च्यः||३६||

 

नरवर की सुरनदी गङ्गा के शुद्ध किनारे का आश्रय लेकर, वृद्धिकेशि शिव के गुरुकुल में वास करके  सुकृत पुण्य की शरण में जो तीर्थ, जो सज्जनों से शृङ्गारापन्न है। ऐसे प्रसारित, फैलते हुए दिन की शुभ मङ्गलमय श्री/ शोभा में भास्कर ही मेरे पूज्य थे।

 

तपन! तव हि तत्त्वात् कन्यका या च कुन्ती

जनयति निजगर्भात् दानवीरं तु कर्णम्

कनककवचयुक्तो कुण्डली जन्मना यो

महदपि सुविचित्रं तेऽर्क! तेजोऽस्ति मन्ये||३७||

 

सूर्य, तुम्हारे तत्त्व से कुन्ती ने कुंवारी अवस्था में ही दानवीर कर्ण को अपने गर्भ से जन्म दिया। सोने के कवच और कुण्डल से वह जन्म से ही युक्त था। इस प्रकार का आपका महान् और अत्यन्त विचित्र तेज है - ऐसा मैं मानता हूं।

 

क्व दिनकर! तवाशीर्भिः फलन्तो वयं वा

क्व कलयितकलांशोस्त्वं हिमांशोश्च मित्र

उदितनवलकान्तिं यच्छसि श्रौतसारिन्!

ज्वलितकलुष! च श्रीवारिवर्षिन्! प्रधर्षिन्! ||३८||

 

दिनकर! कहां तो तुम्हारे आशीर्वाद से फलते-फूलते हुए हम लोग, और कहां आप इतने महान्! अनेक ग्रहण की गई है किरणात्मक कलाएं जिसके द्वारा, ऐसे चंद्रमा के मित्र! उदित होती हुई नई कान्ति को तुम देते हो।  श्रौतकर्म का सरण करने वाले(फ़ैलाने वाले/ श्रौतकर्मप्रसारक)!  तुमने पापों को जला दिया है और सम्पत्ति की धारा को बरसाया है। दुष्टों को धर्षित किया है।

 

सुरवचनममोघं शास्त्रसूक्तिस्सदैषा

फलति जगति सूर्यो भक्तिदत्तैर्जलार्घ्यैः।

कविहृदयसुधाभिस्तृप्तिमान्! चारुण! श्री-

वदनकवनमाङ्गल्यप्रसादाम्बरीषः||३९||

 

देवताओं का वचन अमोघ होता है - ये सदैव शास्त्रों का वचन फल देता है। भक्तिपूर्वक दिए गए जल के अर्घ्यदान से सूर्य देवता फलदायक सिद्ध होते हैं। कवि के हृदय की भावामृत की धारा से तृप्ति को प्राप्त होने वाले अरुण! हे अम्बरीष! आप, श्री है मुख में जिनके ऐसी कविताओं वाले मङ्गल से प्रसाद को धारण करने वाले हो।

 

झटिति घटयसि त्वं भावुकेभ्यो जनेभ्यस्-

तपन! तपितहेमोद्भासितां तच्छ्रियं वै

प्रियमपि भवनाढ्यं सङ्कुरुष्वाश्वकाढ्य

भजति विविधकामैर्यो जनो योजनैस्त्वाम्||४०||

 

तपन! तुम तपते हुए सोने की तरह उद्भासित श्री, लक्ष्मी को भक्ति से भावपूर्ण लोगों के लिए सम्पन्न करते हो (दिलवाते हो)। अपने प्रिय भक्तों को भवन दो, भवन से आढ्य करो! आप घोड़े वाले हो! जो भी आप को हजारों योजन दूर से भक्त पुकारता है, भजन करता है, उसको श्री दो।

 

तव तपन! कृपाभिर्मेघमालाधुनाहो

तड़-तड़-तड़-शब्दैर्गर्जिता वर्षणाय

क्वचिदिह वनिताभिः पुण्यभाजो रमन्ते

विरहितमदनेभ्यः प्रापयाशुश्च योषाः||४१||

 

आपकी कृपा से बादलों की माला बन गई। तड़-तड़-तड़ शब्द करती ये मेघमाला बरसने के लिए गरज रही है। कहीं ऐसी बरसातों में खुशकिस्मत लोग खूबसूरत औरतों के साथ रमते हैं, और कुछ मदन कृपा से विरहित होते हैं, उनको आप उपयुक्त साथी प्रदान करो।

 

शतजनसमवाये मारुते सम्प्रविष्टे

नृतिपरनटवृन्दैर्धूलिखेले कदाचित्

हिमलरमणकाले देवदारुश्रिते वा

नगविपिनगतेभ्यो नव्यरामाः प्रयच्छ||४२||

 

सैकड़ों लोगों के समुदाय में जब हवा का तूफान प्रवेश कर जाए, नाचते उछलते कलामंडी खाते आनंदित नट जहां धूल से खेल रहे हैं (उन सबको रमणीसौख्य दो)। या देवदारु वृक्ष के नीचे बर्फ लाने वाले मौसम में रमणोपयुक्त समय में, पहाड़ी जंगल में स्थित कामुकों को भी नई रमणियां दो।

 

तपतु तपतु देव! स्वर्णभा! भास्करश्रीः

वपतु विविधशक्तीः जीवदेहेषु योगिन्

अलसगतजगत्यां सम्भरोल्लासहर्षं

फणिनकुलकुलेषु श्रीसुखोत्कर्षदायिन्||४३||

 

हे स्वर्ण की आभा वाले सूर्य! तपो तपो! प्रकाशित करना ही आपका मङ्गल है(भास्करश्री)! योगिन्! जीवों के देह में विभिन्न शक्तियों को बोओ! आलसी संसार में उल्लास व हर्ष भर दो। आप प्राकृतिक शत्रु सर्प व नेवला इन दोनों के कुल (खानदान) में भी स्फूर्ति शक्ति रूपी हर्ष भरते हो। (आप समानरूप से सब में कृपाविस्तार करते हो यह भाव है)।

 

यदि च भुवनमध्ये शम्भुमादृक्ष्यसीति

स्मरति वद भवन्तं कोऽपि लोके हिमांशुः।

स्मरहरगुरवे चेच्छा मदीया निवेद्या

भयदभवमहाब्धेः तारयेन्मां कदा सः||४४||

 

यदि संसार का चक्कर लगाते वक्त रास्ते में कहीं भगवान् शिव आपको दिखाई दें, तो उनसे कहना कि कोई हिमांशु आपको याद करता है पृथ्वी पर है। काम नष्ट करने वाले गुरु से मेरी यह इच्छा जाहिर करना कि वे मुझे कब इस भवसागर से पार उतारेंगे?

 

अनपगतमनस्कं ग्राम्यसौहार्दयुक्तं

घनघटितविचित्रप्रावृडुन्मादिमल्लम्।

मदनशरहतं वाऽरण्यकुञ्जङ्गतं वा

नवरतिचतुराभिः पूर्णकामं करोतु||४५||

 

दूर नहीं है मन जिसका/ उदास नहीं है/स्वस्थ है मन (मिटा नहीं मन जिसका) जिसका ऐसे ग्राम्य सौहार्द (असली प्रेम-भाव) वाले व्यक्ति को। घन बादलों के द्वारा घटित विचित्र बरसात के समय जो उन्माद से भर जाते हैं ऐसे कुश्तीबाज़, पहलवान। कामदेव के बाण से मारे गए, जंगलों में, कुंज में गये हुए - इन सबको नव्य रति में चतुर स्त्रियां देकर सुखी करो।

 

सुखकररतिकाले योषिताकूजितेन

बहुविधनवरङ्गोल्लासितापीडनेन

रणवदभिमुखीनां यत्कुचामर्दनेन

सुखमतिशयमर्क! श्रीद! मह्यं प्रदेहि||४६||

 

सुखकर रतिकाल में जब योषिताएं कूजती हैं, बहुत तरह के नवरंगों से उल्लासित जब प्रणयकालिक आपीडन होता है, काम में युद्ध के समान अभिमुख हुई स्त्रियों का जब कुचामर्दन होता है - यह सब अतिशय सुख , हे श्री प्रदान करने वाले! तुम मुझे दो।


द्युतिकर! मम देहे दिव्यरश्मीन् भरस्व

सुर! निखिलजीव्यं दीप्तियुक्तं कुरुष्व

बहुविधविपरीताबद्धचर्यां मदीयां

नवलसुखकरैस्स्वैः नाशयाशुः प्रबोधिन्||४७||

 

हे द्युतिशालिन्! मेरे शरीर में अपनी दिव्य रश्मिओं को भर दो। हे देव! मेरा सार जीवन दीप्तियुक्त कर दो। बहुत तरह से विपरीतता में बंधी है जो मेरी चर्या, उसे आप अपनी ताजगी देने वाली किरणों से नाश करके, सुष्ठु चर्या से मेरा प्रबोध करो, आप प्रबोधी हो।

 

प्रकटनववपुष्के पूर्वदिश्यम्बरेऽहो

निखिलजनविनिद्राध्वंसके हासपूर्णे

उदयति सुरवरोऽयं खोदरे रक्तसक्तस्-

सकलजगति जीवाः कर्मलग्नाः भवन्ति||४८||

 

प्रकट होने वाले नया शरीर पूर्व दिशा के आकाश में होने पर, सभी जनों की विशेष (मोहादि) निद्रा का ध्वंस करने वाला हास (प्रसन्नता) भरने वाला, यह श्रेष्ठ देव आकाश के पेट में उदय होता है, जो कि रक्त की सक्ति वाला है (लाल रंग में आसक्त है) उस प्रकार के उस दृश्य में सारे संसार में सभी जीव अपने अपने कर्म में लग जाते हैं।

 

गणपतिमुदथाऽहो मोदकैर्जायते वै

पशुपतिरपि तुष्टो वारिधाराभिषेकात्

हरिरपि तुलसीनां मञ्जरीभिः प्रसन्नस्-

त्वमपि च हरिदश्वोऽसि प्रणामप्रियश्च||४९||

 

गणपति का आनन्द होता है लड्डुओं से। पशुपति शिव, जल की धारा से सन्तुष्ट  होते हैं। श्रीहरि तुलसी की मञ्जरियों से प्रसन्न होते है। इसी प्रकार, हे हरिदश्व! तुम्हें प्रणाम प्रिय है।

 

दह दह दहन! त्वं गोद्विजघ्नान् गुरूघ्नान्

हर हर हरिदश्व! श्वप्रवृत्तिं च पुंसाम्

तप तप तपनाहो लोककल्याणकारिन्!

जप जप जपयोगिन्! जापकान् पाहि नित्यम्||५०||

 

दहन! तुम गो, ब्राह्मण तथा गुरु के हत्यारों का दहन करो, दहन करो। पुरुष की श्ववृत्ति को हर लो, हर लो। लोक का कल्याण करने की आदत है तुम्हारी, खूब तपो, खूब तपो (जिससे प्रकृति-चक्र चलता रहे) जप के योग वाले! तुम ओंकार का जप करो, जप करो। और जाप करने वालों की सुरक्षा भी करो।

 

क्व च मरणभयाढ्याः जीवमानाः मनुष्याः

क्व च सुरवरेण्यस्तेजसामग्रगण्यः

दिविजमनुजयोर्यो भावरज्जुर्निबद्धो

जगति शुभसुखाशास्तेन नूनं फलन्ति||५१||

 

कहाँ मौत के भय से जीते हुए मनुष्य, और कहाँ आप सुरों में वरणीय तेजों में अग्रगण्य आप। देवताओं और मनुष्यों में जो भाव की डोर बंधी है, जगत् में शुभता को देने वाली सुख की आशाएँ उससे निश्चित ही फलतीं हैं।

 

जयति जगति धर्मस्सूर्यवंशानुकूलो

निखिलजनसुरक्षापोषणो राजरूपः

दृढवचनसुयुक्ता तेजसा दीप्तजातिर्-

भुवनतपन! ते तद्धि प्रतापाच्च नूनम्||५२||

 

सभी जनता की सुरक्षा और पोषण करने वाला, राजा के रूप वाला, जगत् में सूर्यवंश के अनुकूल धर्म जीतता है। दृढ वचन से युक्त तेज से दीप्त यह क्षात्त्र जाति, भुवन के तपन, तुम्हारे ही प्रताप से यह ऐसी प्रतापशील है।

 

अदितिरिति च माता कश्यपस्ते पिताऽस्ति

कुशल! विमलजन्माऽहो मृतण्डात्तवास्ति

मखफलहरणानां राक्षसानां निहन्ता

जनगणसुखकारी देवतानाम्प्रियश्च||५३||

 

तुम्हारी माता अदिति व पिता कश्यप हैं। हे कुशल! मृताण्ड से तुम्हारा विमल जन्म है। यज्ञ का फल चुराने वाले राक्षसों के आप निहन्ता हो। लोगों के समूह को सुख करने वाले, देवताओं के प्रिय हो।

 

असुरसुरकुलानां यन्मिथोऽभूच्च युद्धं

सकलभुवनशस्त्रास्त्रैस्सुदीप्तं च घोरम्

अहह दितिजगणास्ते भास्करेणेक्षमाणाः

द्रुतमपि बत नष्टास्तेजसा दह्यमानाः||५४||

 

देवों और दैत्यों के मध्य परस्पर जो युद्ध हुआ , सारे ब्रह्माण्ड के शस्त्रास्त्रों से दीप्तिमान घोर युद्ध वह था। वे सारे दैत्य भास्कर के द्वारा देखे जाने पर, तत्काल उनके तेज से जलते हुए नष्ट हो गए।

 

अथ निजतनयां श्रीपद्मिनीवल्लभाय

दिनमणिरवये वै दत्तवाँश्चैव संज्ञाम्

प्रणतिपरतपोभिर्विश्वकर्मा प्रसाद्य

जनयति खमणिश्च त्रीण्यपत्यानि तस्याम्||५५||

 

विश्वकर्मा ने प्रणाम पूर्वक विभिन्न तप किए उनसे सूर्य को प्रसन्न किया, पद्मिनियों के वल्लभ, दिन के मणि रवि को फिर अपनी पुत्री संज्ञा दी, और आकाश के मणि ने उसमें तीन सन्तान पैदा कीं।

 

मनुरिति तनयश्च ख्यातवैवस्वतो यो

यम इति च कनिष्ठश्श्राद्धदेवः प्रजापः

दिनकरतनया या वासुदेवप्रिया सा

क्षपयति यमुना वै प्राणिनां पापपुञ्जम्||५६||

 

विख्यात वैवस्वत जो मनु एक वे, श्राद्ध के देव प्रजापालक यमदेव दूसरे, जो मनु से कनिष्ठ हैं। और एक दिनकर की पुत्री जो कृष्ण (वासुदेव) को प्रिय है, वो है यमुना। जो प्राणियों के पाप-पुञ्ज को नष्ट करतीं हैं।

 

दिनकर तव पत्नीरूपधृच्छाययापि

मनुरभवदथेह ख्यातसावर्णिको यः

रविसुतशनिरेवं मन्दगश्चापरोऽपि

तपन च तपतीति ख्यातकन्याऽपि जाता||५७||

 

दिनकर! तुम्हारी पत्नी का रूप धारण करने वाली छाया से भी विख्यात सावर्णिक मनु हुए। तथा दूसरे हुए रविसुत के रूप में विख्यात, मन्द गति से चलने वाले शनिदेव। और तपन! तुम्हारी एक विख्यात कन्या भी हुई, जिसका नाम है तपती।

 

दिवसकर ममैतान् व्यर्थपीडाप्रदाँश्च

कपटपटपटूँस्त्वं मारयारीन् तपस्विन्

शुभगतिरतजीव्यं दुष्टचित्ताः इमे वै

कुकृतिचरणभावैर्नष्टुकामाः मदीयम्||५८||

 

हे दिवसकर! मुझे इन व्यर्थ पीडा देने वाले (अकारणवैरत्त्वमन्विष्य खलत्वात् पीडाप्रदानम्) कपट करने में पटु शत्रुओं को मारो। हे तपस्विन्, मेरा जीवन शुभगति में रमता है, किन्तु ये दूषितचित्त वाले कुत्सित कृतियों के आचरण से इस शुभगतिजीवता को नष्ट करना चाहते है।

 

प्रकृतिगतविनाशं वीक्ष्य वृक्षानुरागिन्

झटिति धनपिशाचान् तीव्रतापैस्स्वकीयैः

श्रुतिपथपरिनिन्दासंरतान् म्लेच्छभावान्

दह यवनजनाँस्त्वं हिंसकानग्निरूप||५९||

 

हे वृक्षों से अनुराग करने वाले, इस प्रकृति के विनाश को देखकर जल्दी से अपने तीव्र ताप से इन धनपिशाचों को जला दो। श्रुति वेद के रास्ते पर चलने वालों की निन्दा करने वालों को, म्लेच्छ भाव वालों कों, हिंसकों को भी आप अग्निरूप होकर जला दो।

 

अभिनवनवरात्रे शारदे प्रोद्भवे श्र्यु-

ल्लसितविविधरूपेऽप्यम्बिकापूजनानि

चरति सरति लोकश्चोपवासव्रतांश्च

भवभयपरिहन्त्र्या मोदयाऽर्काऽद्य ताँस्त्वम्||६०||

 

नए शरद् ऋतु के नवरात्रे आने पर लक्ष्मी से उल्लसित विविध रूप वाल जस नवरात्र में यह संसार विभिन्न उपवास एवं व्रतों को रखता है तथा अम्बिका का पूजन करता है। उस भव-भय के समूल विनाश करने वाली के भक्तों को , हे अर्क तुम आनन्दित करो।

 

कवनमतिरुदेति श्रीश-वाञ्छाप्रपन्ना

धनदमतिरुदीयाद् यक्षराजप्रभावात्

निखिलरणविजेता स्वाभिमानी नरस्स्यात्

तदिह शिवविभासिंस्तेजसा तेऽर्चनाभिः||६१||

 

कविता में बुद्धि जगती है, श्रीश हरि की इच्छा से प्रपन्न होकर। धन देने वाली बुद्धि उदय होती है, यक्षराज के प्रभाव से। सभी रणों का विजेता स्वाभिमानी व्यक्ति होता है, तो हे शिव के विशिष्ट भास वाले सूर्य, वो तुम्हारे तेज से (जो सूर्योपासना से प्राप्त होता है)।

 

क्वचिदथ च वनेशस्सर्वदा त्वं दिनेशः

कमलकुलसुखेशो वारिधीशस्सुधीशः

कलनफलनकारिन् भासि भास्वान् मनस्विन्

नयनसकलदृश्यश्रौतदर्शिन्नमस्ते||६२||

 

कहीं तुम जंगल के राजा मालूम पड़ते हो। दिनेश तो सर्वदा हो ही। कमल के कुल को सुख देने वाले स्वामी हो। कहीं समुद्र के स्वामी। कहीं विद्वानों के स्वामी। प्रत्येक कलनशीलता (कालादिक दृष्ट से) फल देने वाले भास्वान् तुम मनस्वी हो उद्भासित हो। आँखों के सभी दृश्यों समेत वैदिक तथ्यों को दिखाने वाले तुम्हें नमस्कार है।

 

प्रसरति न गृहेष्वन्तर्भवेषु त्वदीय:

यदि च मधुररश्मिश्रीप्रकाश: क्वचिच्च

तमसि विविधरोगग्रस्तकौटुम्बिकास्ते

मनसि तुदितरूपाश्चर्मनेत्रादिरुग्णा: ||६३||

 

यदि कहीं घरों में (घर के अन्दरूनी हिस्सों में) आपका मधुर रश्मियों वाला शोभायमान प्रकाश नहीं पहुँचता, तो अंधेरे में विविध रोगों से ग्रस्त वे उस घर में रहने वाले परिवारीजन हो जाते हैं। उनके मन भी व्यथित रहते हैं, और चर्म,नेत्र आदि के रोग पैदा होते है। (इसलिए घर ऐसे बनवाए जाएँ, जहाँ सूर्यप्रकाश उचित रूप से प्राप्त हो यह भावार्थ है।)

 

नहि भवति दिनेषु प्रायशो वृष्टिकाले

तव रुचिरसुदृष्टिर्जीविनां जीवनेषु

घनमहितनभांसि प्रीतिभाजो विलोक्य

नवनवरमणीनां कामकेल्युत्सुकास्स्यु: ||६४||

 

प्रायः वृष्टिकाल के दिनों में आपकी रुचिर दृष्टि जीवों के जीवन पर नहीं पड़ती है। घनों से महित आकाशों को देखकर प्रेमी लोग नई-नई रमणियों के साथ कामकेलि के लिए उत्सुक होते हैं।

 

अयि! शतकर! देव! त्वं निरीक्षे: जगत्सु

उदितनवलरत्या नव्यरूपानुसक्तान्

रहसि मदनसक्तास्त्वां जडं मन्यमाना:

तव दिवसपते हे! सुप्रकाशे रमन्ते||६५||

 

हे सौ किरणों वाले सूर्य! हे देव! तुम इन संसारों में उदित होती नई प्रेमधारा से नए रूपों में आसक्त जोड़ों को देखते हो, एकान्त में काम के आसक्त होकर तुम (सूर्य) को जड़ समझते हुए, हे दिवस के पति! तुम्हारे सुन्दर प्रकाश में ही रमण करते हैं।

 

निशि हि रमणलीला सुप्रशस्ता समुक्ता

कलियुग इह दिनेषु प्रार्थयन्तीव भूय:

प्रकृतिहरितलोके त्वद्विभासे विभासिन्!

विपिननदतटानां वृक्षमूले रमन्ते||६६||

 

रात में ही रमण की लीला प्रशस्त कही गई है। कलियुग में लेकिन कामीजन दिन में ही इसकी प्रार्थना करते हैं। प्रकृति की हरितिमा में तुम्हारे विभास में हे विभासिन्, जंगलों में नदियों के किनारे वृक्षमूल में रमण करते हैं।

 

उदितनवबलौजास्त्वां सहैतो जटायु:

सहजविहगराजाऽहो समास्पर्ष्टुकाम:

महति तपसि निष्ठात् त्वज्ज्वलद्देहतस्-तौ

ज्वलितदृढसुपक्षौ पातितौ चाब्धितीरे||६७||

 

उदय हुआ है नए बल का ओज जिसमें ऐसा जटायु अपने सगे भाई के साथ आपको स्पर्श करने की इच्छा से आपकी तरफ उड़े, किन्तु महान् तप में परिनिष्ठित आपके उज्ज्वल शरीर के प्रभाव से आपसे बहुत ही वे दोनों जले हुए दृढ़ पंखों वाले समुद्र किनारे आ गिरे।

 

अजित इह जगत्यां त्वत्प्रभाव: प्रसारी

सुरवर! तव कर्माप्यन्यकर्मप्रकाशं

हतशतरिपुवीर्य! स्वर्णदस्स्वर्णकारिन्!

जय जय यजमान! श्रद्दधानैस्सदिष्ट: ||६८||

 

हे अजेय सुरवर! तुम्हारा प्रभाव प्रसरणशील है, आपका कर्म अन्य के कर्म का प्रकाशन करना है। सैकड़ों शत्रुओं को मारने वाला आपका पराक्रम है।  स्वर्ण देने वाले तथा स्वर्ण बनाने वाले भी आप हो। हे यजमान आपकी जय हो जय हो। श्रद्धालुओं द्वारा आप सज्जनों के इष्ट बताए गए (सदा चाहे गए)।

 

मखविहितसुमन्त्रैरिष्टिकां निर्वपन्ति

श्रुतिगुणमहिताश्च ब्राह्मणास्ते हविर्भुक्!

क्षणखचितनरत्त्वं रूपमादर्शयँस्त्वं

न भवसि दहनोऽहो भक्तिभाग्भ्यो युगेभ्य: ||६९||

 

हे हविष् का भोजन करने वाले! श्रुति के गुणों से महिमाशाली ब्राह्मण लोग तुम्हारीं यज्ञ में विहित सुमन्त्रों से इष्टिका निर्वपन करते हैं।  एक क्षण में ही धारण किया गया नराकार देव रूप दिखलाते हुए, भक्तिमान् पुरुषों के लिए ज्वलनशील नहीं होते हो (यह बात युगों से प्रसिद्ध है)।

 

अहिपतिरथ निष्ठो नागलोकप्रशास्ता

जयतु स विषदन्तो वासुकिर्भोगसम्पत्

शतशतविषकन्यासुन्दरीसंवृतोऽपि

दिनमुख इव तेऽसौ श्रद्धया बद्धपाणि: ||७०||

 

नागों के पति, नागलोक पर शासन करने वाले, विषदन्त, भोगसम्पत्ति युक्त उन वासुकि की जय हो। वे सौ-सौ नाग-सुन्दरियों से घिरे हुए सुखसम्पन्न हैं। और हे सूर्य सुबह के समय आपके लिए श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़े नमस्कार करते हैं।

 

जलरसन! जलानां त्वं शुचिस्राविहेतु:

सुरवसन! वसेस्त्वं सद्रुचिश्राविलोके

ज्वलनहसन! नित्यं भ्राम्यसि ब्रह्मभाण्डे

श्वसन! सकललोकस्य त्वमेवासि वायु: ||७१||

 

जल आपका रस है। जलों के शुद्धतापूर्वक बहने के लिए आप कारण हैं। देवताओं की महक आप हो (या देवतों के वासस्वरूप आप हो)। सत्त्वगुण की रुचि जहाँ बहती है, ऐसे लोक में आप रहते हो। ये जलती हुई ज्वालाएँ ही आपका हास हैं। आप इस ब्रह्माण्ड में नित्य घूमते रहते हो। तुम प्राणियों की श्वास हो। तुम ही समस्त लोक की वायु हो।

 

अरुणवसनधरा: वा श्वेतवासश्श्रिता: ये

गुरुरुचिवसना ये ध्यायमाना दिनादौ

रविहविषि मधूनां सर्पिषामर्पयन्ति

हवनभुजि भजन्ते तेऽपि सूर्यस्य लोकम्||७२||

 

लाल, सफेद या पीला वस्त्र धारण किए हुए जो सूबह के समय आपका ध्यान करते हुए , रविहविष् में शहद और घी का अग्नि में अर्पण करते हैं, वे भी सूर्यलोक को प्राप्त करते हैं।

 

वरुण! रविकराँस्त्वं भूस्समारूढदेहो

विजलवति च देशे याहि तृप्यस्व जन्तून्

जललवमपि वाञ्छन्तीव पीयूषवद्ये

भव रविवरुणाख्यो देवयोरेकरूप: ||७३||

 

हे वरुण! तुम सूर्य की किरणों पर चढ़कर जलहीन प्रदेशों मे जाओ और जन्तुओं को तृप्त करो। वे लोग एक जल की बूंद को भी अमृत की तरह चाहते हैं। इस प्रकार तुम रवि और वरुण नाम वाले दो देवताओं का एक रूप हो जाओगे।

 

मरुति रविकराश्चामिश्रिता ग्रीष्मकाले

व्यथितमिव कदाचिल्लोकमेवं श्रयन्ति

तदपि वहदसह्यं भाति विद्वन्! समस्मै

तपनपवनरूपायास्तु तेजो! नमस्ते||७४||

 

हवा में सूर्य की किरणें ग्रीष्मकाल में मिश्रित हो जातीं हैं। (लू चलती है)। और वे तेज हवा में मिश्रित गर्म सूर्यकिरणें कभी कभी व्यथित लोक का सेवन करतीं हैं (अर्थात् लोक को व्यथित कर देतीं हैं)। हे विद्वन् , सभी के लिए वे बहती हुई असह्य मालूम होतीं हैं। सूर्य और वायु के एक रूप के लिए, हे तेजस् (सूर्य) तुम्हें नमस्कार है।

 

मृतवपुष इवैते प्रेतभूता: पिशाचास्

तव किरणविभासे नात्मनो दर्शयन्ति

हृतभयजगदेवं देव ते सन्निकाशे

श्वसति हसति यात्यामोदते मङ्गलेन||७५||

 

मरे हुए शरीर वाले भूत, प्रेत, पिशाच, तुम्हारे प्रकाश में खुद को दर्शाते नहीं हैं। हर लिया है जगत् का भय जिसने ऐसे, हे देव, आपके सान्निध्य में यह संसार सांस लेता है, हंसता है, गमन करता है, मङ्गल से आनन्दित होता है।

 

अजवदनयजुर्यत्तस्य पाठाच्च पूर्वं

स्मरति हि गुरु-वाणी-शङ्करा-ऽऽदित्यदेवान्

श्रयत इव ततोऽस्य श्रौतवाक्श्रीरवाप्तुं

तव फलदचरित्रं श्रद्धया सञ्जपन्ति||७६||

 

बकरे के मुख वाला जो यजुर्वेद है, उसके पाठ से पूर्व पाठकर्ता बृहस्पति,सरस्वती,शिव और बृहस्पति का स्मरण करता है। तब इसकी वेदवाणी लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिए सेवन करती है, फिर वे वेदपाठी लोग आपका फलप्रद सूक्त श्रद्धा से जपते हैं।

 

दशवदनरणे तं जेतुकामो हि रामो

दिनकरहृदयस्तोत्रं पठेच्छ्रद्धयाहो

प्रथमपुरुष! कुलस्य त्वं विलोक्याच्युतं तं

मुदित इव च युद्धे तत्समाहित्य वर्त्ते: ||७७||

 

दस मुखों वाले रावण से युद्ध के समय उसको जीतने की इच्छा से राम ने आदित्यहृदयस्तोत्र का पाठ किया , हे रघुकुल के प्रथमपुरुष, तुम उन विष्णु अवतार राम को देखकर बहुत आनन्दित हुए और युद्ध में उनके भीतर समाहित ही हो गए।

 

मणिमुकुटधरश्श्रीवेदभृल्लोकतुष्टो

रिपुदलनसुदक्षश्शङ्खचक्राब्जपाणिः

अतुलितबलधामश्रौततत्त्वोपदेष्टर्!

विभयकर! नमस्ते देहि मां स्वप्रतापम्||७८||

 

मणि युक्त मुकुट धारण करने वाले, वेदधर्ता, लोक से तुष्ट, शत्रु-दलन में सम्यक्तया दक्ष, शङ्ख-चक्र-कमल को हाथों में लिए हुए, अतुलित बल के धाम, श्रौततत्त्व के उपदेशक, निर्भय करने वाले, तुम्हारे लिए नमस्कार है, तुम मुझे भी अपना प्रताप दो।

 

अयि सुकृतवरीय! त्वत्तपोभिश्च नूनं

सकलभुवनजीवो जीवनाशाप्रहृष्टो

न गणयति मृतिं चाप्यागतां त्वद्दिनेषु

दिनवर! ननु कालक्रान्तिरेषा त्वयैव||७९||

 

हे पुण्यों से वरणीय! तुम्हारी तपस्याओं से ही समस्त संसार के जीव, जीवन की आशा से हर्षित हैं। आपके उत्तरायण होने पर आई हुई मृत्यु को भी नहीं गिनते, दिनवर! यह काल की क्रान्ति तुम्हारे द्वारा ही है।

 

कृषकगण! धरासूत्पादयेस्त्वं तथान्नं

तपति जलदकारी हैष शक्त्यात्मवान् यो

न हि मखरतदेशे चेतयस्सम्भवन्तु

कुरु कुरु किरणैस्स्वैः मङ्गलं सौख्यवृष्टे||८०||

 

अरे किसानों! तुम जमीनों में खूब अन्न उगाओ। यह बादल बनाने वाले सूर्य शक्तिमान् मित्र सूर्य तप रहे हैं। यज्ञ में लगे रहने वाले स्थानों पर ईतियों[4] की सम्भावना नहीं होती। सुख की बारिश कराने वाले सूर्य! अपनी किरणों से तुम मङ्गल करो।

 

अपकुरु जडतानाम्मूढतानां तमांसि

मम कुरु कुरु सौख्यं स्वर्णरश्मे! जगत्प!

वितनुहि धनवल्लीं मल्लिकामालयेव

चिनुहि फलदरूपं भक्तिसक्ताय मह्यम्||८१||

 

जड़ता और मूढ़ता के अंधेरों को दूर करो। जगत् के पालनहार! स्वर्ण की किरणों वाले! मुझे सुखी करो। मल्लिका की माला के समान मेरे धन की बेल को फैलाओ। आप मेरे लिए फलप्रद रूप का चयन करो (फलप्रदाता बन जाओ), क्योंकि मैं आपकी भक्ति में आसक्त हूँ।

 

दमय दमय दुष्टान् , इष्टलोकान् प्रसिञ्च

शमय शमय पापान्यच्युतेशप्रभावात्

गमय गमय सूर्ये तद्वरेण्ये प्रभुत्वे

फलय फलय सौभाग्यानि देव! द्रुतं मे||८२||

 

दुष्टों का दमन करो, दमन करो। इष्टलोकों को सींचो, सींचों। शिव-विष्णु के प्रभाव से  पापों का शमन करो, शमन करो। उस वरेण्य प्रभुत्त्व सूर्य में ले चलो, ले चलो। हे देव! मेरे सौभाग्यों को फलित करो, फलित करो।

 

ज्वलयति निशि चन्द्रो योषितानामभावे

व्यपगमयति सूर्यस्त्वं दिनं कर्महीनं

क्व सुखय खविभासो भक्तमेनं हिमांशुम्

इति मम विकलत्वे चायुरस्तं समेति||८३||

 

योषिताओं के अभाव में रात में यह चन्द्रमा मुझे जलाता है। और हे सूर्य, (अलब्धविशेषवृत्तिकतया) कर्म से हीन दिन को आप मेरे लिए निकाल देते हो। आकाश के विभास, आप अपने इस हिमांशु नामक भक्त को कब सुखी करोगे, इसी विकलता में मेरी आयु निकली जा रही है।

 

फलति सुरसदाशीर्देवताशा न मिथ्या

मिलति सुहृदभीष्ट: कामनानां प्रकल्प:

खिलति हृदयपुष्पं तावकोद्भासदृष्ट्या

सुफलय जनिमेनां सत्कृपापूर्णहृष्ट्या||८४||

 

देवताओं के आशीर्वाद सच्चे होते हैं और फलते हैं। उनसे लगाई गई आस झूठी नहीं होती। सुहृद् प्रेमी मिल जाते हैं, अभीष्ट कामनाओं के प्रकल्प प्राप्त होते हैं। हृदय का पुष्प खिल जाता है। ये सब कुछ आपके ही उद्भास की दृष्टि से है। आप सत्य कृपापूर्ण हर्ष से मेरे इस जन्म को सफल बना दो।

 

जल-नदनवतीनां वृक्षपक्ष्यावृतानां

विविधपशुगतीनां नक्रचक्राकुलानां

तटगतपुरुषैस्त्वं त्वद्दिनादौ दिनेश

अरुणकिरणबिम्बो लोक्यसे नीरमध्ये||८५||

 

जल से शब्द करने वाली नदियों के वृक्ष और पशु-पक्षियों से घिरे हुए, विविध पशुओं की गतिविधियों से एवं मगरमच्छादिक जीवों से आक्रान्त, नदियों के किनारे स्थित लोगो द्वारा, हे दिनेश! तुम लाल किरणों से घिरे बिम्ब के रूप में जल के मध्य देखे जाते हो।

 

घटसलिलमध्ये कूपतोये समुद्रे

शतरजतसुकुम्भाम्भस्सु सूर्य! त्वमेको

हरिदपसि तडागे तत्र चोपाधिभेदात्

युगपदपि बहुत्वैर्भिन्नबिम्बैर्विलोक्य: ||८६||

 

घड़े के पानी में कुए के पानी में, समुद्र में, सौ चांदी के सुन्दर घड़ों के जलों में सूर्य तुम एक ही, हरे पानी के तालाब में भी उपाधि के भेद से एक ही साथ सब जगह बहुत्व रूप में भिन्न बिम्बों के रूप में देखे जाते हो।

 

झरझरझरितानि स्वर्णरूपाणि धत्से

मरमरमृतकान्युज्जीवितानीव धत्से

हरहररवितानि त्वं हिरण्यानि धत्से

हरपरचरितानि त्वाच्युतानीव धत्से[5]||८७||

 

झर-झर करके झरते हुए जल में कभी स्वर्ण का रूप धरते हो। मर-मर कर मरते हुओं को भी जीवित करते हो। हर हर ऐसा शब्द करने वालों के लिए तुम स्वर्ण धारण करते हो, उन्हे सम्पत्ति देते हो। शिवजी के चरित्रों को कभी च्युत न होने वाले तत्त्व/कर्म (विष्णुतत्त्व) की तरह धारण करते हो।

कुमुदपतिरहस्यं रात्रिकाले विपश्यन्

कमलपतिजलीलां लोकमानो दिनेषु

क्षरति वय इदम्मे नैव जाने कदाचित्

फलतु कथमिवाद्य त्वत्स्तुतीनाम्प्रताप: ||८८||

 

कुमुदों के स्वामी चन्द्रमा का रहस्य रात में देखते हुए, कमलपति से उत्पन्न लीला को दिनों में देखते हुए, मेरी ये आयु कैसे चली जा रही है, मुझे स्वयं नहीं पता। न जाने तुम्हारे प्रति की हुई मेरी स्तुतियों का प्रताप मेरे लिए कब फलेगा।

 

अयि घटशतकानां भेदनाद्दर्शितस्व:

अयि मठशतकानां स्वामिनां पूज्यभास्वन्

अयि शठपथगन्त्रुद्घातक प्रीतिमोदिन्

मयि हठपरकस्त्वं भूस्समुद्धारदृष्ट्या||८९||

 

सौ घटों को भेदने (फोड़ने) के बाद आपका स्वरूप दिखता है।[6] सैकड़ो मठों के स्वामियों के पूज्य आप भास्वान् हैं। शठों के रास्ते पर गए हुओ के लिए घातक , प्रेम से प्रसन्न होने वाले, मेरे समुद्धार के लिए भी आप हठ धारण कर लो।

 

समसनपदयुक्ता नृत्यताद्वाङ्मयूरी

कवनरसनिपीता हृष्यताद्वाग्वधूटी

सुरभितशतचिद्-वाङ्मल्लिकेयं च मे चेत्

हरितहय! मयीयं ते प्रसादान्निविष्टा||९०||

 

आज जो समास युक्त पदों वाली मेरी वाणी रूपी मोरनी नाच रही है। काव्य के रस को पी लिया है जिसने ऐसी वाणी रूपी दुल्हन जो हर्षित हो रही है। सैंकड़ों चेतनाएँ महक रहीं हैं जिसमें, ऐसी मेरी वाणी रूपी मल्लिका जो मेरी आज है, ये सब कुछ, हे हरे घोड़ो वाले सूर्य! आपके प्रसाद से ही मुझमें प्रवेश किया है।

 

शिव शिव शिव चेत्येवं ब्रुवाणास्त्वदीया

अनुदिनमिह तापिन्! रश्मय: प्रस्फुरन्ति

झटिति झटिति लोकाँस्त्वं परिक्राम्यसीति

गतिमति सुरथे ते भावपुष्पं युनज्मि||९१||

 

हे तापिन्! हर दिन, शिव शिव शिव ऐसा बोलती हुई आपके शरीर से किरणे फूट रहीं हैं। तुम जल्दी-जल्दी इन लोकों की परिक्रमा लगा देते हो।  आपके गतिमान् रथ में, मैं अपने भावों का पुष्प चढ़ाता हूँ।

 

ग्लपयतु जगतां त्वं ग्लानिमाशुस्स्वघर्मै:

क्वथयतु कुमनांसि स्वैर्वपुर्भिश्च तीव्रै:

अकलितकलया यत्कालकीलं विधास्यन्

समयनियमकारिन्नेकचक्षुर्नमस्ते||९२||

 

आप इन संसारों की ग्लानि को तुरन्त अपनी धूप से पिघला दो। कुत्सित मन के विचारों को अपने तीव्र प्रकाशित वपुष् (स्वरूप) से उबाल दो। नष्ट कर दो। लक्षित न हो सकने वाली कला से तुम काल की कील (धुरी) को रखते हुए (शोभायमान हो), समय के नियमकर्ता! जगत् के एकमात्र चक्षुष्! तुम्हें नमस्कार है।

 

मदनदहनभालस्थाद्धिमांशो: प्रभाभिर्

द्विजमणिकुलजातश्श्रीहिमांश्वाख्यगौडो

हरितहयनतीनां यश्शतीं तत्कृतां चेत्

पठति तपननिष्ठस्सुप्रतिष्ठां समेति||९३||

 

कामदेव को जलाने वाले शिव के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की किरणों से ब्राह्मणों के श्रेष्ठ कुल में श्रीहिमांशु गौड ने जन्म लिया, जिसने हरे घोड़ों वाले सूर्य के लिए सौ श्लोकों की स्तुति की रचना की। जो इसको सूर्य में निष्ठा करके इसे पढ़ेगा, वह प्रतिष्ठा को प्राप्त करेगा।

 

हृदयपरिगतैर्यो भावपुष्पैस्स्वकीयै-

रतिसहजकथाढ्यैर्वन्दनै रश्मिरज्जो:

कलुषहवपुरित्थं स्वर्णदेवं विचिन्त्य

पठति शतकमेतत् तत्समक्षं दिनेश:||९४||

 

स्वर्णवपुष् देव का चिन्तन करके, अपने हृदय के शुद्ध भावपुष्पों से जो अति सहज कथा से सम्पन्न वन्दनों से रश्मिरज्जु के कलुष हरने वाले इस शतक का पाठ करेगा, उसके सामने साक्षात् दिनेश प्रकट हो जाएँगें।

 

जड इव परिलोक्यो यस्तपेत्तापयेच्च

प्रलयसमयमेत्य ज्वालयेद्यो जगन्ति

मम कृतशतकस्य स्तोत्रकस्य प्रभावात्

नर इव धृतरूपस्साक्षितां याति पुंसाम्||९५||

 

जो ये सूर्य जड़ की तरह दिखाई देते हैं, तपते और तपाते हैं। प्रलय के समय ये ही उग्र होकर लोकों को जला डालते हैं। मेरे किए हुए शतक स्तोत्र के प्रभाव से मनुष्य की तरह रूप धारण करके भक्त पुरुषों के सामने सूर्य प्रकट हो जाते हैं।

 

लसितविविधभूषस्सर्वलोकप्रकाशो

क्वचिदथ स सुभाग्याद्दृश्यते निर्जने वै

जपति सकलचिन्तां यश्च सूर्ये नियोज्य

प्रकटितनिजरूपस्तस्य जायेत सूर्य: ||९६||

 

विभिन्न आभूषण पहने हुए, सर्वलोक के प्रकाश, कभी वे निर्जन प्रान्त में सौभाग्यवशात् दिखाई देते हैं। जो समस्त चिन्तन सूर्य में लगाकर इनके मन्त्र का जप करता है, सूर्य अपना स्वरूप उसके लिए प्रकट कर देते हैं।

 

करि-हरि-महिषा-ऽश्वैर्जङ्गले मङ्गलाढ्ये

हरिण-शश-वराहैस्सम्भृते नैकजीवे

स्थल-जल-नद-युक्ते निर्झरे शब्दिते च

मदन-रमण-मोदं वीक्षसे त्वं खमार्गात्||९७||

 

हाथी, शेर, भैंस, घोड़ा, हिरन, खरगोश, सूअर इत्यादि अनेक जीवों से भरे हुए मङ्गलाढ्य जङ्गल में जो कि स्थल, जल झरना इत्यादि से युक्त झरते हुए झरने से शब्दायमान है, उसमें मदन जनित रमण के आनन्द को आप आकाश के रास्ते से देखते हो।

 

कुचकलशपटानां दक्ष उद्घाटनेषु

श्लथयति युवतीनां यस्त्वधोवस्त्रबन्धं

शतशतरमणीर्यो घोटकीकृत्य रात्रौ

रमत इव तुरङ्गस्त्वत्तुरङ्गाप्तवेग: ||९८||

 

जो कामक्रीडा के समय स्तनपटों के उद्घाटन में दक्ष है। योषिताओं के अधोवस्त्र को ढ़ीला कर देता है। (फिर) शतशः रमणियों को अश्वासन पर स्थापित कर वाजिवत् रमण करता है, हे सूर्य! उसने यह वेग आपके रथ के घोड़ों से ही लिया है।

 

स्मररणशतजेता यो भवेद्रात्रियोद्धा

हरिणरमणशीलानां मनश्शीलबोद्धा

रतिकरणसमाप्तौ श्रान्तदेहश्च शेते

दिनवर! दिनतास्ये जागृयात् तं करैस्स्वै: ||९९||

 

सैंकड़ों कामयुद्धों का विजेता जो रात्रियोद्धा है, हिरनी के समान रमणशीलाओं के मन और स्वभाव का जानने वाला है। रति के पश्चात् थके हुए शरीर वाला सोता है। हे दिनवर, तुम सुबह उसे अपनी किरणों से जगाते हो।

 

हरसि विविधपापं पुण्यवल्लीं तनोषि

सुरवर! कृपया ते शुभ्रलक्ष्मीं वृणोति

मदनजनितसौख्यं योषितां त्वं ददासि

कुलकुसुमलतां विस्तारयेः दृश्यदेव ||१००||

 

विविध पापों को हरते हो, पुण्य की बेल का विस्तार करते हो। सुरवर! मनुष्य तुम्हारी कृपा से शुभ्र लक्ष्मी का वरण करता है। मदन से जनित योषिताओं का सौख्य तुम ही देते हो। दिखाई देने वाले देवता! आप मेरे कुल के फूलों की लता को भी विस्तृत करिए।

 

||इति हिमांशुगौडकृतं सूर्यशतकम् सम्पूर्णम्||

 

 

 



[1] हस्तिनां समूहः। हस्ति-कन्।

[2]  हट त्विषि (दीप्त्यर्थे), हटनः त्विण्मानित्यर्थः

[3] दुष्टानां घट्टः (चालः) तेन अतिक्रान्तं पट्टं (नगरम्) तं हटयतु दीपयतु ज्वालयतु इत्यर्थः। अथवा दुष्टानां घट्टस्य चालस्य यत् अतिपट्टं (पट्टानि अतिक्रम्य, पट्ट वस्त्रे, (मर्यादाहीनत्वमर्थः) तद् दुष्टघट्टातिपट्टं तं त्वं हटनः सन् हटयतु ज्वालयतु इति व्याख्यालभ्योर्थः।

[4] अतिवृष्ट्यनावृष्ट्यादिरूपाः।

[5] तु – आच्युतानि – इव । अच्युतस्य इमानि आच्युतानि – कर्माणि तत्त्वानि वा। (विष्णु ही परमशैव हैं, अतः वे शिव के चरित्रों धारण करते हैं इसी तरह सूर्य भी)। (शिवचरित्रों को धारण करना अविनाशी तत्त्व को धारण करना ही है, किन्तु लौकिक कथा की तरह दिखाई पड़ने पर सामान्य जन को उसमें कल्पनात्मकता दिखाई पड़ती है, जबकि सूर्य, शिव-विष्णु तत्त्व की अक्षरता को जानते हैं अतः शिव तत्त्व को अक्षरणीय, अच्युत तत्त्व या अच्युत कर्म की तरह धारण करते हैं। देव होने के नाते शिव-विष्णु-चरित्रों की दिव्यता को मनुष्य से बेहतर पहचानते हैं।

[6] यहाँ सौ घड़ों को भेदने का तात्पर्य शतशः लौकिक-बाधाओं को पार करके, या शतशः सत्सङ्कल्पों व सत्कर्मों से है। जैसे कवि मयूर ने सूर्यशतक की रचना के लिए स्वयं को ऊँचे वृक्ष पर सौ ग्रन्थियों से बांधा था, एक श्लोक रचना पर एक ग्रन्थि खोल देते थे, सौ ग्रन्थि खोलने पर साक्षात् सूर्य ने प्रकट होकर उन्हे कुष्ठमुक्त किया – ऐसी कथा हमने गुरुजनों से सुनी हैं।

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