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उसे छांव का पता ही क्या, हिन्दी कविता हिमांशु गौड़

 उसे छांव का पता ही क्या, के जो धूप में चला नहीं, उसे बारिशों की ना कद्र है, के तपन में जो जला नहीं  है उम्मीद पे ही कायनात टिकी तू क्यों मचल रहा, है कोई भी ऐसा ग़म नहीं, जो कि वक्त से मिटा नहीं ये जुनूने आफ़ताब है, इसे क्या कोई मिटाएगा, सौ काली रातें भले ही हों, सुबहे-उज़ाला झुका नहीं, जो अंधेरों में रहा नहीं, उसे रोशनी की न कद्र है, क्या प्यास को जानेगा वो, सहरा में जो जिआ नहीं बनते हैं सब ही देवता, अमरित पिए जीते हैं जो, क्या शिव को पहचाना कि जिसने, विष कभी पिआ नहीं! नहीं लफ्ज़ कोई उस हकीकत को बयां करता जिसे, कहते सभी जज़्बात हैं, ज़ाहिर कभी हुआ नहीं! मैं कि हूं ये पुरवाई हवा यादों को जिंदा रखती जो, आंधी से वक्त की फैलता, ऐसा मैं कोई धुंआ नहीं! ****** हिमांशु गौड़ 

|| बिहारघट्टं नहि सन्त्यजामि || संस्कृत कविता हिमांशु गौड़

  || बिहारघट्टं नहि सन्त्यजामि || ******** यत्र स्मृतिर्वेदविदां गुरूणां श्रीविष्ण्वाश्रमाणां च तपांसि यत्र सहस्रविद्वद्बटुकैर्वृतं यद् बिहारघट्टं नहि सन्त्यजामि||१|| यजुष्प्रियाभ्यासरतोदराग्निर् जाज्वल्यते पाठगतश्रमाच्च ततस्स खादेच्छतशष्कुलीर्वै यत्र, त्यजामो न बिहारघट्टम्||२|| यत्रैकतो नारवरी विभाति श्रीकार्णवासी नगरी प्रतीच्यां शब्दप्रियाणां श्रुतिसंहितानां बिहारघट्टं नहि सन्त्यजामि||३|| श्रीश्यामबाबागुरुदर्शनानि श्रीमत्प्रबोधाश्रमदेशनानि गाङ्गानि वारीण्यपि संल्लभेरन् यत्र त्यजामो न बिहारघट्टम्||४|| यत: प्रयामो ह्यपि रामघट्टं यतो नमामोऽप्यथ वृद्धिकेशीं भूतेश्वरं चैव यतो व्रजामो बिहारघट्टं नहि सन्त्यजाम:||५|| यत्रास्ति मेऽवस्थिविनीतवर्यो गुरुर्वशिष्ठोस्ति दिवाकरश्च भातीह भङ्गस्य वनस्पतिश्री: शिवार्पणाय स्वमुखार्पणाय||६|| घण्टास्वनो यत्र च भोजनाय स्वरोऽत्र गुञ्जेद्द्विज! हर्षणाय पठेम गङ्गालहरीं प्रभाते  श्रयेम तस्माच्च बिहारघट्टम्||७|| ****** हिमांशुर्गौड: ०८:२५ रात्रौ २८/०२/२०२३

अंबर भी शोक मनाता है! हिन्दी कविता हिमांशु गौड़

 अंबर भी शोक मनाता है! ****** लेकिन अंबर में प्राण कहां,  है भावगंध को घ्राण कहां,  इस विरह, वियोगी जीवन को, भावुक मन ना सह पाता है,  हो भरी भीड़ इस दुनियां में, पर किसी से न कह पाता है पत्थर हो जाते हैं वो दिल,  जीते जी वो मर जाता है,  जिसका जिससे जो बिछड़ गया,  फिर कहां वह मिल पाता है।  मानव, पशु पक्षी भी अपनों  की याद में रोते रहते हैं, तारे जब टूटे हैं नभ से,  ना हमें दीख वह पाता है,  बारिश कर करके याद उन्हें,  अंबर भी शोक मनाता है।  बच्चन जी की इस कविता का  उद्देश्य अलग है, पर दिल से  जो उठा भाव का वेग अभी, वो कौन रोक फिर पाता है, मैं फिर कहता हूं सच मानो, हर अपने बिछड़े की खातिर, मानव की तो है बात ही क्या अंबर भी शोक मनाता है! ****** हिमांशु गौड़ ०५:१३ शाम १७/०३/२०२३

देव श्रीगणेश

  फिल्म अग्निपथ के गीत "देवा श्रीगणेशा" का संस्कृत अनुवाद ***** ज्वालास्स्फुरन्तीव अक्ष्णोश्च यस्या- ऽपि हृदये ते नाम प्रभो! किं चिन्तनं तस्य आरम्भता का, तथा कास्तु परिणामता भूमि-रम्बर-सुतारास् तं नमन्तीव सर्वे, भीतिरस्माद् बिभेति यस्य रक्षां गणेश! कुर्यादाशीस्तव! हे देव! श्रीगणेश! देव! श्रीगणेश! देव! श्रीगणेश! देव! श्रीगणेश ||१|| तव भक्तेर्हि वरदानतां योऽर्जयेत्, सोऽस्ति धनवान् जन: तस्य नौका तटं याति नो, देव! त्वत्तोऽनभिज्ञोऽस्ति यो! मूषकस्तेऽस्ति रे वाहनं सर्वलोकस्त्वया रक्ष्यते पापवात: प्रचण्डो यदि क्वचिज्ज्योतिर्न ते ह्रीयते स्वस्य भाग्यस्य सोऽसौ  धाता स्वयमेव जात: विस्मृत्याखिलविश्वं  येन केनापि गीतं  नाम दिव्यं तव हे देव! श्रीगणेश! देव! श्रीगणेश! देव! श्रीगणेश! देव! श्रीगणेश ||२|| त्वद्धूलेस्तिलकमाचरन् देव! यस्त्वज्जनो जीवतात् नामृताय स्पृहावान् स यो भीतिहीनो विषं सम्पिबेत् विघ्नराट्! ते महिम्नस्तले कालयानस्य चक्रं चलेत् प्रतिशोधस्य स्फुल्लिङ्गनै: रावणस्यापि लङ्का दहेत् शत्रुसेनासहस्रं जीयते त्वत्समर्चारतेन पर्वतीभूयते तत्कणोऽपि,  श्लोकितं यत्र गीतं त्वदीय...

वित्तेन हीना: पशुभिस्समाना:? संस्कृतकाव्यम् हिमांशुगौड़

  वित्तेन हीना: पशुभिस्समाना:? [ कियानपि विद्वान्स्यात् स धनवशगीभूय धनिनां दिवानिशं सेवारतो जायते,  क्वचित्तु परिस्थितिजालशतबद्धतया जीवनस्य मूलभूतसुखेभ्योऽपि वञ्चितस्स कथं जीवति, तदत्र वर्णितम्। एते तात्कालिकरूपेणोदितविचारास्सन् ति, अन्यकालेऽस्मात्पृथगपि विचारकल्प उदेतुं शक्नोति। ] *********** कण्ठे समस्तं भवताच्च शास्त्रं श्रुतिर्वसेद्वाचि सदा प्रगल्भा कामं न किञ्चिल्लभते युवत्त्वे धनेन हीना: पशुभिस्समाना: आज्ञां धनाढ्यस्य शिरोरुहा स्यात् तत्कार्यमग्नो‌ऽस्तु सदैव विद्वान् वृत्तिं ददातीति प्रभुर्मदीयो विद्यायुतास्तद्वशगा भवन्ति परस्परं चापि विवादयन्ति बुधान् स्वदासानिव वर्तयन्तस् तेऽपीह चाटूक्तिवचांसि होक्त्वा वित्तेशपादौ मुहुरालिहन्ति ह्यतो धनस्यैव विभा समन्तात् मन्त्री भवेत् कोटिधनैस्सुयुक्त: तद्दासतां याति समस्तराज्यं तदिङ्गितेनैव वहेच्च वायु: किं कौलपत्यं किमु बौद्धिकत्वम्! आदेशतो यस्य समस्तशिक्षा चलेद् व्यवस्था नयताऽपि वश्या मूर्खस्स हस्ताक्षरशून्यवान् सन् ऐश्वर्यमग्नो भुवि दृश्यतेऽहो! प्रवक्तृतां वाञ्छति यश्च मादृक् समं वय: कष्टमुखे निपात्य ऊढ्वा च शास्त्राण्यपि दुष्कराण...

सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयम् - संस्कृतगीतम्

 सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं ********** सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं स्वभक्त-मनोकामनापूरिणीयं सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं स्मृता संस्तुता वैदिकैर्ज्ञाननिष्ठै: सदा वन्दिता लौकिकै: कर्मनिष्ठै: बिभर्त्त्यर्थदानि स्वरूपाणि सेयं सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं क्वचित् पुत्रदानं ददातीप्सितं सा क्वचित् कञ्चनं यच्छति प्रीतियुक्तान् क्वचित् प्रेमिकान् प्रापयेद् बान्धवांश्च न किं किं करोति प्रसन्ना सदेयं सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं सहारनपुरे भाति शाकम्भरीयं पुराणेषु ते सत्कथा सच्चरित्रं समुद्गुम्फितं देवि प्रीतं सुचित्रं कृपां मे कुरु स्वागतस्ते गृहेऽहं शरण्यं प्रपाहि सुतं चाश्रुनेत्रं मदीये हृदि भाति शाकम्भरीयं मदीये हृदि भाति शाकम्भरीयं इदं लड्डुकं नारिकेलं गृहाण सुमानां सुगन्धं सुमालं गृहाण हरिच्छाटिकां देवि दत्तां गृहाण प्रसन्ना ऽ स्मदीयं कुटुम्बं प्रपाहि सहारनपुरे भासि शाकम्भरि त्वं सहारनपुरे भासि शाकम्भरि त्वं मदीये हृदि भासि शाकम्भरि त्वं मदीये हृदि भासि शाकम्भरि त्वं

स्वाभिमान - हिन्दी कविता

  स्वाभिमान का सौदा कर के जिंदा नहीं रहा जाता है  अधिक देर तक जीवन में शर्मिंदा नहीं रहा जाता है  भूल सभी करते हैं और वो धुलती पश्चात्ताप से है विजय-वरण के इच्छुक का संघर्ष तो अपने आप से है धन से ही चलता है जीवन, तिनका तिनका धन से है भाग्य,बुद्धि से मिलता धन, और एकनिष्ठ शुभ मन से है लेकिन धन की खातिर भी अपमान नहीं सहा जाता है  स्वाभिमान का सौदा करके जिंदा नहीं रहा जाता है नष्ट करो ब्रह्माण्ड समूचा, जल जाए दुनियां सारी सौ सौ बार कटो खड्गों से, मिट जाने की हो तैयारी, तभी एकछत्र पौरुष से पृथ्वी का भोग किया जाता है, कायरता को अपनाकर के जीवित नहीं रहा जाता है, शक्ति मात्र को सत्य मानकर जीवन को न्योछावर कर बुद्धि तपस्या देवी श्रद्धा से पूरा जीवन भी जी कर शक्तिवाद का मात्र आचरण राजासन दिलवाता है मात्र भावना और दया से सन्तासन मिल पाता है शक्तिवाद का खंडन, मण्डनमिश्र विप्र के जेता का चतुष्पीठ के संस्थापक, शंकर का, युगप्रणेता का क्षण भर में ही शक्तिहीन कर, मार्ग यह दिखलाता है शक्तिहीन हो जीवन में फिर जीवित नहीं रहा जाता है। स्वाभिमान का सौदा करके जीवित नहीं रहा जाता है।