जीवत को है आम की बगिया मरते को गंगा जी,
इसीलिए यूपी में बासा सबसे है चंगा जी,
दिली मोहब्बत, अपनापन, महसूस भाव को करना,
उसी जगह पर जिओ जहां हो प्यार वहीं पर मरना,
क्या रहना उस देस में पंछी जहां न कोई अपना,
करो बसेरा वहां हो जीवन जहां सलोना सपना,
तन्हाई की सजा काटते जैसे जीवन सारा,
पैसा चाहे मिले वहां ना रहना करो गंवारा,
दोय बखत की रोटी खाकर, मगन रहो गांवां में,
दौलत मिले भले कितनी परदेस नहीं जांवां मैं!
ठंडी ठंडी पवन सुहानी गांव की वो बरसातें,
वो खिलना फूलों का दिल ताज़ा करतीं सी बातें,
नहीं कहीं अपनापन मिलता लोग बहुत मिलते हैं,
बड़े नसीबों से दुनिया में दिलवाले मिलते हैं,
चार दिना का जीवन जिसमें दोय दिना हैं बीते,
हम अब भी है ऐसे जीते नहीं कि जैसे जीते,
सुकूं है खोया, नहीं भरोसा होता सहसा सब पर,
है फैली यह कैसी चुप्पी, मेहर मेरे रब कर,
कंबल ओढ़े कड़क ठंड की रात अकेला चलता,
गांव की सूनी गलियों में पूरा है चांद निकलता,
कहीं भौंकते कुत्ते है, झींगुर की गूंज कहीं पर,
सपने से में चलता मैं जुगनू की मौज कहीं पर,
कौन मुझे पहचानेगा दरवाजे किसके जाऊं,
आधी रात किवाड़ पे लटकी सांकल या खड़काऊं,
मैं अजनबी हुआ अब सबसे कभी था मैं भी यहीं का,
मेरी इस क़िस्मत ने छोड़ा मुझे नहीं कहीं का,
मिली जमीं न फलक मिला कैसा ये देख समां है,
वक्त की इस चादर में तेरा हर इक पहलू रवां है,
क्या कोई इन बातों को तह तक मेरी जानेगा,
जान सकेगा क्या भावों को सच में मान सकेगा,
मान लिया भी तो भी क्या बदलेगा फिर इस जग में,
कवित अकेला रात बैठ लिखता जो ऐसे जग मैं,
लेकिन मैंने सुना, लिखा कुछ व्यर्थ नहीं जाता है,
सदियों तक वो यूं ही रस्ता सा इक दिखलाता है,
और जानते जग में पहलू लोग विचित्र विचित्रा,
कौन यहां अपना साथी है कौन है किसका मित्रा,
पर कागज पर लिखी इबारत आकर्षित करती है,
आएं जाएं भले ये मौसम, मन हर्षित करतीं हैं,
इसीलिए जागें मौसम, लफ़्ज़ों में दुनिया लिपटी,
शब्दों की ताकत से पद-पदार्थ रूप से चिपटी,
वक्त की ये रफ्तार, उम्र काटे जीवन की रेखा,
कौन मेट सकता है विधि का लिखा हुआ जो लेखा,
फिर भी बस पुरुषार्थ मात्र करना मानव को हित है,
कर्म करे जा, गीता में ये भगवद्-वाक्य कथित है,
कहां से निकली बातें देखो कहां तलक जाती हैं,
कवियों को तो रात रात भर नींद नहीं आती है,
कविता पढ़ते पढ़ते पागल हो मत जाना तू भी,
गीत अनोखा मत चिल्लाना, डूबी रूबी डूबी,
बहुत हुआ यह भावकथन अब सोओ चद्दर तानें,
सुबह-सुबह बजता अलार्म लग जाता हमें उठाने,
लेकिन चिंतन और मनन की धारा बहने देना,
चिंतन की शक्ति से जीवन जीवन रहने देना,
जीवन की यह परिभाषा जो ज़िंदादिल वो जिंदा,
चांद रोशनी कुमुद, सूर्य से खिले हुए अरविंदा।
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हिमांशु गौड़
०३:१५ रात्रि
१२/१०/२०२६
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